लेनिन की मूर्ति टूटना हमारे लोकतान्त्रिक और क़ानूनी व्यवस्था दोनों पर प्रश्न
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आप न लेनिन को पढ़े न गाँधी, बुद्ध, विवेकानंद को। आपकी सोच बस इसबात पर टिकी है की ये देशी है या विदेशी। मूर्तियां प्रतीकात्मक होती है किसी सोच की और सोच कोई देशी या विदेशी नहीं होता और शायद इसी कारन गाँधी, बुद्ध और विवेकानंद की मूर्तियां न ही सिर्फ भारत में है बल्कि विदेशो में भी हैं। अब क्या वे भी गाँधी, बुद्ध और विवेकानंद की मूर्तियां तोड़ने लगे क्योंकि वे भारतीय हैं।  सरस्वती जी की भी मूर्ति सबसे बड़े इस्लामिक देश इंडोनेशिया ने अमेरिका में बनवायी है जो की ज्ञान और बुद्धि की प्रतिक हैं क्या वे भी इसे तोड़ने लगे।

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और मूर्तियां भी सरकारी संपत्ति होती है मूर्ति लगाना या हटाना एक व्यवस्था से होती है ना की अराजक तत्वों द्वारा। लेनिन की मूर्ति टूटना हमारे लोकतान्त्रिक और क़ानूनी व्यवस्था दोनों पर प्रश्न उठाता है। विश्व में क्या सन्देश भेज रहे हैं हम क्या वे भी अपने यहाँ सरस्वती, गाँधी, बुद्ध की मूर्ति तोड़ने लगे। और कैसी प्रवीति पैदा कर रहे हम लेनिनवादी सरकार हारी तो हम लेनिन की मूर्ति तोड़ दी। कल कोई नॉन भाजपाई सरकार जीती तो नॉन भाजपाई अराजक तत्व पंडित दिन लाल उपाध्याय की मूर्ति तोड़ने लगे। अभी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था से ही सरकार चुनी गई है त्रिपुरा में न की कोई सिविल वॉर हुआ था और न ही जैसे सद्दाम हुसैन की सरकार गयी थी।

 

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