केवल टाइम पास या संपर्क का जरिया नहीं, जिंदगी भी बचाती सोशल मीडिया

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कई आंदोलनों का मूक गवाह बना सोशल मीडिया भले ही कई मौकों पर गैर जिम्मेदार करार दिया जाता हो, लेकिन यह भी सच है कि सोशल मीडिया लोगों की मदद का एक सशक्त माध्यम बन रहा है। अब यह सिर्फ मनोरंजन या परस्पर संपर्क का माध्यम मात्र नहीं रह गया है, बल्कि लोगों की जिंदगी भी बचाने में मददगार साबित हो रहा है। सोशल मीडिया का एक संवाद लोगों को एक-दूसरे के करीब भी ला रहा है। सोशल मीडिया पर मार्मिक अपील से लोगों की जिंदगी भी बच रही है।

केस स्टडी एक

 

पांच दिन पहले की बात है। सहरसा के श्रुतिकांत की बहन का हैदराबाद के किम्स अस्पताल में हर्ट की सर्जरी हुई थी। डॉक्टर ने दो यूनिट खून की जरूरत बताई थी। अनजान शहर में बी पॉजिटिव ब्लड का इंतजाम नहीं हो पा रहा था। उसने मित्रों समेत अन्य रिश्तेदारों को दूरभाष से जानकारी दी।

 

इसी बीच फेसबुक पर उसने एक मैसेज दिया कि हैदराबाद या सिकंदराबाद में कोई मित्र मौजूद हैं तो वह मदद करें। उसे अपनी बहन के लिए दो यूनिट ब्लड की जरूरत है। फेसबुक के ही अन्य मित्रों ने भी इसे शेयर कर वहां मौजूद लोगों से संपर्क करने की कोशिश की। फेसबुक पोस्ट के बाद मूल रूप से दरभंगा निवासी बीके कर्ण अपनी पत्नी के साथ पहुंचे और ब्लड डोनेट किया। वे हैदराबाद में पीसीआरआइ के निदेशक है।

केस स्टडी दो

 

दिल्ली के एक अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचे सहरसा निवासी प्रसुन कुमार को भी खून की जरूरत हुई। परंतु उस ग्रुप का खून नहीं मिल रहा था। उसने भी फेसबुक व व्हाट्सएप के माध्यम से यह संदेश अपने मित्रों को दिया। उसके संदेश को लोगों ने शेयर करना शुरू किया।

 

एक घंटे के अंदर जमुई के विजय कुमार नामक व्यक्ति उसके पास पहुंचे और उन्होंने खून देकर उसकी जान बचाई। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर भी कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें सोशल मीडिया के माध्यम से रक्त की व्यवस्था हुई।

 

सोशल मीडिया समाज का एक सशक्त माध्यम बन गया है। विचारों के आदान-प्रदान के साथ ही इस माध्यम से लोगों की मदद भी हो रही है। लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं हो इस दिशा में सभी को पहल करनी होगी।

डा. विनय कुमार चौधरी, समाजशास्त्री, सहरसा

Source : Dainik Jagran

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