मुजफ्फरपुर के लाल, संघर्ष कर परदे पर मचा रहे धमाल
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रूपमहले परदे पर खुद को देखने की ख्वाहिश लेकर पले-बढ़े सौरभ सुमन अपने संघर्ष की बदौलत आज बड़े व छोटे परदे पर अपने अभिनय की छाप छोड़ रहे हैं। सौरभ बिहार के मुजफ्फरपुर के खादी भंडार पटेल नगर के रहने वाले हैं। 1982 में जन्मे सौरभ शाहरुख खान की फिल्में देखकर बड़े हुए। आज वे ऑस्कर विजेता फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। अपनी ज़िन्दगी के12 साल थिएटर और 11 साल फिल्म इंडस्ट्री को देने वाले सौरभ कहते हैं कि संघर्ष करने वालों के सारे सपने सच होते हैं। मैं एक्टिंग में इतना नाम कमाना चाहता हूं कि दुनिया मेरे जाने के बाद भी याद करे।

इन टीवी सीरीयल में सौरभ ने निभाया किरदार :

टेलीवजिन पर सौरभ अबतक रश्मि शर्मा टेलीफिल्म्स की साथियां, मिसेज कौशिक की पांच बहुएं, ससुराल सिमर का, बालाजी टेलीफिल्मस की पवित्र रिश्ता, गुमराह, क्या हुआ तेरा वादा, बड़े अच्छे लगते हैं, पवित्र बंधन, ऑप्टिमिस्टिक्स प्रोडक्शन की सजन रे झूठ मत बोलो, सास बिना ससुराल, ओये बंटी बबलू ओय, लागी तुझसे लगन, शुभ विवाह, सौभाग्यवती भव:, पुनर्विवाह, दीया और बाती हम, मैं लक्ष्मी तेरे आंगन की, सीआईडी, फियर फाइल्स, सपने सुहाने लड़कपन के, नियति, महादेव, हातिम, सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, प्यार में सावधान, क्राइम अलर्ट, दूरदर्शन के लिए पम्मी ब्यूटी पार्लर, चंदा मेरी बहना आदि धारावाहिकों में विभिन्न भूमिका निभा चुके हैं। सौरभ ने कहा कि अभी हाल में मैंने एक फिल्म ‘देसी बम’ में आईपीएस अफसर यश संकल्प का किरदार निभाया है। इसके डायरेक्टर तारिक़ ख़ान हैं। अक्टूबर 2017 में हेमंत प्रदीप द्वारा निर्देशित फ़िल्म टटकफरअ में सौरभ एक कस्टम अफसर पाण्डेय की भूमिका में हैं।

शाहरुख खान की फिल्मों से हुए प्रेरित :

सौरभ कहते हैं कि बचपन में जब मैंने शाहरुख खान की फिल्म दीवाना, डर, बाजीगर देखी तो लगा कि यह मैं भी कर सकता हूं। 1994 में जब मैं आठवी क्लास में था तो मैंने एक दिन आकर अपने पापा को बोल दिया कि पापा मुझे हीरो बनना है। मेरे पापा सुरेन्द्र प्रसाद बहुत ही शांत, सुलझे हुए और समझदार इंसान हैं। उन्होंने मुझे बड़े प्यार से समझाया कि पहले ग्रेजुएशन कर लो। उसके बाद तुम्हें जिस छत पे जाना हो, जा सकते हो। इसके बाद मैं ग्रेजुएशन पूरी करने में लग गया। साथ ही अपने शहर में इप्टा ( इंडियन पीपल थिएटर एसोसिएशन) से जुड़ गया। इस दौरान मैंने दर्जनो नुक्कड़ नाटक और स्टेज शो किए। इनमें सफ़दर हाशमी की नाटिका मशीन, जनता पागल हो गयी, भीष्म साहनी के नाटक कबीरा खड़ा बाजार में, अंधेर नगरी, मैं बिहार हूं, सपनों का बिहार आदि में अपने अभिनय का प्रदर्शन किया।

दिल्ली में भी निखरा अभिनय :

इसके बाद दिल्ली जाकर थिएटर करने लगा। वहां मैंने इंदु आर्ट थिएटर एंड फिल्म सोसाइटी मंडी हाउस में थिएटर करने लगा। वहां मेरी पहचान हेमंत मिश्रा जी से हुई जो एनएसडी से थे। हेमंत दादा के डायरेक्शन में मैंने राजा जी का राज, अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान, चोर चोर मौसेरे भाई समेत दर्ज़नों नाटक में भूमिका निभायी। वहां एक दिन घर से फ़ोन आया कि जब तुम्हे मुंबई जाना है तो तुम मुंबई निकल जाओ। जुलाई 2006 में गोल्डन टेम्पल से मुंबई के बोरीवली स्टेशन पे उतर गया। मुंबई में रूपेश थपियाल जी से मिला। उनके यहां एडमिशन लेकर एक्टिंग कोर्स किया। यहां फैकल्टी मेंबर रूपेश सर, समर जय सिंह सर और विदुर सर के नेतृत्व में अभिनय की बारीकियां सीखी।

संघर्ष के दिनों में स्टेशन के बाहर स्क्रैच कूपन भी बेचा :

इसके बाद काफी भागदौड़ करने पर मुझे हिंदी फिल्म एंजेल और भोजपुरी फिल्म मुन्ना भैया थानेदार। इसमें मुख्य भूमिका निभाकर काफी खुश हुआ। लेकिन फिल्म आज तक रिलीज़ नहीं हो पाई। इसके बाद मैंने स्लमडॉग मिलेनियर में एक छोटी सी निगेटिव भूमिका की। इसके डायरेक्टर डैनी ब्यॉयल के साथ काम करने का अनुभव बड़ा अच्छा रहा। सौरभ ने बताया कि मुंबई में संघर्ष के दिनों में उन्होंने प्रोडक्शन मैनेजर का जॉब किया। स्टेशन के बाहर खड़े होकर स्क्रैच कूपन बेचे। ऐड एजेंसी में भी काम किया लेकिन एक्टर बनने के लिए संघर्ष जारी रखा। आज इस मुकाम पर आने के बाद लगता है कि वाकई में मुंबई मायानगरी है। कुछ पाना है तो हिम्मत नहीं हारनी होगी और संघर्ष जारी रखना होगा।

 

Cambridge Montessori, School, Muzaffarpur

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