ऐसा था दरभंगा राज का जलवा, किले में आती थी ट्रेन, अंग्रेज मानते थे लोहा

0
86
Share Now
  •  
  •  
  •  
  • 1
  •  
  •  

देश के रजवाड़ों में दरभंगा राज का हमेशा अलग स्थान रहा है। ये रियासत बिहार के मिथिला और बंगाल के कुछ क्षेत्रों में कई किलोमीटर के दायरे तक फैला था। देश के रजवाड़ों में दरभंगा राज का हमेशा अलग स्थान रहा है। ये रियासत बिहार के मिथिला और बंगाल के कुछ क्षेत्रों में कई किलोमीटर के दायरे तक था।

रियासत का मुख्यालय दरभंगा शहर था। इस राज की स्थापना मैथिल ब्राह्मण जमींदारों ने 16वीं सदी की शुरुआत में की थी। ब्रिटिश इंडिया में इस रियासत का जलवा अंग्रेज भी मानते थे। महाराज कामेश्वर सिंह के जमाने में तो दरभंगा किले के भीतर तक रेल लाइनें बिछी थी और ट्रेनें आती-जाती थीं।

महाराज के लिए अलग-अलग सैलून इतना ही नहीं दरभंगा महाराज के लिए रेल के अलग-अलग सैलून भी थे। लोगों की मानें तो इसमें न केवल कीमती फर्नीचर थे, बल्कि राजसी ठाठ-बाट के तहत सोने-चांदी भी जड़े गए थे। बाद में इन सैलून को बरौनी के रेल यार्ड में रख दिया गया। दरभंगा महाराज के पास कई बड़े जहाज भी थे।

शानो-शौकत के लिए मशहूर थे महाराज ब्रिटिश राज के समय 4,495 गांव दरभंगा महाराज की रियासत में थे। 7,500 अधिकारी कर्मचारी राज्य का शासन संभालते थे। महाराज कामेश्वर सिंह अपनी शान-शौकत के लिए पूरी दुनिया में विख्यात थे। अंग्रेजों ने इन्हें महाराजाधिराज की उपाधि दी थी।

महाराज ने अंग्रेजों के समय ही नए जमाने का रंग-ढंग भांप लिया था। इसके मद्देनजर उन्होंने कई कंपनियां शुरू की। इनमें नील, सुगर और पेपर मिल आदि कंपनियां शामिल हैं। हालांकि, दरभंगा रियासत का किला आज उस दौर की तरह नहीं जिसके लिए वह दुनियाभर में मशहूर था। अब किले के आस-पास काफी अतिक्रमण है।

Source : Live Bihar


Share Now
  •  
  •  
  •  
  • 1
  •  
  •