एक प्रचलित कहावत है, कि इतिहास खुद को पुन: दोहराता है। फिलहाल यह कहावत पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे के हालातों की सच्चाई बयां कर रही है। पहले वीआरएस लिया, तो बीजेपी ने टिकट नहीं दी। दूसरी बार वीआरएस लिया, तो जदयू ने । अब ऐसे में धैर्य रखना ही एकमात्र उपाय है।
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लेकिन उनके प्रशंसकों, सगे – संबंधियो द्वारा टिकट को लेकर लगातार फोन पर हुए है, जिनसे उन्होने अपील की है, इस वक्त उन्हें परेशान न करें, धीरज धारण करें । उन्होने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा,
अपने अनेक शुभचिंतकों के फ़ोन से परेशान हूँ। मैं उनकी चिंता और परेशानी भी समझता हूँ। मेरे सेवामुक्त होने के बाद सबको उम्मीद थी कि मैं चुनाव लड़ूँगा लेकिन मैं इस बार विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ रहा। हताश निराश होने की कोई बात नहीं है। धीरज रखें। मेरा जीवन संघर्ष में ही बीता है। मैं जीवन भर जनता की सेवा में रहूँगा। कृपया धीरज रखें और मुझे फ़ोन नहीं करे। बिहार की जनता को मेरा जीवन समर्पित है। अपनी जन्मभूमि बक्सर की धरती और वहाँ के सभी जाति मज़हब के सभी बड़े-छोटे भाई-बहनों माताओं और नौजवानों को मेरा पैर छू कर प्रणाम! अपना प्यार और आशीर्वाद बनाए रखें !
हलांकि राजनीति अनिश्चिचतताओं का दौड़ है। खैर अब देखना दिलचस्प होगा कि गुप्तेश्वर पांडे आगे क्या निर्णय लेते हैं, या पार्टी के फैसलें के सम्मान करते हैं या निर्दलीय चुनाव लड़ने का विकल्प तो उनके पास है ही।







