31वीं पुण्यतिथि पर जानें मुजफ्फरपुर के खादी सेवक ध्वजा बाबू को

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dhawaja babu, muzaffarpur, bihar

देश को आजादी दिलाने में खादी की भूमिका अहम रही है। ऐसे में खादी के नि:स्वार्थ सेवक ध्वजा प्रसाद साहू की स्मृतियां जरूर जीवंत हो जाती हैं। वे नौजवानों को हमेशा रचनात्मक कार्यों से जुड़ने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करते थे। 19 जुलाई 1893 ई. में औराई के रामखेतारी में जन्में ध्वजा बाबू का मानना था कि रचनात्मक तरीके से ही देश की सेवा करना सही होगा। अपने जमाने में देश में व्याप्त विकृतियों व बिखराव से ध्वजा बाबू चिंतित जरूर रहते थे। लेकिन, उनके मन में निराशा का भाव कभी नहीं उत्पन्न हुआ।

अपनी कर्मनिष्ठा से वे भविष्य के प्रति सुनहले सपने संजोते थे। ध्वजा प्रसाद का देहावसान 08 फरवरी 1987 को सर्वोदय ग्राम मुजफ्फरपुर में हुआ। उनके पोते संजीव साहू बताते हैं कि सन् 1952 में सीतामढ़ी के पुपरी से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस ने ध्वजा बाबू को टिकट दिया। लेकिन, उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। उनका कहना था कि गांधीजी ने रचनात्मक तरीके से देश की सेवा करने की सीख दी है।

अंतिम घड़ी तक सकारात्मक ऊर्जा का करते रहे संचार:

सर्वसेवा संघ सेवाग्राम, वर्धा के मंत्री रमेश पंकज बताते हैं कि ध्वजा बाबू स्वतंत्रता संग्राम के उन चुनिंदा लोगों में हैं जिन्होंने सत्ता की कामना कभी नहीं रखी। उन्होंने युवाओं, खासकर बेरोजगारों के लिए खादी ग्रामोद्योग को कोने-कोने में फैलाने में सारी जिंदगी लगा दी। निराश व हताश होना उनके स्वभाव में ही नहीं था। अंतिम घड़ी तक वे हम जैसे लोगों को भी सकारात्मक व रचनात्मक ऊर्जा से सराबोर करते रहे। लेकिन आज समाज में नैतिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है। राजनीति हो या सामाजिक कर्म, रचनात्मक सोच व सकारात्मक पहल का घोर अभाव हो गया है। समाज में बदलाव लाने के लिए युवाओं को ध्वजा बाबू के विचारों से प्रेरणा लेनी चाहिए।

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अंग्रेजों ने ट्रेन में ही ध्वजा प्रसाद को लगा दी थी हथकड़ी:

जानकार बताते हैं कि सन् 1942 में दरभंगा के सकरी खादी भंडार को अंग्रेजों ने लूट लिया। इसका प्रतिकार करने पर अंग्रेजों ने दो मुस्लिम खादी कार्यकर्ताओं को गोली मार दी। इससे उनके परिवार के समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया। यह देख मुजफ्फरपुर में ध्वजा प्रसाद साहू चिंतित हो गए। वे इनके परिवार की मदद के लिए वेश बदल कर चंदा मांगने लगे। चंदा लेने के लिए ध्वजा बाबू यूपी के कानपुर तक चले गए। लौटते समय उनको अंग्रेजों ने ट्रेन में ही हथकड़ी लगा दी। हालांकि, बाद में वे रिहा हो गए। इसके बाद भी ध्वजा बाबू ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विरोध जारी रखा। आखिरकार 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिल ही गई।

Input : Live Hindustan | Abhishek Priyadarshi