पकड़ौआ शादी का सच, इस जिले का सबसे पहले आता है नाम
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पिछले दिनों एक खबर आई कि बिहार में वर्ष 2017 में नवंबर तक ही 3405 पकड़ौआ विवाह हुए। पकड़ौआ शादी का नाम आते ही बिहार के बेगूसराय जिले का नाम आ जाता है। 1970 से 1990 के दशक तक में किसी लड़के की अगर अच्छी नौकरी लगती थी तो घर वाले सबसे पहले उसका घर से निकलना बंद कर देते थे। ज्वाइनिंग का इलाका काफी गुप्त रखा जाता था। नौकरीपेशा लड़का अगर घर से निकलता तो कोई बड़ा उसके साथ होता। घर के लोगों को डर लगा रहता था कि उनके बेटे की कही पकड़ौआ शादी ना हो जाए। इस अजीबोगरीब शादी की पद्धति की शुरुआत बेगूसराय से ही हुई थी।

ये है इस शादी की सच्चाई

– 1970 के दशक में बेगूसराय के मटिहानी एरिया में सबसे ज्यादा इस प्रकार की शादी का रिवाज था।
– हालांकि बाद के दिनों में ये राज्य के कई जिलों में होने लगा। लेकिन अब बिहार में ये ट्रेंड खत्म हो चुका है।
– आंकडों के पीछे की सच्चाई कुछ और है। इस बारे में भास्कर से बात करते हुए एडीजी मुख्यालय एसके सिंघल कहते हैं कि अब बिहार में पकड़ौआ शादी के मामले नहीं हैं।

क्या है इन आंकड़ों की सच्चाई

– ये जो आंकड़े हैं वो दरअसल पकड़ौआ शादी के नहीं हैं। इसमें सभी तरह के अफेयर या लड़के-लड़की के अपहरण के मामले शामिल हैं।
– वे बताते हैं कि पिछले साल बिहार में मात्र एक मामला आया था जो बाद में पता चला कि वह एक-दूसरे को जानते थे।
– 2017 में कुल 8200 लोगों के गुमशुदा होने का केस दर्ज हुए थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत माइनर की गुमशुदगी का मामला अपहरण में कन्वर्ट हो जाता है।
– पिछले साल ढाई हजार मामले ऐसे आए जिसमें अपहरण का कारण प्रेम प्रसंग था। इसमें शादीशुदा मर्द और औरत भी थे जो प्रेमिका या प्रेमी के साथ भाग गए।

इनका है कहना

– इस संबंध में बेगूसराय के बुजुर्ग श्यामाचरण मिश्रा बताते हैं कि पहले पकड़ौआ शादी सामाजिक पहल से संपन्न होती थी, लेकिन बाद में इसमें अपराधी गिरोहों की घुसपैठ हो गई।
– इंटर की परीक्षा के दौरान थोक भाव में पकड़ौआ शादी होती थी। 2017 में तो दो से तीन मामले हुए वे भी पुलिस तक नहीं पहुंचे।
– पहले शादियों के सीजन में हर माह औसतन 50 मामले दर्ज होते थे जिले में। 1970 के दशक में इस प्रकार की शादी की शुरुआत हुई थी तब वैसे परिवार के युवकों को शादी के लिए चिन्हित किया

जाता था जिनका पारिवारिक पृष्ठभूमि ठोस होती थी। तब लड़कों को बहला-फुसला कर पहले शादी करा दी जाती थी।
– रामदीरी गांव के रामानुज सिंह बताते हैं कि सामाजिक दबाव का इस्तेमाल करने के कारण पकड़ौआ शादी की सफलता का प्रतिशत 90 से भी ज्यादा था।
– दौर बदला और पकड़ौआ शादी की सफलता का प्रतिशत बढ़ता दिखा तो 1980 की दशक के बाद पकड़ौआ शादी का रूप बदलने लगा। इसका व्यावसायीकरण होने लगा। कई गिरोह ने वर उठाने का काम शुरू कर दिया।

मुक्तभोगी ने बताई ये कहानी

– ऐसे ही एक भुक्तभोगी कौशल किशोर ने बताया कि इंटर की परीक्षा देकर जैसे ही मैं परीक्षा हॉल से निकला कुछ लोगों ने मुझे जबरन एक जीप में बिठाकर अपहरण कर लिया।
– जीप में कई लोग अगल-बगल बैठे थे जिनके हाथ में पिस्तौल थी और उन्होंने मुझे डरा रखा था। मेरा मुंह बंद कर एक स्कूल के कमरे में ले जाकर बंद कर दिया गया।
– देर शाम मुझे बताया गया कि तुम्हारी शादी अभी होनी है। धोती देते हुए कहा कि पहन लो। मैंने टालने की कोशिश की तो उन लोगों ने मेरी जमकर पिटाई कर दी। मेरी जबरदस्ती शादी हुई।
– मेरे सिर पर पूरी शादी के दौरान बंदूक ताने लोग खड़े थे। मैं डर से हर रस्म को पूरी कर रहा था। सुबह पुलिस आई और मुझे छुड़ा कर ले गई।
– वधु पक्ष वालों ने कई स्तर से मेरे परिवार से संपर्क किया। आज मैं अपनी जिंदगी किसी दूसरी लड़की के साथ गुजर बसर कर रहा हूं।
– 1985 के दौर में 5 से 10 हजार रुपए में लड़का उठाने का काम धड़ल्ले से होने लगा था। 1990-95 के दौरान वर उठाने का गिरोह चलाने वाले सरगनाओं ने भी अपने घर की लड़कियों की शादी अच्छे घर के लड़कों से कराने का काम शुरू कर दिया और यही वो समय था जब पकड़ौआ शादी के असफल होने का प्रतिशत एकाएक बढ़ने लगा।

Input : Dainik Bhaskar

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