छात्रों से समझौते के बाद 22वें दिन खुला विवि
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दूरस्थ शिक्षा निदेशालय (डीडीई) में फर्जी बहाली को लेकर 2 नवंबर से शुरू आंदोलन गुरुवार को समाप्त हो गया। कुलपति डॉ.अमरेंद्र नारायण यादव और छात्रों के बीच वार्ता होने के बाद विश्वविद्यालय खुल गया। शुक्रवार से सभी विभाग खुल जाएंगे।

यहां बता दें कि बुधवार को प्रशासनिक पदाधिकारियों के सहयोग से शाम को विवि खुला था। लेकिन, अधिकारियों के जाने के बाद आंदोलनकारी छात्रों ने विवि फिर बंद करा दिया।

75 फीसद कर्मियों को खुलने की जानकारी न होने से तमाम विभागों के ताले बंद रहे। सिर्फ परीक्षा विभाग, कुलपति, प्रतिकुलपति, कुलसचिव के कार्यालय खुले थे। बाकी पदाधिकारियों के विभाग कर्मियों के न आने से बंद ही रहे।

कुलपति ने छात्रों से अपने कक्ष में वार्ता की। उनकी समस्याओं को सुना। फर्जी बहाली के मामले में डीडीई के निवर्तमान निदेशक को निलंबित करने के संबंध में नियमानुसार प्रक्रिया अपनाने का कुलपति ने भरोसा दिलाया। छात्रों की उपस्थिति में राजभवन के पदाधिकारी से फोन पर बात कर दिए आश्वासन को पुख्ता कर दिया।

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कुलपति ने कार्यालय आने के साथ परीक्षा विभाग का निरीक्षण किया। वहां प्रोविजनल के लिए छात्रों की लगी भीड़ पर नाराजगी जताई। कहा कि इससे काम बाधित होगा। इस दौरान परीक्षा नियंत्रक डॉ. ओपी रमण भी मौजूद रहे। कर्मियों ने कहा कि भीड़ के सामने होने से काम बाधित हो रहा है। छात्रों को 4 बजे शाम को आने के लिए कहा गया।

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बंदी के चलते आर्थिक रूप से तंग हाल बीआरए बिहार विश्वविद्यालय का 20 करोड़ रुपये पानी में बह गया। 21 दिनों की अवधि में विवि के विभिन्न विभागों में कार्यरत प्राध्यापक व कर्मियों को बैठे रहना पड़ा। लिहाजा न तो फोर्थ सेमेस्टर की कक्षाएं शुरू हो सकी और न ही थर्ड सेमेस्टर की बची हुई प्रैक्टिकल परीक्षा हो पाई।

पीजी विभागों की 01 से 6 नवंबर तक कई विभागों में प्रैक्टिकल परीक्षा होनी थी, जो नहीं हो सकी। इसे लेकर विभागों ने विशेषज्ञों को बुलाने में लाखों रुपये खर्च किए। मोटे तौर 10 ऐसे विभाग हैं, जहां प्रैक्टिकल परीक्षा होती है। इन विभागों में औसतन एक से डेढ़ लाख रुपये परीक्षा कराने में खर्च होते हैं। परीक्षा बाधित होने से फिर से सारी व्यवस्था विभागाध्यक्षों को करनी पड़ेगी। पूर्व में हुए खर्च पानी में बह गए।

पीजी फोर्थ सेमेस्टर की कक्षाएं नवंबर से ही शुरू होनी थी। बंदी के कारण कक्षाएं शुरू नहीं हो पाई। प्राध्यापकों को घर बैठे रहना पड़ा। कर्मियों को यहां आकर वापस जाना पड़ता रहा।

Source : Dainik Jagran

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