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उगते सूरज के अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त सुबह 06:49 बजे

Ravi Pratap

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छठ का पर्व बिहार, पूर्वी उत्तर प्रेदश और झारखंड में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. ये पर्व सूर्य, प्रकृति, जल, वायु और उनकी बहन छठी मइया को समर्पित है. छठ में सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है. मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति अगर पूरे श्रद्धा भाव से व्रत कर के सूर्य देव की उपासना करता है और उन्हें अर्घ्य देता है तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं. चार दिनों तक चलने वाला छठ महापर्व 21 नवंबर को सुबह का अर्घ्य देने के साथ ही समाप्त हो जाएगा.

सूर्योदय अर्घ्य का समय

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को छठ पूजा का अंतिम दिन मनाया जाता है. इस दिन सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य देने की परंपरा है. 21 नवंबर को सूर्योदय का अर्घ्य दिया जाएगा. उगते सूरज के अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त सुबह 06:49 बजे है. इसके बाद पारण कर इस व्रत को पूरा किया जाता है. सूर्य को जल चढ़ाने के लिए तांबे के लोटे का उपयोग करना चाहिए. गिरते जल की धारा में सूर्यदेव के दर्शन करना चाहिए.

छठ पूजा या व्रत के लाभ क्या हैं?

ऐसी मान्यता है कि जिन लोगों को संतान न हो रही हो या संतान होकर बार बार समाप्त हो जाती हो ऐसे लोगों को इस व्रत से अदभुत लाभ होता है. अगर संतान पक्ष से कष्ट हो तो भी ये व्रत लाभदायक होता है. अगर कुष्ठ रोग या पाचन तंत्र की गंभीर समस्या हो तो भी इस व्रत को रखना शुभ होता है. जिन लोगों की कुंडली में सूर्य की स्थिति खराब हो अथवा राज्य पक्ष से समस्या हो ऐसे लोगों को भी इस व्रत को जरूर रखना चाहिए.

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छठ के बाद दस दिवसीय सामा-चकेवा उत्सव शुरू

Ravi Pratap

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मिथिलांचल अपनी लोक स्ंास्कृति, पर्व-त्योहार एवं पुनीत परंपरा के लिए प्रसिद्घ रहा है। इसी कड़ी में भाई-बहन के असीम स्न्ेह का प्रतीक लोक आस्था का पर्व सामा-चकेवा है। मिथिला की प्रसिद्घ संस्कृति व कला का एक अंग है सामा-चकेवा उत्सव।

आस्था का महापर्व छठ समाप्त होने के साथ ही भाई बहनों के अटूट स्नेह व प्रेम का प्रतीक सामा-चकेवा पर्व की शुरुआत हो चुकी है। सामा-चकेवा की मूर्ति निर्माण में बालिका व नवयुवती तन्मयता से लग गइंर्। ग्रामीण क्षेत्रों का चप्पा-चप्पा सामा-चकेवा की गीतों से अनुगूंजित है। मिथिलांचल में भाईयों के कल्याण के लिए बहना यह पर्व मनाती है। इस पर्व की चर्चा पुरानों में भी है। सामा-चकेवा पर्व की समाप्ति कार्तिक पूर्णिमा के दिन होगी।

इस पर्व के दौरान बहनें सामा, चकेवा, चुगला, सतभईयां को चंगेरा में सजाकर पारंपरिक लोकगीतों के जरिये भाईयों के लिए मंगलकामना करती है। सामा-चकेवा का उत्सव पारंपरिक लोकगीतों से है। संध्याकाल गाम के अधिकारी तोहे बड़का भैया हो़़़, छाऊर छाऊर छाऊर, चुगला कोठी छाऊर भैया कोठी चाऊर तथा साम चके साम चके अबिह हे, जोतला खेत मे बैसिह हे तथा भैया जीअ हो युग युग जीअ हो़़़ सरीखे गीत एवं जुमले के साथ जब चुगला दहन करती है तो वह दृश्य मिथिलांचल की मनमोहक पावन संस्कृति की याद ताजा कर देती है।

कार्तिक शुक्ल पंचमी से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक यह पर्व मनाया जाता है। माहात्म्य से जुड़ी इस पर्व के सम्बन्ध में कई किंवदंतियां है। अलबत्ता जो भी हो मिथिलांचल में भी तेजी से बढ़ रही बाजारवादी व शहरीकरण के बावजूद यहां के लोग अपनी संस्कृति को अक्षुण्न बनाये हुए हैं।

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छठ महापर्व पर्व का है इतना महत्व, अमेरिका में भी भारतीय-अमेरिकी लोग मनाते हैं छठ

Ravi Pratap

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छठ पर्व को भारत में ही नही दूसरे देशों में भी मनाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. इस पर्व को भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया. अमेरिका में पोटोमैक नदी (Potomac River) के किनारे 500 से अधिक भारतीय-अमेरिकी (Indian-Americans) हर्षोल्लास के साथ छठ पर्व मनाते हैं. इस पूजा उत्सव में बड़ी संख्या में लोग नदी के तट पर इक्कठे होते हैं और डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया. इस दौरान कई महिलाएं रंग-बिरंगी पारंपरिक साड़ियों में दिखती हैं।

नेपाली समुदाय भी होता है शामिल
पिछले कई वर्षों से भारतीय समुदाय के लोग छठ पूजा को मनाते आ रहे हैं. भारतीय समुदाय के साथ नेपाली समुदाय के लोग भी इस पूजा में शामिल होते हैं. इससे विदेश में छठ समारोह को एक अनूठा आयाम मिल रहा है.

इस तरह से हुई शुरुआत
पोटोमैक के पास स्थित एक पार्क में बैठे सिंह दंपति को एक दिन नदी के तट पर छठ को पारंपरिक तरीके से मनाने का विचार आया और इसे मनाने का फैसला किया. अनुमति के लिए उन्होंने पार्क के अधिकारियों से संपर्क किया. शुरुआती हिचकिचाहट और थोड़ा समझाने के बाद लाउडॉन काउंटी ने उन्हें अनुमति दे दी. अब यहां बड़े पैमाने पर बड़ी धूमधाम के साथ इस महापर्व को मनाया जाता है. सिंह ने कहा कि हर साल छठ मनाने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश है कि अपनी संस्कृति को विदेशी धरती पर भी जीवित रखा जाए.

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छठ पूजा के तीसरे और चौथे दिन संध्या और उषा अर्घ्य, जानें इसका महत्व और मुहूर्त

Ravi Pratap

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इस बार छठ पर्व 18 नवंबर से 20 नवंबर 2020 के मध्य मनाया जाएगा। छठ पूजा में सूर्य देव और छठी मैया की पूजा का प्रचलन और उन्हें अर्घ्य देने का विधान है। छठ पूजा का व्रत महिलाएं अपनी संतान की रक्षा और पूरे परिवार की सुख शांति का वर मांगाने के लिए करती हैं। मान्यता अनुसार इस दिन निःसंतानों को संतान प्राप्ति का वरदान देती हैं छठ मैया।

18 नंबर को नहाय खाये मनाया गया जिसमें साफ-सफाई और शुद्ध शाकाहारी भोजन सेवन का पालन किया गया। सूर्य और छठी मैया को घर में स्थापित कर उनका पूजा किया गया। दूसरे दिन अर्थात 19 नवंबर को खरना। खरना में महिलाएं नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनती हैं और नाक से माथे के मांग तक सिंदूर लगाती हैं। दिनभर व्रत रखने के बाद शाम के समय लकड़ी के चूल्हे पर साठी के चावल और गुड़ की खीर बनाकर प्रसाद तैयार करती हैं। पूजा के बाद उसे ही खाती है और घर के अन्य सदस्यों को प्रसाद रूप में इसे दिया जाता है। इस भोजन को ग्रहण करने के बाद ही व्रती महिलाओं का 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है। मान्यता है कि खरना पूजा के बाद ही घर में देवी षष्ठी (छठी मइया) का आगमन हो जाता है। तब तीसरा दिन और चौथा दिन सबसे महत्वपूर्ण होता है जिसे सांध्य और उषा अर्घ्‍य कहा जाता है।

संध्या अर्घ्य : षष्ठी के दिन ही छठ पूजा और पर्व रहता है। इस दिन संध्या अर्घ्य का महत्व है। इस दिन कार्तिक शुक्ल की षष्ठी होती है। संध्या षष्ठी को अर्घ्य अर्थात संध्या के समय सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है और विधिवत पूजन किया जाता है। इस समय सूर्य अपनी पत्नी प्रत्यूषा के साथ रहते हैं। इसीलिए प्रत्यूषा को अर्घ्य देने का लाभ मिलता है। कहते हैं कि शाम के समय सूर्य की आराधना से जीवन में संपन्नता आती है।

शाम को बांस की टोकरी में ठेकुआ, चावल के लड्डू और कुछ फल रखें जाते हैं और पूजा का सूप सजाया जाता है और तब सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और इसी दौरान सूर्य को जल एवं दूध चढ़ाकर प्रसाद भरे सूप से छठी मैया की पूजा भी की जाती है। बाद में रात्रि को छठी माता के गीत गाए जाते हैं और व्रत कथा सुनी जाती है।उषा अर्घ्य : उषा अर्घ्य अर्थात इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले नदी के घाट पर पहुंचकर उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। षष्ठी के दूसरे दिन सप्तमी को उषाकाल में सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है जिसे पारण कहते हैं। अंतिम दिन सूर्य को वरुण वेला में अर्घ्य दिया जाता है। यह सूर्य की पत्नी उषा को दिया जाता है। इससे सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है।

पूजा के बाद व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर और थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत को पूरा करती हैं, जिसे पारण या परना कहा जाता है। यह छठ पर्व का समापन दिन होता है। यह मुख्य रूप से यह लोकपर्व है जो उत्तर भारत के राज्य पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के लोग ही मनाते हैं। यहां के लोग देश में कहीं भी हो वे छठ पर्व की पूजा करते हैं।

सांध्य अर्घ्य का मुहूर्त : इस दिन सूर्यादय 06:48 बजे पर होगा और सूर्योस्त 05:26 बजे पर होगा। छठ पूजा के लिए षष्ठी तिथि का प्रारम्भ 19 नवंबर को रात 09:59 बजे से हो रहा है, जो 20 नवंबर को रात 09:29 बजे तक है।… संध्या सूर्य अर्घ्य: 20 नवंबर, दिन शुक्रवार, सूर्योदय: 06:48 बजे और सूर्यास्त: 05:26 बजे।

उषा अर्घ्य : इस वर्ष छठ पूजा का सूर्योदय अर्घ्य तथा पारण 21 नवंबर को होगा इस दिन सूर्योदय सुबह 06:49 बजे तथा सूर्योस्त शाम को 05:25 बजे होगा।

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