एक ऐसा सांसद जिनके पास है मिट्टी का घर और बांस की छत, मोदी सरकार में बने राज्यमंत्री
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एक ऐसा सांसद जिनके पास है मिट्टी का घर और बांस की छत, मोदी सरकार में बने राज्यमंत्री

Ravi Pratap

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ओडिशा से सांसद चुनकर आए प्रताप सारंगी को मोदी कैबिनेट में राज्‍यमंत्री का पद मिला है। लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा और खासतौर पर नरेंद्र मोदी को पूरे देश में जबरदस्त जन समर्थन मिला।

कई ऐसे नेता सांसद चुनकर आए हैं, जो वास्तव में जमीन से जुड़े हैं और बेहद सादगी के साथ जनता के बीच रह कर काम कर रहे हैं। ऐसे ही एक सांसद हैं ओडिशा की बालासोर सीट से जीते प्रताप चंद्र सारंगी। सारंगी को ‘ओडिशा का मोदी’ कहा जाता है।

उन्होंने बीजू जनता दल (BJD) के रविंद्र कुमार जैना को एक लाख से ज्यादा वोटों से हराया। 2014 में जैना ने सारंगी को हराया था, लेकिन इस बार यह शख्स संसद पहुंचने में कायमाब रहा। सारंगी के सांसद चुने जाने के बाद सोशल मीडिया पर उनकी जबरदस्त चर्चा है। खासतौर पर ट्विटर पर उनकी तस्वीरें वायरल हो रही हैं।

प्रताप चंद्र सारंगी का जन्म ओडिशा के एक बेहद गरीब परिवार में हुआ। वे शुरू से धार्मिक प्रवृत्ति के थे और साधु बनना चाहते थे। नीलगिरी के फकीर मोहन कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद वे साधु बनने के लिए रामकृष्ण मठ चले गए। वहां लोगों को पता चला कि उनकी मां विधवा हैं और परिवार में कोई नहीं है तो सलाह दी कि वे घर जाएं और मां की सेवा करें।

सारंगी ने शादी नहीं की और अपना पूरा जीवन जनसेवा में लगा दिया है। ये एक छोटे से घर में रहते हैं और साइकिल पर चलते हैं। इनके पास सम्पत्ति के नाम पर कुछ नहीं है। परिवार में माताजी थीं, जिनका बीते साल निधन हो चुका है।

संसदीय क्षेत्र में सारंगी की पहचान ऐसे शख्स के रूप में हैं, जो धर्म और आस्था से जुड़ा है और निःस्वार्थ भाव से लोगों की भलाई के लिए काम करता है। ये बच्चों को पढ़ाते हैं और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

Input : Mnaiduniya

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प्रांजल बनीं भारत की पहली नेत्रहीन महिला IAS, प्रेरणादायक है इनकी कहानी

Ravi Pratap

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कहते हैं कि सफलता उन्हें ही मिलती है तो उसे पाने के लिए पूरी ताकत लगा देते हैं फिर रास्ते में कितनी भी बाधाएं आएं। इसी का उदाहरण है महाराष्ट्र की प्रांजल। प्रांजल की आंखें नहीं है, लेकिन उनकी हिम्मत और हौसला बहुत बड़ा है।

उनकी मेहनत और लगन थी जिसकी बदौलत वो पहली नेत्रहीन महिला आईएएस (IAS) बनी हैं और तिरुवनंतपुरम में सब कलेक्टर का चार्ज संभाल लिया है। महाराष्ट्र के उल्लासनगर में रहने वाली प्रांजल की आंखें बचपन से ही कमजोर थी। धीरे-धीरे उनकी रोशनी कम होती गई और छह साल की उम्र में उनकी दोनों आंखों की रोशनी पूरी तरह से चली गई। इसके बावजूद भी उन्होंने हार नहीं मानी बल्कि अपनी असक्षमता को मिसाल बनाकर बाकी लड़कियों के लिए प्रेरणा बनीं।

 

सब कलेक्टर का चार्ज संभालते हुए प्रांजल ने कहा, “हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए, न ही हमें कभी किसी काम को बीच में छोड़ देना चाहिए। अपने प्रयास से एक दिन हम वो जरूर पा लेते हैं जो हम चाहते हैं।”

प्रांजल ने अपने पहले ही प्रयास में उन्होंने यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा में 773वीं रैंक हासिल कर के साबित कर दिया कि मेहनत से कुछ भी पाया जा सकता है। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा मुंबई के श्रीमति कमला मेहता स्कूल से पूरी की, ये स्कूल दिव्यांगों के लिए ही है। यहां पर ब्रेल लिपि में पढ़ाई कराई जाती है। प्रांजल ने अपनी 10 वीं तक की पढ़ाई यहीं से की। इसके बाद उन्होंने चंदाबाई कॉलेज से ऑर्टस में 12वीं की परीक्षा पास की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज में दाखिला लिया और उसके बाद जेएनयू यूनिवर्सिटी से एमए किया।

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आंइस्टीन को चुनौती देने वाला बिहारी जिन्होंने NASA के Appolo की कैलकुलेशन कंप्यूटर से पहले की थी

Ravi Pratap

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एक बूढ़े आदमी हाथ में पेंसिल लेकर यूंही पूरे घर में चक्कर काट रहे हैं. कभी अख़बार, कभी कॉपी, कभी दीवार, कभी घर की रेलिंग, जहां भी उनका मन करता, वहां कुछ लिखते, कुछ बुदबुदाते हुए.

घर वाले उन्हें देखते रहते हैं, कभी आंखों में आंसू तो कभी चेहरे पर मुस्कराहट ओढ़े.

यह 70 साल का ‘पगला सा’ आदमी अपने जवानी में ‘वैज्ञानिक जी’ के नाम से मशहूर था. मिलिए महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह से.

तकरीबन 40 साल से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित वशिष्ठ नारायण सिंह पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिता रहे हैं. अब भी किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त है.

पटना में उनके साथ रह रहे भाई अयोध्या सिंह बताते है, “अमरीका से वह अपने साथ 10 बक्से किताबें लाए थे, जिन्हें वह आज भी पढ़ते हैं. बाकी किसी छोटे बच्चे की तरह ही उनके लिए तीन-चार दिन में एक बार कॉपी, पेंसिल लानी पड़ती है.’

वशिष्ठ नारायण सिंह ने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी. उनके बारे में मशहूर है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था.

पटना साइंस कॉलेज में बतौर छात्र ग़लत पढ़ाने पर वह अपने गणित के अध्यापक को टोक देते थे. कॉलेज के प्रिंसिपल को जब पता चला तो उनकी अलग से परीक्षा ली गई जिसमें उन्होंने सारे अकादमिक रिकार्ड तोड़ दिए.

पांच भाई-बहनों के परिवार में आर्थिक तंगी हमेशा डेरा जमाए रहती थी. लेकिन इससे उनकी प्रतिभा पर ग्रहण नहीं लगा.

प्रतिभा की पहचान
वशिष्ठ नारायण सिंह जब पटना साइंस क़ॉलेज में पढ़ते थे तभी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैली की नज़र उन पर पड़ी. कैली ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और 1965 में वशिष्ठ नारायण अमरीका चले गए.

बीमारी और सदमा
इस असामान्य व्यवहार से वंदना भी जल्द परेशान हो गईं और तलाक़ ले लिया. यह वशिष्ठ नारायण के लिए बड़ा झटका था.

तक़रीबन यही वक्त था जब वह आईएसआई कोलकाता में अपने सहयोगियों के बर्ताव से भी परेशान थे.

भाई अयोध्या सिंह कहते हैं, “भइया (वशिष्ठ जी) बताते थे कि कई प्रोफ़ेसर्स ने उनके शोध को अपने नाम से छपवा लिया, और यह बात उनको बहुत परेशान करती थी. ”

साल 1974 में उन्हें पहला दौरा पड़ा, जिसके बाद शुरू हुआ उनका इलाज. जब बात नहीं बनी तो 1976 में उन्हें रांची में भर्ती कराया गया.

घरवालों के मुताबिक़ इलाज अगर ठीक से चलता तो उनके ठीक होने की संभावना थी. लेकिन परिवार ग़रीब था और सरकार की तरफ से मदद कम.

1987 में वशिष्ठ नारायण अपने गांव लौट आए. लेकिन 89 में अचानक ग़ायब हो गए. साल 1993 में वह बेहद दयनीय हालत में डोरीगंज, सारण में पाए गए.

‘रद्दी हो जाएगा सब’


आर्मी से सेवानिवृत्त डॉ वशिष्ठ के भाई अयोध्या सिंह बताते हैं, ” उस वक्त तत्कालीन रक्षा मंत्री के हस्तक्षेप के बाद मेरा बेंगलुरु तबादला किया गया जहां भइया का इलाज हुआ. लेकिन फिर मेरा तबादला कर दिया गया और इलाज नहीं हो सका. तब से अब तक वह घर पर हैं.”

डॉ वशिष्ठ का परिवार उनके इलाज को लेकर अब नाउम्मीद हो चुका है. घर में किताबों से भरे बक्से, दीवारों पर वशिष्ठ बाबू की लिखी हुई बातें, उनकी लिखी कॉपियां अब उनको डराती हैं. डर इस बात का कि क्या वशिष्ठ बाबू के बाद ये सब रद्दी की तरह बिक जाएगा.

जैसी कि उनकी भाभी प्रभावती कहती भी हैं, “हिंदुस्तान में मिनिस्टर का कुत्ता बीमार पड़ जाए तो डॉक्टरों की लाइन लग जाती है. लेकिन अब हमें इनके इलाज की नहीं किताबों की चिंता है. बाक़ी तो यह पागल खुद नहीं बने, समाज ने इन्हें पागल बना दिया.”

Input : BBC

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INDIA

शहीद-ए आजम के जन्‍मदिन पर विशेष : आजादी के मतवाले भगत सिंह की गौरवशाली गाथा

Ravi Pratap

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भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के लायलपुर जिले (अब पाकिस्‍तान) के एक सिख परिवार में हुआ था. हालांकि उनके जन्‍म की तारीख पर कुछ विरोधाभास की स्थिति है. कुछ जगहों पर 27 सितंबर को उनके जन्‍मदिन का जिक्र मिलता है. उनके परिवार को देशभक्‍त होने के कारण ब्रिटिश राज के उस दौर में बागी माना जाता था।

लाहौर में स्‍कूली शिक्षा के दौरान ही उन्‍होंने यूरोप के विभिन्‍न देशों में हुई क्रांतियों का अध्‍ययन किया. 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्‍याकांड ने उन पर गहरा असर डाला और गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत की आजादी के सपने देखने लगे.

1923 में उन्‍होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया. इस कॉलेज की शुरुआत लाला लाजपत राय ने की थी. कॉलेज के दिनों में उन्‍होंने एक्‍टर के रूप में कई नाटकों मसलन राणा प्रताप, सम्राट चंद्रगुप्‍त और भारत दुर्दशा में हिस्‍सा लिया. उसी दौरान उन्‍होंने पंजाब हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता भी जीती. उस प्रतियोगिता में पंजाब की समस्‍याओं पर लिखने को कहा गया था.

महात्‍मा गांधी ने जब 1922 में चौरीचौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन को खत्‍म करने की घोषणा की तो भगत सिंह का अहिंसावादी विचारधारा से मोहभंग हो गया. उन्‍होंने 1926 में देश की आजादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्‍थापना की. चंद्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिंदुस्‍तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जड़े. इसके बाद इस संगठन का नाम हिंदुस्‍तान सोशलिस्‍ट रिपब्लिकन एसोसिएशन हो गया

असहयोग आंदोलन समाप्‍त होने के बाद जब हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे तो उनको गहरी निराशा हुई. उसी दौर में उन्‍होंने अपने धार्मिक विश्‍वासों को त्‍याग दिया और वह यह मानने लगे कि आजादी के लिए क्रांतिकारी संघर्ष में धर्म एक बाधा है. उन्‍होंने बाकुनिन, लेनिन, ट्रॉटस्‍की जैसे नास्तिक क्रांतिकारियों के विचारों का गहरा अध्‍ययन शुरू किया. 1930 में लाहौर सेंट्रल जेल में उन्‍होंने अपना प्रसिद्ध निबंध ”मैं नास्तिक क्‍यों हूं” (व्‍हाई एम एन एथीस्‍ट) लिखा.

परिजनों ने जब उनकी शादी करनी चाही तो वह घर छोड़कर कानपुर भाग गए. अपने पीछे जो खत छोड़ गए उसमें उन्‍होंने लिखा कि उन्‍होंने अपना जीवन देश को आजाद कराने के महान काम के लिए समर्पित कर दिया है. इसलिए कोई दुनियावी इच्‍छा या ऐशो-आराम उनको अब आकर्षित नहीं कर सकता.

लाहौर षड़यंत्र केस में उनको राजगुरू और सुखदेव के साथ फांसी की सजा हुई और 24 मई 1931 को फांसी देने की तारीख नियत हुई. लेकिन नियत तारीख से 11 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को उनको शाम साढ़े सात बजे फांसी दे दी गई. कहा जाता है कि जब उनको फांसी दी गई तब वहां कोई मजिस्‍ट्रेट मौजूद नहीं था जबकि नियमों के मुताबिक ऐसा होना चाहिए था.

Input : NDTV (Atul Chaturvedi)

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