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क्या बिहार के डीजीपी ने दे दिया इस्तीफा? जानिए खुद गुप्तेश्वर पांडेय ने ट्वीट कर क्या कहा?

Ravi Pratap

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बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय खबरों की दुनियां में बने रहते हैं। सुशांत केस में भी उनकी सक्रियता चर्चा में रही। इधर एक बार फिर डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय के अचानक इस्तीफा देने की खबर से बिहार प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर गहमागहमी फैल गई।

हालांकि यह खबर कहां से आई इसके बारे में जानकारी नहीं लेकिन रविवार की देऱ शाम से यह खबर बड़ी तेजी से फैली। इस संबंध में डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय से पूछा तो उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से अफवाह है। इस खबर में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है। जिस किसी ने भी इस तरह की खबर फैलाई वह पूरी तरह से गलत है। उन्होंने कहा कि इसे आप किस स्तर की पत्रकारिता कहेंगे?

डीजीपी ने इसके बाद ट्वीट कर खबर के झूठी होने की सूचना देते हुए लिखा कि अभी बिहार के एक पोर्टल न्यूज ने मेरे नौकरी से इस्तीफा देने के बारे में एक झूठी खबर चला कर सनसनी फैला दी है। इसको किस स्तर की पत्रकारिता कहेंगे आप?

रिया चक्रवर्ती पर ‘औकात’ वाले बयान पर ट्रोल हुए थे डीजीपी
सुशांत सिंह राजपूत केस में रिया चक्रवर्ती पर अपने बयान ‘औकात’ पर सोशल मीडिया में ट्रोल हुए थे डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय। ट्रोल होने के बाद बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय ने अपनी सफाई दी। डीजीपी ने एक बयान में कहा था कि औकात (Aukat) का अंग्रेजी में मतलब ‘कद’ (stature) से है। और रिया चक्रवर्ती(Rhea Chakraborty) का ऐसा कद नहीं है कि वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर कोई कमेंट कर सके। कहा कि उसे नहीं भूलना चाहिए कि वह सुशांत सिंह राजपूत केस (Sushant Singh Rajput case) में नामजद आरोपी है। जो केस मेरे पास था और अब सीबीआई के पास है।

डीजीपी ने कहा था कि अगर कोई राजनीतिक नेता बिहार के सीएम पर टिप्पणी करता है तो मैं इस पर टिप्पणी करने वाला कोई नहीं हूं। लेकिन अगर कोई आरोपी बिहार के सीएम पर कुछ बेबुनियाद टिप्पणी करता है तो यह आपत्तिजनक है। रिया चक्रवर्ती की टिप्पणी अनुचित थी उसे अपनी लड़ाई कानूनी रूप से लड़नी चाहिए।

2009 में चुनाव लड़ने के लिए लिया था वीआरएस
उल्लेखनीय है कि बिहार कैडर के 1987 बैच के IPS गुप्तेश्वर पांडेय ने 2009 में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए वीआरएस ले लिया था। वे बीजेपी के टिकट पर बक्सर सीट से लड़ना चाहते थे। टिकट नहीं मिलने पर आईपीएस गुप्तेश्वर पांडेय ने वीआरएस वापस लेने की अर्जी दी। जिसे नीतीश सरकार ने मंजूर करके करीब 9 महीने बाद उन्हें एक बार फिर सर्विस में रख लिया और लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें प्रमोशन देते हुए बिहार का डीजीपी बना दिया गया।

Input : Live Hindustan

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बिहार बीजेपी ने अपने दो वर्तमान विधायकों समेत 7 नेताओं को पार्टी से निकाला

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पटना. बिहार के चुनावी माहौल (Bihar Assembly Election 2020) में बीजेपी की प्रदेश इकाई ने अपने दो वर्तमान विधायकों सहित सात नेताओं के विरुद्ध कार्रवाई की है. बिहार बीजेपी (Bihar BJP) के अध्यक्ष संजय जायसवाल (Sanjay Jaiswal) ने रक्सौल से विधायक अजय कुमार सिंह और बगहा के विधायक आर.एस पांडेय को छह साल के लिए पार्टी से निष्काषित कर दिया है. इन दोनों विधायकों ने टिकट कटने के बाद बागी तेवर (Rebel BJP Leaders) अपनाते हुए पार्टी के खिलाफ यहां से चुनाव मैदान में हैं.

इसके अलावा पार्टी ने पांच अन्य नेताओं के खिलाफ भी कार्रवाई करते हुए उन्हें भी छह साल के निष्काषित कर दिया है. बिहार बीजेपी द्वारा जिन पांच लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है उनमें चार पूर्व विधायक और एक पूर्व सांसद के नाम शामिल हैं.

इन नेताओं पर भी बिहार बीजेपी ने की कार्रवाई

विश्वमोहन कुमार, पूर्व सांसद, सुपौल

विजय गुप्ता, पूर्व विधायक, सुगौली

प्रदीप दास, पूर्व विधायक, कसबा

विभास चंद्र चौधरी, पूर्व विधायक, बरारी

किशोर कुमार मुन्ना, पूर्व विधायक, सुपौल

12 अक्टूबर को भी निष्काषित हुए थे बिहार बीजेपी के 9 बागी नेता

इससे पहले, संजय जायसवाल ने 12 अक्टूबर को भी बिहार बीजेपी के नौ बागी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निष्काषित कर दिया था. जिन नौ बागी नेताओं के खिलाफ यह कार्रवाई हुई थी, उनके नाम हैं- राजेंद्र सिंह, रामेश्वर चौरसिया, उषा विद्यार्थी, रविंद्र यादव, श्वेता सिंह, इंदु कश्यप, अनिल कुमार, मृणाल शेखर और अजय प्रताप.

बिहार में बीजेपी 112 और जेडीयू 115 सीटों पर लड़ रहे चुनाव

बता दें कि बिहार में बीजेपी सीटों पर 112 चुनाव लड़ रही है वहीं उसकी सहयोगी जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. बीजेपी ने अपने कोटे से मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी को नौ सीटें दी हैं जबकि जेडीयू ने भी जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम पार्टी को अपने खाते से सात सीटें दी हैं.

बिहार में विधानसभा की 243 सीटों के लिए तीन चरणों में चुनाव होना है. इसके तहत प्रथम चरण के लिए 28 अक्टूबर को 71 सीटों पर, दूसरे चरण के लिए तीन नवंबर को 94 सीटों पर और तीसरे चरण के लिए सात नवंबर को 78 सीटों पर मतदान होगा. वोटों की गिनती 10 नवंबर को होगी.

Source : News18

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दशहरा पर्व के अवसर पर विधि व्यवस्था एवं शांति व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु प्रसाशन का सख्त आदेश

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दुर्गा पूजा के अवसर पर विधि व्यवस्था एवं सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखने तथा विशेष चौकसी बरतने के साथ यथेष्ट एहतियाती एवं निरोधात्मक करवाई सुनिश्चित करने के मद्देनजर संयुक्त आदेश जारी किया गया है।

सभी अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी और अनुमंडल अधिकारी को निर्देशित किया गया है कि उनके द्वारा सुनिश्चित किया जाएगा कि पूजा संबंधी किसी कार्यक्रम में चुनाव आचार संहिता एवं भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश का उल्लंघन न हो।

पूजा का आयोजन मन्दिरों में या निजी रूप से घर पर ही किया जाय

दुर्गा पूजा का आयोजन मंदिरों में या निजी रूप से घर पर ही किया जाएगा। मंदिरों में दुर्गा पूजा के आयोजन के मद्देनजर निर्देश दिए गए हैं कि मंदिर में पूजा पंडाल, मंडप का निर्माण किसी विशेष कार्य पर नहीं किया जाएगा। इसके आस-पास कोई तोरण द्वार अथवा स्वागत द्वार नहीं बनाया जाएगा। जिस जगह मूर्तियां रखी गई है उसे स्थान को छोड़कर शेष भाग खुला रहेगा। सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली का उपयोग नहीं किया जाएगा। इस अवसर पर किसी प्रकार के मेला का आयोजन नहीं किया जाएगा। पूजा स्थल के आस-पास खाद्द पदार्थ का स्टॉल नहीं लगाया जाएगा। किसी प्रकार के विसर्जन जुलूस की अनुमति नहीं दी जाएगी। कोई सामाजिक भोज/ प्रसाद या भोग का वितरण नहीं किया जाएगा। आयोजकों और पूजा समितियों के द्वारा किसी रूप से आमंत्रण पत्र जारी नहीं किया जाएगा। मंदिर में पूजा पंडाल /मंडप के उद्घाटन के लिए कोई सार्वजनिक समारोह आयोजित नहीं किए जाएंगे। मंदिर में पूजा के आयोजकों द्वारा पर्याप्त सेनीटाइजर की व्यवस्था की जाएगी। कोविड-19 के संक्रमण रोकने के संबंध में केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा निर्धारित मापदंड का पालन करना वहां करना अनिवार्य होगा।

कोई डांडिया/रामलीला का प्रदर्शन नही होगा

किसी भी सार्वजनिक स्थल,होटल,क्लब आदि पर दाण्डिया ,रामलीला का आयोजन नहीं होगा। सार्वजनिक,स्थानों पर फेस मास्क का उपयोग करना/ समाजिक दूरी का अनुपालन सुनिश्चित कराया जाना अनिवार्य होगा। उक्त दिशा निर्देश का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 51-60 के प्रवधानों के अतिरिक्त आईपीसी की धारा 188 एवं अन्य सुसंगत धाराओं के अधीन कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने वालो पर होगी कड़ी कार्रवाई

निर्देश दिया गया है कि विवाद की घटनाओं से फैलने वाले अफवाहों पर अंकुश लगाया जाए। यानी किसी भी तरह की अफवाह फैलाने वाले और समाजिक सद्भावना को बिगाड़ने वाले तत्वों पर कड़ी कार्रवाई करना सुनिश्चित करें। असामाजिक तत्वों के साथ-साथ सामाजिक/ संप्रदायिक समरसता प्रभावित करने वाले तत्वों पर कड़ी निगरानी रखते हुए वैधानिक एवं यथोचित प्रशासनिक कार्रवाई की जाए। संप्रदायिक तत्वों को चिन्हित करते हुए उनके विरुद्ध निरोधात्मक कार्रवाई की जाए। सभी संवेदनशील क्षेत्रों पर बिशेष चौकसी बरती जाए। दुर्गा पूजा दशहरे के अवसर पर यदि कोई व्यक्ति धर्म, नस्ल, भाषा के आधार पर नफरत फैलाने की कोशिश करते हुए पाए जाते हैं जाता है तो उनके विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए। सभी थानाध्यक्षों को निर्देश दिया गया है कि दुर्गा पूजा के अवसर पर विधि व्यवस्था संधारण एवं असामाजिक तत्वों पर निगरानी रखने के लिए सीसीटीवी कैमरा मंदिरों में पूजा समिति की आयोजकों से लगवाना सुनिश्चित करेंगे। जिले में शांति बनाए रखने और संप्रदायिक परिस्थितियों से निपटने की। पूर्ण जिम्मेदारी प्रतिनियुक्त दंडाधिकारी एवं पुलिस अधिकारियों की होगी।

नियंत्रण कक्ष

दुर्गा पूजा के अवसर पर स्थानीय पी आई आर में विधि व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिला नियंत्रण कक्ष की स्थापना की गई है जो 26 अक्टूबर की रात्रि 10:00 बजे तक कार्यरत रहेगा।नियंत्रण कक्ष का दूरभाष संख्या -0621 2212377 एवं 2216275 है।

जिला परिवहन पदाधिकारी, सिविल सर्जन, यातायात डीएसपी, अग्निशमन पदाधिकारी को भी विशेष उत्तरदायित्व सौंपे गए है। राजेश कुमार अपर समाहर्ता मुजफ्फरपुर एवं राजेश कुमार सिटी एसपी मुजफ्फरपुर संपूर्ण जिले के विधि व्यवस्था के संपूर्ण प्रभार में रहेंगे।

सभी प्रतिनियुक्त दंडाधिकारी पुलिस अधिकारियों एवं पुलिस बल को सौंपे गए दायित्वों का निर्वहन कर्मठता के साथ दायित्वपूर्ण ढंग से करने का निर्देश दिया गया है।

दशहरा पर्व के अवसर पर विधि व्यवस्था एवं शांति व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु थानावार 295 स्थलों पर पर्याप्त संख्या दण्डाधिकार्यो,पुलिस पदाधिकारियों एवं सूचना संग्रहण तथा समन्वय स्थापित करने हेतु पदाधिकारियों एवं पुलिस बलों की प्रतिनियुक्ति की गई है।

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BIHAR

क्या बिहार की हवा तेजस्वी के पक्ष में बहने लगी है?

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एक बड़ी अंतर्दृष्टि से भरी किताब है- ‘टॉकिंग टु माई डॉटर: अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ कैपिटलिज़्म.’ इसके लेखक हैं यानिस वारौफ़किस, जो यूनान के संकट में वित्त मंत्री भी बने. अर्थशास्त्री और दार्शनिक के रूप में उनकी ख्याति रही है. वे अर्थशास्त्र के इस ज़िक्र में साहित्य और सिनेमा भी लाते हैं. किताब उन्होंने अपनी पंद्रह साल की बिटिया को संबोधित करते हुए लिखी है- तो बहुत सरल भाषा में है.

रौफ़किस कहते हैं कि कई बार भविष्यवाणियां इसलिए सच हो जाती हैं कि वे होती हैं. वे न होतीं तो सच भी न होतीं. वे सोफोक्लीज़ के नाटक ‘इडिपस रेक्स’ का उदाहरण देते हैं. इडिपस के होने वाले सम्राट पिता ने ज्योतिषी से बच्चे का भविष्य पूछा तो ज्योतिषी ने बताया कि यह अपने पिता का हत्यारा होगा. इडिपस के पिता ने बच्चे को पैदा होते ही मार देने का आदेश दिया. रानी बच्चे को मार तो न सकीं, लेकिन एक सेवक को उन्होंने बच्चे को दूर एक पहाड़ पर रख आने को कहा. वहां से बच्चा दूसरे राज्य के राजा के यहां पला. यहां एक दूसरे ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि इडिपस अपनी माता से विवाह करेगा. दुखी इडिपस ने राज्य छोड़ दिया. वापसी में अपने पिता से ही उसका युद्ध हुआ जिसमें उसने पिता को पराजित किया और मार डाला. राज्य के नियम के अनुसार अपनी माता से उसका विवाह हुआ.

वारौफ़किस कहते हैं कि अगर यह भविष्यवाणी न हुई होती कि बच्चा पिता की हत्या करेगा तो शायद वह सच न हुई होती क्योंकि तब बच्चा अपने पिता के पास ही पलता. इसी तरह माता से विवाह की दूसरी भविष्यवाणी न हुई होती तो वह भी सच नहीं होती- क्योंकि तब इडिपस ने घर नहीं छोड़ा होता.

हालांकि वारौफ़किस जो बात कहते हैं, वह भारतीय राजनीति पर जैसे उलटी पड़ती है. यहां चुनावों में भविष्यवाणियां सिर के बल गिरती रही हैं. 1980 में किसी को इंदिरा गांधी की वापसी की उम्मीद नहीं थी. लेकिन वे शान से लौटीं. 1984 में अख़बार राजीव गांधी को हरा रहे थे. वे ऐसे जीते जैसे आज तक कोई नहीं जीत पाया. 2004 में अटल-आडवाणी की महाकाय छवि के आगे कांग्रेस बौनी लगती थी. मगर यूपीए को बहुमत मिला. 2014 में किसी ने नरेंद्र मोदी को इतना विराट बहुमत मिलने की उम्मीद नहीं की थी- 2019 में अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ने की भी नहीं, लेकिन मोदी जी ने यह किया. राज्यों में चुनावी भविष्यवाणियों के मुंह के बल गिरने के उदाहरण इससे भी ज़्यादा हैं.

अब बिहार के चुनाव हमारे सामने हैं. सवाल यह है कि वारौफ़किस का सिद्धांत चलेगा या भारतीय राजनीति की सच्चाई? जवाब पहली नज़र में आसान है. अनुभव बताते हैं कि पूर्वानुमान लुढ़कते रहे हैं. लेकिन ऐसे भी कई मौक़े आए हैं जब लोगों ने हवा ठीक-ठीक पहचानी है और ऐसे भी मौक़े आए हैं जब हवा बनाई गई है. वारौफ़किस का सिद्धांत ऐसी हवा बनाने वालों को एक अवसर देता है.

तो बिहार में क्या कोई हवा है? इसके बारे में निश्चयपूर्वक कुछ भी कहना मुश्किल है. दुर्भाग्य से बुरी तरह बंटे हुए समाज में बंटा हुआ मीडिया सिर्फ वही देखने को तैयार है जो वह देखना चाहता है. लेकिन कम से कम दो चीज़ें ऐसी हैं जो फिलहाल लोगों को एक राय बनाने का अवसर दे रही हैं. पहली बात तो हाल में आए वे चुनाव सर्वेक्षण हैं जो बता रहे हैं कि एनडीए और महागठबंधन के बीच का फ़ासला कम हो रहा है. इसी तरह मुख्यमंत्री पद की प्रतिद्वंद्विता के मामले में भी नीतीश और तेजस्वी के बीच की दूरी घटी है. बेशक, अब भी नीतीश आगे हैं, लेकिन पहले उनकी जो असंदिग्ध और अलंघ्य लगने वाली बढ़त होती थी, वह सिमट रही है.

दूसरी बात बिहार में हो रही रैलियों में आ रहे चेहरों को करीब से देखने से साफ़ होती है. इस बात के ज़िक्र से पहले बरसों पहले पढ़े एक राजनीतिक किस्से का ज़िक्र समीचीन होगा. सन 77 में राजस्थान में कहीं इंदिरा गांधी की रैली हो रही थी. मुख्यमंत्री (संभवतः हरिदेव जोशी) ने भीड़ देखकर इंदिरा जी से कहा कि उनकी जीत पक्की है. इंदिरा गांधी ने कहा कि आप भीड़ देख रहे हैं, भीड़ में मौजूद चेहरे नहीं देख रहे. वे बुझे हुए चेहरे हैं.

चार दशक से ज़्यादा पुरानी यह कहानी बिहार की रैलियां देखते हुए याद आ रही है. तेजस्वी की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ में एक स्वतःस्फूर्त उत्साह दिखता है, सत्ता-परिवर्तन का जज़्बा दिखता है. जबकि प्रधानमंत्री की पहले दिन की रैलियों में भी भीड़ में ऐसा उत्साह नहीं दिखा. जिस प्रधानमंत्री के मंच पर आते ही मोदी-मोदी के नारे लगा करते हों, उनके सामने भीड़ उबासी लेती या अन्यमनस्क दिखे तो इसका भी अपना एक इशारा है. इस बात को फिर नीतीश और तेजस्वी की मुद्राओं में देखा जा सकता है. नीतीश कुमार में उनकी पुरानी सौम्यता की जगह एक चिड़चिड़ाहट ने ले ली है, तेजस्वी के चेहरे पर एक उत्साह दिखता है.

बेशक, इस चिड़चिड़ाहट में कुछ योगदान चिराग पासवान का भी होगा जिनके साथ बीजेपी के रहस्यमय रिश्ते की चर्चा अपने गठबंधन के भीतर नीतीश को बार-बार विचलित करती होगी. ख़ास बात यह है कि लालू यादव के भदेस से काफ़ी दूर खड़े तेजस्वी ज़रूरत पड़ने पर चुटकियां लेने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

ख़ैर, फिर दुहराने की ज़रूरत है कि ऐसे इशारों या ऐसी मुद्राओं से चुनाव नहीं जीते जाते. जनता का मन पढ़ना-पकड़ना आसान नहीं होता. फिर आज के चुनावों में पैसे और बाहुबल से भी नतीजे प्रभावित किए जाते हैं. अब तो जिस तरह हर मामले में एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है, उसे देखते हुए अंदेशा होता है कि बिहार चुनाव में भी न हो. वैसे यह न भी हो तब भी नतीजे अप्रत्याशित हो सकते हैं. भारतीय राजनीति में यह प्रधानमंत्री मोदी के जादू का दौर है. ऐसा जादू जब चलता है तो सारे मुद्दे किनारे रह जाते हैं.

अगर वह जादू बिहार में अब भी चला तो हवा जिसकी भी हो, जीत बीजेपी की होगी. वैसे इस लिहाज से यह प्रधानमंत्री के जादू की परीक्षा का भी चुनाव है. आख़िर वे इस चुनाव के पहले दौर में ही बारह रैलियां कर रहे हैं. वैसे चिराग पासवान को एक क्रेडिट और देना होगा. वे बहुत सफलतापूर्वक चुनावों को वास्तविक मुद्दों तक खींच लाए हैं. बिहार में रोज़गार का सवाल अचानक केंद्रीय सवाल बन गया है. हालांकि बीजेपी ने अपनी ओर से इसके ध्रुवीकरण की थोड़ी-बहुत कोशिश की.

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय यहां तक बोल गए कि अगर आरजेडी सत्ता में आई तो कश्मीर के आतंकवादियों को पनाह मिलेगी. प्रधानमंत्री ने भी अपनी रैलियों में धारा 370 से लेकर अयोध्या तक के जिक्र से यह कोशिश की कि मूल मुद्दे से चुनाव भटके. यही नहीं, मुफ़्त कोरोना का टीका देने का फ़र्ज़ी वादा कर बीजेपी ने एक और विवाद खड़ा किया. जिस टीके का वजूद भी नहीं है, जिसके बन जाने के बाद वैसे ही भारत में मुफ़्त बांटे जाने का प्रावधान है, उसे भी बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल कर लिया.

लेकिन अभी ये चुनाव अब भी रोज़गार के सवाल पर अटके पड़े हैं. फिर आरजेडी और लालू-राबड़ी युग के भ्रष्टाचार के आरोपों के जवाब में तेजस्वी ने 2015 में प्रधानमंत्री का वह वह वक्तव्य खोज निकाला है जिसमें उन्होंने नीतीश सरकार पर 35 घोटालों का आरोप लगाया था. तेजस्वी दावा कर रहे हैं कि पिछले पांच साल में इनमें 25 घोटाले और जुड़ गए हैं.

बेशक, बिहार के लिए वादों की यह सौगात काफ़ी नहीं होगी. दरअसल जिस संवेदनशीलता और समग्रता के साथ किसी भी राज्य के समावेशी विकास के लिए एक संपूर्ण योजना की ज़रूरत है, उसका अभाव हमारे सारे राजनीतिक दलों में है. वे घोषणाएं करते हैं, उसे ही विज़न डॉक्युमेंट बताते हैं, लेकिन एक समाज के रूप में सबको साथ लेकर चलने वाले मानवीय विकास का ख़ाका बनाने का काम नहीं करते. यह एक ठहरी हुई- लगभग सड़ी हुई- राजनीतिक संस्कृति की निशानी है.

लेकिन इसी मोड़ पर बिहार को नए ख़ून की ज़रूरत है. डॉक्टर राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि सत्ता की रोटी को उलटते-पलटते रहना चाहिए, नहीं तो वह जल जाती है. बिहार में पंद्रह साल से यह रोटी तवे पर चढ़ी हुई है. देखना है, बिहार की जनता अब यह रोटी पलटती है या पुराने चूल्हे से ही काम चलाती है. लेकिन हवाएं फिलहाल कुछ और इशारा कर रही हैं. यह अलग बात है कि हम हवाओं पर कितना यक़ीन करें. लेकिन वारौफ़किस को फिर याद कर सकते हैं- हवा जब बहती है तो वह अपनी दिशा को सच भी साबित कर लेती है.

प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं…)

(डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.)

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