यूरोप में मुजफ्फरपुर की लीची से बने शहद की धूम, आता है 55 करोड़ का ऑर्डर

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कम संसाधन के बावजूद मुजफ्फरपुर के शहद उत्पादक भारत ही नहीं वरन विदेश में भी अपनी छाप छोड़ने में सफल हुए हैं। यूरोप के कई देशों, अमेरिका व खाड़ी देशों में यहां के शहद की काफी मांग है। लीची से निर्मित शहद की मांग अमेरिका और जर्मनी में सबसे ज्यादा है। सरसों, जामुन, सूर्यमुखी, सहजन से उत्पादित शहद भी खूब पसंद किए जा रहे हैं।

यहां प्रतिवर्ष करीब 41 लाख किग्रा शहद का उत्पादन होता है। वार्षिक कारोबार करीब 55 करोड़ का है। मुजफ्फरपुर लीची के लिए प्रसिद्ध है। यहां सबसे अधिक लीची के मंजर से निकले शहद का उत्पादन होता है। गोल्डन कलर और कम वसा युक्त होने के कारण विदेश में ब्रेड के साथ मक्खन की जगह इसका प्रयोग किया जाता है। यहां लीची से बना तीस लाख, सरसों से बना सात लाख, जामुन व सूर्यमुखी से बना दो-दो लाख किग्रा शहद प्रतिवर्ष उत्पादित होता है।

मुजफ्फरपुर में प्रोसेसिंग यूनिट, रिसर्च सेंटर, टेस्ट लैब व भंडारण की व्यवस्था नहीं है। यहां के मधुमक्खी पालक दिल्ली, पंजाब व राजस्थान स्थित विभिन्न कंपनियों को कच्चा माल देते हैं, जहां से प्रोसेसिंग के बाद पैकिंग कर विदेश निर्यात किया जाता है। इसके अलावा कई नामी कंपनियां भी यहां के किसानों से सीधा कच्चा माल लेती हैं। मीनापुर, बोचहां, कांटी, मुशहरी, कुढ़नी व गायघाट में मधुमक्खी पालन होता है। मीनापुर प्रखंड व अहियापुर के शिवराहां में सबसे पहले इटालियन मधुमक्खी का पालन शुरू हुआ है। मधुमक्खी पालक मझौलिया निवासी राजमंगल राय, नेउरा के धर्मेद्र कुमार और शिवराहां के अजित कुमार आदि कहते हैं कि कंपनियां औने-पौने दाम में कच्चा माल खरीदती हैं। सरकारी सहायता नहीं मिलने से सीजन के बाद मधुमक्खियों को बचाने के लिए दूसरे राज्यों में भी जाना पड़ता है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बंगाल, छत्तीसगढ़, जम्मू तक ले जाते है। सूबे में शहद उद्योग की अपार संभावनाएं हैं। यहां से कच्चा माल दूसरे राज्यों में भेजा जाता है।

वहां से प्रोसेसिंग के बाद इसे विदेश निर्यात किया जाता है, अगर सरकारी सहायता मिले तो यहीं से प्रोसेसिंग करके विदेश भेजा जा सकेगा।

 

Source : Dainik Jagran

 

Cambridge Montessori, School, Muzaffarpur

 

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