धौनी ने लद्दाख में फहराया तिरंगा, सियाचीन जाकर सैनिकों के साथ बिताएंगे समय
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धौनी ने लद्दाख में फहराया तिरंगा, सियाचीन जाकर सैनिकों के साथ बिताएंगे समय

Ravi Pratap

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भारत के पूर्व कप्तान एमएस धोनी क्रिकेट से दूर फिलहाल जम्मू-कश्मीर में सेना के साथ हैं। धोनी क्रिकेट से रेस्ट लिया है और सेना के साथ जुड़ गए। जहां वह अन्य सैनिकों की तरह गश्त, गार्ड ड्यूटी और बाकी काम खुद कर रहे हैं।

स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए एमएस धोनी लद्दाख पहुंचे हैं। उनका लद्दाख में शानदार स्वागत किया गया। धोनी लद्दाख पहुंचे तो सेना अधिकारियों ने उनको सैल्यूट किया और उनके साथ काफी बातचीत की।

धोनी की लद्दाख पहुंचने की ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो एम एस धोनी लद्दाख में तिरंगा लहराने के बाद सियाचिन ग्लेशियर गए हैं। धोनी सियाचिन बॉर्डर की मुश्किल परिस्थितियों को महसूस करना चाहते हैं। खबरों के मुताबिक धोनी सियाचिन वॉर मेमोरियल जाकर शहीदों को श्रदांजलि भी देंगे।

धोनी तिरंगा लहराने से पहले 14 अगस्त को आर्मी अस्पताल भी गए थे। जहां उन्होंने जवानों से काफी देर तक बातचीत की। 31 जुलाई को साउथ कश्मीर में धोनी की ट्रेनिंग शुरू हुई थी जो 15 अगस्त को खत्म हो गई है। साल 2011 में टेरिटोरियल आर्मी में शामिल होने वाले एमएस धोनी ने पिछले दिन एक आम फौजी की तरह बिताए। धोनी के पास लेफ्टिनेंट कर्नल की ऑनरेरी रैंक है और वो पैराशूट रेजीमेंट की 106 पैरा बटालियन के सदस्य हैं। धोनी ने इस बार विक्टर फोर्स के साथ ट्रेनिंग की जो कश्मीर में आतंक प्रभावित इलाकों में काम करती है। धोनी ने वर्ल्ड कप के बाद बीसीसीआई से वेस्टइंडीज दौरे के लिए छुट्टी मांगी थी जिसके बाद उन्होंने सेना के साथ ट्रेनिंग शुरू की।

Input : News24 India

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गंगा घाट पर लड़खड़ाकर गिरे प्रधानमंत्री मोदी, SPG ने संभाला

Himanshu Raj

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PM मोदी आज कानपुर में थे। वहां उन्होंने नमामी गंगे प्रोजेक्ट की समीक्षा की। मोदी ने समीक्षा बैठक के बाद स्टीमर में बैठक गंगा  का निरक्षण भी किया। इस दौरान एक ऐसी घटना घटी जिससे प्रशासन सकते में आ गया। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार दोपहर कानपुर में गंगा बैराज की सीढ़ियों पर चढ़ते वक्त लड़खड़ाकर गिर गए।

पीएम मोदी के साथ यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ समेत उनकी कैबिनेट के कई मिनिस्टर कानपुर में मौजूद रहे। पीएम मोदी कानपुर स्थित अटल घाट की सीढ़ियो पर चढ़ते वक्त गिर पड़े। हालांकि सिक्योरिटी गार्ड्स ने उन्हें तत्काल उठाया और पीएम मोदी को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी। पीएम मोदी कानपुर गंगा घाट पर नंगे पैर ही गए थे शायद इस कारण ही ये लड़खड़ाकर गिए गए थे।

पीएम मोदी ने आज राष्ट्रीय गंगा परिषद की पहली बैठक की अध्यक्षता की वह महत्वाकांक्षी नमामि गंगे परियोजना की समीक्षा करने के लिए कानपुर में हैं। प्रधान मंत्री कार्यालय की तरफ से पहले ही बता दिया था कि वह गंगा की सफाई के पहलुओं पर किए गए कार्यों की प्रगति की समीक्षा करेंगे और विचार-विमर्श करेंगे।

पीएम मोदी के दौरे से पहले जिला के एक वरिष्ठ अधिकारी ने शुक्रवार को कहा था कि पीएम मोदी केंद्रीय मंत्रियों, यूपी, उत्तराखंड और बिहार के मुख्यमंत्रियों और विभिन्न केंद्रीय विभागों के सचिवों के साथ गंगा परिषद की बैठक करेंगे। दो गंगा राज्यों के मुख्यमंत्रियों में पश्चिम बंगाल और झारखंड के मुख्यमंत्री इस बैठक में शामिल नहीं हो सकते हैं।

 

Input: Live Bihar

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श’हीद कांस्टेबल कमलेश कुमारी, अगर उस दिन ये संसद में ना होतीं तो शायद बच नहीं पाते कई नेता

Himanshu Raj

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दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर आ’तंकी ह’मला हुआ था। ह’म इस दिन को ससंद ह’मले के नाम से भी जानते हैं। लश्कर-ए-तायबा और जैर-ए-मोह’म्मद नामक आ’तंकवादी संगठनों ने इस ह’मले की जिम्मेदारी ली थी। इस ह’मले में पांच आ’तंकवादियों को मा’र गिराया गया।

साथ ही, दिल्ली पुलिस के छह अफ़सर, संसद में तैनात दो सुरक्षा अधिकारी और एक माली (जो संसद के बगीचे में काम करता था) भी शहीद हुए। इन श’हीद हुए लोगों में एक महिला कॉन्सटेबल कमलेश कुमारी भी थीं जिन्होंने देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाते हुए अपनी जान दे दी।

जब आ’तंकवादियों ने संसद पर ह’मला किया तब सीआरपीएफ के 88 (महिला) बटालियन से कॉन्स्टेबल कमलेश कुमारी की पोस्टिंग संसद के बिल्डिंग गेट नंबर 11 के बगल में आयरन गेट नंबर 1 पर थी। सभी राजनेताओं और अधिकारियों के लिए संसद में प्रवेश करने के लिए इसी गेट 11 का इस्तेमाल किया जाता था। उस वक़्त वे सभी आने-जाने वालों की चेकिंग करने के लिए स्टाफ के साथ तैनात थीं। 13 दिसंबर को सुबह के लगभग 11:40 बजे, कमलेश ने गोलि’याँ चलने व ब’म विस्फोट की आवाज सुनी। उनके पास उस वक़्त सिर्फ़ उनका वायरलेस था। बदकिस्मती से उस समय संसद में किसी भी महिला कॉन्सटेबल को कोई हथियार नहीं दिया जाता था। एक वरिष्ठ सीआरपीएफ अधिकारी ने बताया,

जब सभी लोग गो’लियों की आवाज से परेशान होकर तितर-बितर हो रहे थे ऐसे समय में भी कमलेश ने पूरी सूझ-बुझ से काम लिया। उसी ने सबसे पहले उस मानव ब’म को देखा जो बिल्डिंग गेट नंबर 11 की तरफ बढ़ रहा था। कमलेश ने तुरंत अपने वायरलेस पर अपने ड्यूटी ऑफिसर (डीओ) और गार्ड कमांडर को इस ‘मानव ब’म’ के बारे में सूचित किया। लेकिन उनके आने तक शायद वह मानव ब’म गेट नंबर 11 तक पहुंच जाता, जहाँ से संसद भवन में जाना बहुत आसान था। तभी कमलेश ने कुछ सीआरपीएफ जवानों को आ’तंकवादियों से लड़ते देखा।

बिना अपनी जान की परवाह किये कमलेश तुरंत अपने सुरक्षा स्थान से बाहर निकली और चिल्लाकर दुसरे कॉन्सटेबल सुखविंदर सिंह को मानव ब’म के लिए चेताया। कमलेश की आवाज सुन जवानों का ध्यान इस मानव ब’म पर गया। लेकिन कमलेश बिना किसी हथियार और सुरक्षा के थीं और उनकी आवाज आ’तंकवादियों ने भी सुनी थी। उन्हें चुप कराने के लिए एक आ’तंकवा’दी ने उन पर भी गो’लियां बरसा दी।

म’रने से पहले कमलेश ने अलार्म भी बजा दिया जिससे कि संसद में सब चौकन्ने हो गये और साथ ही, सुखविंदर सिंह ने इस मानव ब’म को गेट तक पहुंचने से रोक लिया और उससे पहले ही उसे ढेर कर दिया। तुरंत संसद के अंदर जाने वाले सभी दरवाजे बंद किये गये।

सुखविंदर ने बताया, ‘उस बहादुर महिला की वजह से ही एक बहुत बड़ी दुर्घटना टल गयी।’ भारतीय सुरक्षा बल के इतिहास में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) कांस्टेबल कमलेश कुमारी इकलौती महिला पुलिस कांस्टेबल हैं जिन्हें मरणोंपरांत अशोक चक्र से नवाजा गया है।

कमलेश कुमारी उत्तर-प्रदेश के कन्नौज में सिकंदरपुर से ताल्लुक रखती थीं। उन्होंने साल 1994 में पुलिस फाॅर्स ज्वाइन की थी। आज उनके परिवार में उनके पति और दो बेटियाँ हैं। उनके पति अवदेश सिंह कहते हैं कि उनकी दोनों बेटियाँ बहुत छोटी थीं जब कमलेश शहीद हुईं। उनकी बेटियों को तब शहादत का मतलब भी नहीं पता था।

कमलेश ने उस समय अपनी ममता से पहले देश के प्रति अपने कर्तव्य को रखा। उन्होंने अपनी ड्यूटी के दौरान एक बार भी नहीं सोचा कि अगर उन्हें कुछ हुआ तो उनकी दो मासूम बेटियों का क्या होगा। अवदेश सिंह के लिए एक माँ के बिना अपनी दोनों बेटियों को पालना आसान नहीं रहा। लेकिन इस परिवार को कमलेश पर गर्व है।

Input:Live Bihar

 

 

 


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जनकपुर में है सीता-राम विवाह का मंडप और वो जगह जहां श्रीराम ने धनुष तोड़ा

Himanshu Raj

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जनकपुर के जानकी मंदिर के पास ही रंगभूमि नाम का स्थान है। जहां विवाह से पहले श्रीराम ने शिवजी का पिनाक धनुष तोड़ा था। रामायण के अनुसार इस जगह धनुष तोड़ने पर बहुत तेज विस्फोट हुआ और धनुष के टुकड़े करीब 18 किलोमीटर दूर तक जाकर गिरे। जहां आज धनुषा धाम बना है। इसके अलावा जनकपुर के पास ही रानी बाजार नाम की जगह पर मणिमंडप स्थान है। डॉ रामावतार के शोध के अनुसार ये वो स्थान है जहां सीता-राम का विवाह हुआ था।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार माता सीता का जन्म जनकपुर में हुआ था। यहां माता सीता का मंदिर बना हुआ है। ये मंदिर क़रीब 4860 वर्ग फ़ीट में फैला हुआ है। मन्दिर के विशाल परिसर के आसपास लगभग 115 सरोवर हैं। इसके अलावा कई कुण्ड भी हैं। इस मंदिर में मां सीता की प्राचीन मूर्ति है जो 1657 के आसपास की बताई जाती है। यहां के लोगों के अनुसार एक संत यहां साधना-तपस्या के लिए आए। इस दौरान उन्हें माता सीता की एक मूर्ति मिली, जो सोने की थी। उन्होंने ही इसे वहां स्थापित किया था। इसके बाद टीकमगढ़ की महारानी कुमारी वृषभानु वहां दर्शन के लिए गईं। उन्हें कोई संतान नहीं थी। वहां पूजा के दौरान उन्होंने यह मन्नत मांगी थी कि उन्हें कोई संतान होती है तो वो वहां मंदिर बनवाएंगी। संतान प्राप्ति के बाद वो फिर आईं और करीब 1895 के आसपास मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। 16 साल में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।

वाल्मीकि रामायण में जनक के यज्ञ स्थल यानि वर्तमान जनकपुर के जानकी मंदिर के निकट एक मैदान है, जो रंगभूमि कहलाता है। लोक मान्यता के अनुसार इसी मैदान में देश विदेश के बलशाली राजाओं के बीच शंकर जी का पिनाक धनुष तोड़कर श्रीराम ने सीता जी से विवाह की शर्त पूर्ण की थी। रामचरित मानस में भी इसे रंगभूमि कहा है। ये नेपाल का अत्यंत प्रसिद्ध मैदान है । सालों भर यहां तरह तरह के आयोजन होते रहते हैं ।

धनुषा नेपाल का प्रमुख जिला है। इस जिले में धनुषाधाम स्थित है जो कि जनकपुर से करीब 18 किमी दूर है। धनुषा धाम में आज भी शिवजी के पिनाक धनुष के अवशेष पत्थर के रूप में मौजूद हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब पिनाक धनुष टूटा तो भयंकर विस्फोट हुआ था। धनुष के टुकड़े चारों ओर फैल गए थे। उनमें से कुछ टुकडे़ यहां भी गिरे थे। मंदिर में अब भी धनुष के अवशेष पत्थर के रूप में माने जाते हैं। त्रेतायुग में धनुष के टुकड़े विशाल भू भाग में गिरे और उनके अवशेष को धनुषा धाम के निवासियों ने सुरक्षित रखा। भगवान शंकर के पिनाक धनुष के अवशेष की पूजा त्रेता युग से अब तक अनवरत यहां चल रही है जबकि अन्य स्थान पर पड़े अवशेष लुप्त हो गए।

Input: Live Bihar

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