देश के 52 शक्‍तपीठों में शामिल यह मंदिर, यहां शास्‍त्रार्थ में पराजित हुए थे शंकराचार्य
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बिहार के सहरसा जिला मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर महिषी में मां उग्रतारा स्थान है। देश के 52 शक्तिपीठों में से एक यह स्थल धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि यहां माता सती की बांयी आंख गिरी थी। कहते हैं कि यहां मुनि वशिष्ठ ने मां उग्रतारा की पूजा-अर्चना शुरू की थी।

मंडन मिश्र की पत्नी विदुषी भारती से आदिशंकराचार्य का शास्त्रार्थ यहीं हुआ था जिसमें शंकराचार्य को पराजित होना पड़ा था। इस शक्ति स्थल पर सालों भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लेकिन, नवरात्र के दिनों में और प्रति सप्ताह मंगलवार को यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है।

सातवीं सदी की हैं मूर्तियां

इस मंदिर का निर्माण दरभंगा महाराज राजा नरेंद्र सिंह की पत्नी रानी पद्मावती ने 18वीं सदी में कराया था। पुरातत्व सर्वेक्षण में पता चला है कि यहां स्थापित माता की मूर्तियां सातवीं सदी के आसपास की हैं। पुरातत्वविद एसएन झा बताते हैं कि यहां प्राचीन अवशेषों में धर्म ध्वज का अवशेष है, जिसके प्रतीक चिह्न से पता चलता है कि प्राचीन काल में यह स्थल तंत्र साधना का बड़ा केंद्र रहा होगा।

यहां गिरा माता का बायां नेत्र

शक्ति पुराण के अनुसार माहामाया सती के मृत शरीर को लेकर शिव पागलों की तरह ब्रह्मांड में घूम रहे थे। इससे होने वाले प्रलय की आशंका को दखते हुए विष्णु द्वारा माहामाया के मृत शरीर को अपने सुदर्शन से 52 भागों में विभक्त कर दिया गया था। सती के शरीर का जो हिस्सा धरातल पर जहां गिरा उसे सिद्ध पीठ के रूप में प्रसिद्धि मिली। महिषी उग्रतारा स्थान के संबंध में ऐसी मान्यता है कि सती का बायां नेत्र भाग यहां गिरा था।

मुनि वशिष्‍ठ ने किया तप

मान्यता यह भी है कि ऋषि वशिष्ठ ने उग्रतप की बदौलत भगवती को प्रसन्न किया। उनके प्रथम साधक की इस कठिन साधना के कारण ही भगवती वशिष्ठ अाराधिता उग्रतारा के नाम से जानी जाती हैं। उग्रतारा नाम के पीछे दूसरी मान्यता है कि माता अपने भक्तों के उग्र से उग्र व्याधियों का नाश करने वाली है। जिस कारण भक्तों द्वारा इनकों उग्रतारा का नाम दिया गया।

भगवती अपने तीन मुख्य स्वरूपों में विद्यमान

महिषी में भगवती तीनों स्वरूप उग्रतारा, नील सरस्वती एवं एकजटा रूप में विद्यमान है। ऐसी मान्यता है कि बिना उग्रतारा के आदेश के तंत्र सिद्धि पूरी नहीं होती है। यही कारण है कि तंत्र साधना करने वाले लोग यहां अवश्य आते हैं। नवरात्रा में अष्टमी के दिन यहां साधकों की भीड़ लगती है।

नवरात्र में दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु

मां की पूजा-अर्चना करने यहां बिहार के विभिन्न इलाकों के अलावा बंगाल, नेपाल व यूपी के श्रद्धालु पहुंचते हैं। कई तांत्रिक भी यहां तंत्र साधना के लिए आते हैं। यहां मां तारा, मां महालक्ष्मी व मां सरस्वती की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मां को प्रसन्न करने के लिए लोग पशुओं की बलि भी देते हैं। यहां नवरात्र में प्रत्येक दिन बलि दी जाती है।

वैदिक विधि से होती है पूजा

देवी की पूजा आम दिनों में वैदिक विधि से की जाती है। लेकिन नवरात्र में तंत्रोक्त विधि से भी पूजा होती है। नवरात्र में मां की आरती दोनों समय की जाती है। इसमें मौजूद श्रद्धालु तन्मयता से पूजा करते हैं और आरती में शामिल होने के अवसर पर सौभाग्य मानते हैं।

Source : Dainik Jagran

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