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आजादी मिलने के बाद हिमालय क्यों जाना चाहते थे सुभाष चंद्र बोस

Md Sameer Hussain

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आजादी के बाद देश में अक्सर ये माना जाता था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस का निधन विमान हादसे में नहीं हुआ है. वो जल्द अज्ञातवास से वापस स्वदेश लौटेंगे और तब देश में आमूलचूल बदलाव आएगा. ये तो चर्चाओं की बात थी लेकिन नेताजी आजादी की लड़ाई के दौरान आजाद हिंद फौज के सहयोगियों से एक खास इच्छा जाहिर करते थे, जिसके लिए वो आजादी के बाद हिमालय जाना चाहते थे.

उनके एक खास सहयोगी एसए अय्यर ने इस बारे में कई बार लिखा भी. इसमें ये बताया गया है कि सुभाष उनसे अक्सर आजादी के बाद एक खास काम करने की इच्छा जाहिर करते थे. वो कहते थे कि खून से सनी दिल्ली जाने वाली सड़क पर वो अपनी क्रांतिकारी सेना का संचालन करेंगे लेकिन जैसे ही उन्हें अपने इस उद्देश्य में सफलता मिल जाएगी, तब वो अपने जीवन के असली ध्येय की ओर मुड जाएंगे.

सुभाष बोस पर लिखी पत्रकार संजय श्रीवास्तव की किताब “सुभाष की अज्ञात यात्रा” में इस बारे में चर्चा की गई है. ये भी बताया गया है कि सुभाष क्यों अक्सर ये बात कहते थे. सुभाष कहते थे,” देश को आजादी मिलते ही वो हिमालय चले जाएंगे, जहां वो ध्यान-भजन करेंगे. यही उनके जीवन का असली ध्येय है.”
दरअसल आध्यात्म सुभाष के जीवन का एक अनिवार्य और गहन तत्व था, जिसने उनके अंदर किशोरवय से ही पैठ जमा ली थी. जब वो किशोर हो रहे थे, तब उनका रुझान आध्यात्म की ओर होने लगा. तब वो बाबा और साधुओं की तलाश में लग गए. इससे उनके व्यक्तित्व में अजीब सा बदलाव आने लगा. उनके घरवालों ने भी इसे महसूस किया.

क्यों एकांत जगह की तलाश करते थे
साधु और महात्माओं की संगत को तलाशने के चलते वो घर से कई कई घंटों के लिए बाहर रहते. आसपास के उन स्थानों में चले जाते, जहां प्रकृति की छटा होती और एकांत होता. ऐसी जगहों पर वो ध्यान साधना करने लगते. घर में रहने पर वो कोई अंधेरा कमरा तलाशते और वहां बैठकर खुद को ध्यान में डूबोने की कोशिश करते.किताब कहती है,” बाद में जब वो जर्मनी और जापान में लंबे समय के लिए रहे तब भी हर हाल में रोज रात में ध्यान साधना जरूर करते थे. वो रोज रात भगवद्गीता पढ़ते थे, इससे उन्हें शांति और शक्ति मिलती थी. हालांकि उनका ज्यादा समय लोगों के बीच बीतता था लेकिन रात में ज्यों एकांत मिलता, वो ध्यान साधना में लीन हो जाते.”

रात का समय उनके आध्यात्मक का समय होता था
जनता के बीच वो मंच पर लंबा भाषण देते थे लेकिन मंच से अलग होते ही एकांत चाहते थे. तब वो कम ही लोगों से बातचीत करते थे. भोजन के बाद वो आमतौर पर विश्राम करते लेकिन अगर उनके पास कोई बुलाया हुआ व्यक्ति आ जाता था तो पूरे घंटे में शायद कुछ ही शब्द बोलते थे. वो उस समय शांति ज्यादा चाहते थे. वो उनका आध्यात्मिक समय होता था.

घंटों ध्यान साधना करते थे
रात में उनका ध्यान लंबा होता था. वो देर रात दो-तीन बजे तक सोते थे लेकिन सबेरे उठने पर चेहरे ताजगी और आभा से भरपूर होता था. सिंगापुर में रहने के दौरान सोने के पहले रामकृष्ण परमहंस आश्रम चले जाते थे. वहां जाकर ध्यान करते थे. उनके रोज के काम और आध्यात्मिक साधना साथ-साथ चलती रहती थी. बर्लिन में जब दूसरे विश्व युद्ध के दिनों में बमबारी की आबाज आती थी, तब वो अपने घर में देर रात तक ध्यान करते रहते थे.

मानते थे तंत्र साधना की ताकत
उनकी जीवन की आदतें आमतौर पर सादगी लिये हुए थीं. वो खुद उसी राशन का भोजन करते थे, जो उनके सैनिक करते थे. वो मां काली के भक्त थे. ये भी कहा जाता है कि वो तंत्र साधना की शक्ति मानते थे. जब वो गांधीजी के विरोध के बाद 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए तो कुछ समय बाद रहस्यमय तरीके से बीमार हो गए. तब उनका मानना था कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने उनके खिलाफ तंत्र साधना की थी.

1933 में जब वो एसएस गंगे जहाजे से यूरोप जा रहे थे तो अपने दोस्त दिलीप कुमार रॉय को लिखा, मैं शिव के प्रति ज्यादा भक्तिभाव में रहता हूं. कुछ सालों से मंत्रों की शक्ति को मानने लगा हूं. वाकई मंत्रों में बहुत ताकत होती है. पहले मैं मंत्रों को लेकर सामान्य भाव रखता था. बाद में मैने तंत्र फिलास्फी पढ़ी. कुछ मंत्र तो शक्ति देने के मामले में वाकई अदभुत होते हैं.

Input : News18

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फिल्म ‘स्वदेस’ की एक्ट्रेस किशोरी बलाल का हुआ निधन, डायरेक्टर आशुतोष ने ट्वीट करके जताया शोक

Muzaffarpur Now

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दिग्गज अभिनेत्री किशोरी बलाल से बेंगलुरु के एक प्राइवेट हॉस्टिपट में आज आखिरी सांस ली। अभिनेत्री उम्र से संबंधित किसी बीमारी से पीड़ित थी। दिग्गज अभिनेत्री ने साल 1960 में सैंडलवुड की शुरुआत में ‘इवलेंटा हेंथी’ फिल्म से डेब्यू किया था।

दिग्गज अभिनेत्री ने बॉलीवुड फिल्म ‘स्वदेस’ में शाहरुख खान की मां ‘कावेरी अम्मा’ का रोल अदा किया था। जो उनकी करियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक मानी जाती है। किशोरी बलाल ने कई भाषाओं की फिल्मों में काम किया था। उन्होंने स्वदेस के अलावा अय्या और लफंगे परिंदे में भी काम किया था।

स्वदेस फिल्म के डायरेक्टर आशुतोष गोवरिकर ने ट्वीट करके दुख जताया है। उन्होंने लिखा- ह्रदयविदारक। किशोरी बलाल जी के निधन की ख़बर से बहुत दुखी हूं। किशोरी जी, आप अपने दयालु, गर्मजोशी और प्रेम से लबरेज़ व्यक्तित्व के लिए याद की जाएंगी। स्वदेस में आपकी कावेरी अम्मी वाली परफॉर्मेंस याद रहेगी। आप बहुत याद आएंगी।

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‘भारत के उसेन बोल्ट’ का भी टूटा रिकॉर्ड, अब ये रेसर बना नंबर 1, देखें तस्वीरें

Santosh Chaudhary

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कंबाला वार्षिक दौड़ है जिसका आयोजन कर्नाटक में किया जाता है. इस दौड़ में लोग अपनी भैसों के साथ धान के खेतों में 142 मीटर की दूरी तय करते हैं. इस दौड़ के दौरान धावकों के हाथ में भैंसों की लगाम होती है.

भैंसा दौड़ (कंबाला) में बेहतर प्रदर्शन की बदौलत रेसर श्रीनिवास गौड़ा स्टार बन गए लेकिन अब उनसे भी तेज एक रेसर सामने आया है. वेनुर में सूर्य चंद्र कंबाला में निशांत शेट्टी नाम के एक रेसर ने 9.52 सेकंड में ही 100 मीटर की दूरी तय कर दी, जो गौड़ा से .03 सेकंड कम है. सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरने वाले श्रीनिवास गौड़ा ने कंबाला दौड़ के दौरान 100 मीटर की दूरी केवल 9.55 सेकंड में तय की थी. सोशल मीडिया में वीडियो वायरल होने के बाद श्रीनिवास को भारत का उसेन बोल्ट कहा जाने लगा. तमाम हस्तियों ने उसेन बोल्ट से तुलना करते हुए उनका ट्रायल लेने और ओलिंपिक में भेजने की मांग की है. खेल मंत्री किरण रिजिजू ने तत्काल एक्शन लेते हुए इस रेसर के लिए ट्रायल की व्यवस्था भी कराई है, हालांकि गौड़ा ने फिलहाल ट्रायल से मना कर दिया है. इसकी वजह चोट मानी जा रही है.

रेसर निशांत ने 143 मीटर की दूरी 13.61 सेकंड में पूरी की.

Usain Bolt

रेसर निशांत शेट्टी ने 143 मीटर की दूरी 13.61 सेकंड में पूरी की जिसमें शुरुआती 100 मीटर तो 9.52 सेकंड में ही पूरे कर लिए. आयोजकों ने यह जानकारी दी.

रेसर श्रीनिवास गौड़ा.

Usain Bolt of India, SAI

उधर रेसर श्रीनिवास गौड़ा ने मीडिया को बताया कि वे नेश्नल ट्रायल्स में भाग नहीं लेना चाहते. उन्होंने कहा, “मेरा पैर जख्मी हो गया है और मेरा ध्यान कंबाला पर लगा हुआ है.

गौड़ा ने कहा कि मुझे भैसों के साथ दौड़ने की आदत है.

India

गौड़ा ने कहा कि मुझे भैसों के साथ धान के खेत में दौड़ने की आदत है.”

कंबाला अकादमी के सचिव गुणापा कंबाडा का कहना है कि श्रीनिवास अभी ट्रायल में हिस्सा नहीं ले सकते.

Usain Bolt

वहीं कंबाला अकादमी के सचिव गुणापा कंबाडा का कहना है कि श्रीनिवास अभी ट्रायल में हिस्सा नहीं ले सकते. उन्होंने बताया, “दिक्कत यह है कि श्रीनिवास की अगले तीन शनिवार तक कंबाला रेस हैं.”

कंबाला वार्षिक दौड़ है जिसका आयोजन कर्नाटक में किया जाता है.< Usain Bolt of India

कंबाला वार्षिक दौड़ है जिसका आयोजन कर्नाटक में किया जाता है. इस दौड़ में लोग अपनी भैसों के साथ धान के खेतों में 142 मीटर की दूरी तय करते हैं.

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दुनिया की बेस्ट मॉम बनने की खास टिप्स, ऐसे दे सकते हैं बच्चों को प्रेरणा

Santosh Chaudhary

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अगर आप अपने बच्चों के साथ अपने रिश्ते को मज़बूत और बेहतर बनाना चाहती हैं तो तैयारी शुरू कर दीजिए। खाने-पीने और कपड़ों का ध्यान रखने के अलावा अगर आप अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में भी मदद करती हैं, तो आप न सिर्फ उनका भविष्य सुधार सकती हैं, बल्कि इमोशनली भी उनसे ज़्यादा कनेक्ट हो सकती हैं।

जर्नल ऑफ डेवलेपमेंट एंड बिहेवियर पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक अगर आप बच्चों के साथ मिल-जुलकर पढ़ाई करेंगी तो आप एक बेहतर मां बन सकती हैं।

पढ़ाई के साथ व्यवहार में भी बनाएं अव्वल

अमेरिका की रटगर्स यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर और मुख्य शोधकर्ता मैनुएल जिमेन्ज का कहना है कि पढ़ाई में आपकी मदद से बच्चे न सिर्फ एकेडमिक बल्कि व्यावहारिक रूप से भी अच्छे इंसान बनते हैं। बच्चों की कामायबी में यह शोध एक निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है।

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2000 मां-बच्चों पर हुआ शोध

इस शोध में अमेरिका के 20 सबसे बड़े शहरों में रहने वाले मां-बचों की 2000 जोड़ियां शामिल हुई थीं। शोध के दौरान उनसे पूछा गया कि एक से लेकर तीन वर्ष तक उन्हें बच्चों को पढ़ाते हुए कैसा महसूस हुआ। इस दौरान उनके व्यवहार में किस तरह के बदलाव देखने को मिले। बता दें कि बच्चों के शारीरिक और मानसिक व्यवहार को लेकर दो साल बाद दोबारा उनसे सवाल किए गए थे। शोध के परिणामों से पता चला कि बच्चों के साथ पढ़ाई के जरिए लगातार जुड़े रहने वाले पैरेंट्स का बॉन्ड बच्चों के साथ ज़्यादा मज़बूत दिखा। इस शोध में न सिर्फ बच्चों के व्यवहार की जांच की गई, बल्कि मां के व्यवहार को लेकर भी साफ तौर पर निष्कर्ष सामने आए।

इसके अलावा अगर आप बतौर मां…

1. धैर्य से काम लेती हैं तो आप एक अच्छी मॉम हैं। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं वह नए चीज़ें खोजते हैं और सीखते हैं। ऐसे में कई बार वह लापरवाही भी कर सकते हैं। लेकिन ऐसे वक्त में आपको धैर्य से काम लेना चाहिए और उन पर चीखना या चिल्लाना नहीं चाहिए।

2. बच्चे सफलता का स्वाद चखने से पहले कई बार फेल भी होंगे। जैसे चलना या घुटने के बल चलना सीखते समय या अपने आप खाना खाना सीखना। ऐसे मौके पर आपको प्रोत्साहक होना पड़ेगा। अपने बच्चों का सपोर्ट करें ताकि वह ज़िंदगी हर मुश्किल का सामना आसानी से कर सकें।

3. एक अच्छी मां बनने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है समझदारी। आपको अपने बच्चों को सुनने के लिए समय निकालने और उनके दृष्टिकोण से एक स्थिति को समझने की कोशिश करने की ज़रूरत होती है।

4. इज़्ज़त कमाई जाती है, और आपको बच्चों को ये सीखना पड़ेगा। आप अपने बच्चे के सम्मान को पाने के लिए जो भी करेंगे, इसी से वह भी सीखेंगे कि उन्हें खुद का सम्मान कैसा करना है। जिन बच्चों को आत्म-सम्मान और दूसरों का सम्मान करना सिखाया जाता है, वे खुश, अधिक उदार और जीवनभर अच्छे रिश्ते बनाने में कामयाब होते हैं।

5. अपने बच्चों के लिए सुनिश्चित करें कि आप हमेशा मज़बूत बने रहें, क्योंकि वह रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आपको देख रहे हैं, यहीं से वह प्रेरित होंगे और उन्हें मुश्किल समय में भी जीवन जीने की ताकत मिलेगी।

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