कोरोना की बेरहम बीमारी ने अब तक हजारों जानें ले ली हैं। गंगा में तैर रही लाशें इसकी क्रूरता की कहानी कह रही हैं। सरकार और प्रशासन मौतों के आंकड़े छिपाने में लगी हैं, लेकिन अब तो कफन भी इन मौतों की सच्चाई बताने लगे हैं। बिहार के गया में चादर-गमछे बनाने वाले बुनकर अब पूरी तरह कफन तैयार करने में लग गए हैं। वजह है, अचानक से इसकी डिमांड में आई तेजी। फरवरी-मार्च माह में यहां से हर दिन 15-20 हजार पीस कफन की सप्लाई होती थी, जो अब बढ़कर 40-50 हजार तक हो गई है।

भास्कर रिपोर्टर ने कफन बनाने में लगे पटवाटोली का जायजा लिया और देखा कि जब रोजगार खत्म हो रहे हैं, उस दौर में अब यह एक काम है, जिसमें लगे कामगारों को दिन-रात एक पल की फुर्सत नहीं है।
गमछा-चादर के लिए मशहूर, अब दिन-रात कफन की सिलाई
दोपहर के करीब 12 बजे हम पहुंचे हैं मानपुर के पटवा टोली। यह वही पटवाटोली है जो न केवल गमछा, चादर व कफन बल्कि हर साल बड़ी तादाद में आईआईटीयन की फसल तैयार कर देश को देता है। ऐसे तो पटवाटोली के बुनकरों का मुख्य पेशा सूती गमछे और चादर तैयार करना है। इनमें से केवल छह कारोबारी ऐसे हैं, जो गमछे के साथ पूरे साल कफन भी तैयार करते हैं। इनमें कुछ बड़े कारोबारी हैं, तो कुछ छोटे। बड़े कारोबारी लूम मशीन से कफन तैयार करते हैं, तो छोटे कारोबारी हाथ मशीन से।

अप्रैल से अचानक बढ़ी डिमांड, 15-20 हजार से 40-50 हजार रोज तक पहुंची
पटवाटोली में हमें मिले कफन कारोबारी द्वारिका प्रसाद। वे बड़े कारोबारी हैं। कहते हैं- अभी सिर्फ उनके पास हर दिन 15-20 हजार कफन तैयार करने का आर्डर है। यह तेजी अप्रैल माह से आई है। इसके पहले फरवरी-मार्च में सभी कारोबारियों को मिलाकर कुल आर्डर 15-20 हजार प्रतिदिन का था। यहां मुख्यतः छह कारोबारी हैं। अभी सबके पास अच्छे ऑर्डर हैं। कुल मिलाकर यहां से हर दिन 40-50 हजार पीस की सप्लाई की जा रही है।
द्वारिका प्रसाद आगे कहते हैं – इन दिनों गमछे-चादर का करोबार पूरी तरह से मंदा हो गया है। इसके ऑर्डर ही नहीं हैं। ऑर्डर हैं तो सिर्फ और सिर्फ कफन के। यही वजह है कि इन दिनों 24 घंटे काम करना पड़ रहा है। तब जाकर समय पर ऑर्डर की भरपाई हो पा रही है।
Input: Dainik Bhaskar






