ऋतुप्रधान और पर्वप्रधान देश भारत में प्रकृति से जुड़ाव सहज ही दिखता है. महाकवि घाघ ने अपनी रचनाओं में बड़ी ही सरल  भाषा में प्रकृति के विभिन्न संकेतों को समझने के लिए उदाहरण सुझाए है. बादलों का रंग देखकर कितनी बारिश होगी ऐसा अनुमान कर लेने वाले इस प्रायद्वीपीय भूमि में आस्था और विज्ञान का समावेश पग-पग में था. चक्की की रोटी और कुएं के पानी में ज्ञान घुला पड़ा था.

इसलिए सपेरों का देश कह गए अंग्रेज

इस विचित्र और अनूठी भारतीय मनीषा को जब विदेशियों ने अपनी आंखों से देखा तो समझ ही नहीं पाए और सपेरों का देश कहकर प्रचारित किया.प्रचार में बड़ी शक्ति होती है और इस ताकत का अंदाजा आपको 10 रुपये कि साबुन की टिकिया में 100 नींबू की शक्ति को देखकर होता ही होगा. या फिर पांच रुपये के सर्फ में चंदन-मोगरे की खुश्बू महसूस कर पाते होंगें.

सिर्फ त्योहार नहीं नाग पंचमी

विदेशी ताकतों का यह दुष्प्रचार इतना महंगा पड़ा कि आज के समय में हम आध्यात्म की उच्च अवस्था से तो कट गए हैं और बस त्योहार मनाते रह गए हैं. 25 जुलाई को सारा देश स्थानीय परंपरा के तहत नाग पंचमी मनाएगा और नागों की पूजा करेगा, लेकिन पूजन का आधार क्या है, विडंबना है कि अधिसंख्य लोग इससे अंजान हैं.

विश्व की हर सभ्यता का आधार हैं सर्प

नाग भारतीय संस्कृति का आधार हैं. सिर्फ भारतीय संस्कृति ही नहीं, बल्कि विश्व की हर सभ्यता का आधार हैं. विज्ञान कहता है कि सृष्टि के प्रारंभ में सबसे पहले एक कोशिकीय जीव जन्में. इनका जन्म जल में हुआ है. स्थान, प्रकृति और भौगोलिक प्रभावों के कारण वह धीरे-धीरे विभिन्न बहुकोशिकीय जलचरों में विकसित हुए. धीरे-धीरे यही जलचर सरीसृपों में बदले और फिर जमीन पर रेंगने इसके बाद भूमि पर चल सकने वाले जीव उत्पन्न हुए.

शेष और अनंत नागों का मर्म समझिए

भारतीय मनीषा का एकेश्वारवाद विज्ञान के इस आधे-अधूरे तर्क से कहीं अधिक उन्नत तर्क को आध्यात्म के जरिए कहता आया है. इसके तहत पुराण पुरुष यानि के भगवान विष्णु की उत्पत्ति सृष्टि में पहले हुए और उनकी उत्तपत्ति को आधार दिया नाग ने. यानि कि श्रीहरि के बाद कुछ भी शेष नहीं हैं.

यदि शेष है तो वह नाग हैं. जिन्हें शेषनाग कहते हैं. श्रीविष्णु के साथ सब संपूर्ण है तो वह अनंत हैं. यह अनंत नाग की स्थिति है.

प्रतीकों का है स्वरूप

जीव और आत्मा को भौतिक और आध्यात्मिक कड़ी में देखें तो हर मनुष्य के जन्म से पहले गर्भावस्था का समय ठीक क्षीरसागर में विश्राम के समान ही होता है. नाभि से जुड़ी नाभिनाल नई सृष्टि (ब्रह्म) की प्रतीक है. नसों-नलिकाओं का घेरा ठीक वैसा ही है जैसा कि अनंत शैया पर श्रीविष्णु शयन करते हैं.

नागों के साथ यह जुड़ाव जन्म से ही जुड़ा हुआ है. इसलिए सहज ही संस्कृति का हिस्सा बन जाता है.

पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं नाग
भौतिक स्वरूप में भी देखें तो एक छोटा सा झींगुर, जुगनू यहां तक की दीमक भी पारिस्थितकी का ही एक अंग है. चूहे खेतिहर जमीन को भुरभरी बनाते हैं, लेकिन सर्प उनसे फसलों की रक्षा करते हैं. केंचुए जमीन को उपजाऊ बनाते हैं, लेकिन चीटियां और मेढक उनकी अधिकता में जमीन को पोली होने से बचाते हैं.

सर्प इसके अलावा वायु के विष का पान कर वायु भी शुद्ध करते हैं. यह चक्र एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है और नागपंचमी इसी चक्र के प्रति आभार जताने का दिन है.

महाराज मनु ने समझाया मर्म
एक और पौराणिक आख्यान का वर्णन जरूरी है. जल प्रलय में सात दिन शेष थे और मत्स्यअवतार लिए भगवान विष्णु महाराज मनु को जीवन के बीज संरक्षण का आदेश दे गए थे. मनु जंगल जाते तो कभी औषधि, कभी रसायन कभी पौधे, तो साथ ही कोयल, मोर, सिंहशावक, आदि जीव-जन्तुओं के जोड़े ले आते.

इन जोड़ों में कौवों और सर्पों को देखकर शतरूपा बोल पड़ीं, इन कर्कष ध्वनि वाले जीव की नवजीवन में क्या जरूरत? क्या आप नवजीवन में विष भी घोलना चाहते हैं.

जीवन की प्रत्येक कड़ी का संरक्षण जरूरी

तब महाराज मनु ने समझाते हुए कहा, देवी शतरूपा, जीवन सिर्फ एक तरफा नहीं हो सकता है. यह रथ के दो चक्कों की भांति है. यदि कर्कशता न हो तो आप कोयल की मिठास कैसी है, इसका क्या अनुभव कर पाएंगीं? फिर वह काग ही तो थे जिन्होंने आपको यह सूचना दी थी कि मेरी तपस्या पूर्ण हुई और मैं लौटने वाला हूं.

विषाद का विष ही हर्ष के अमृत का महत्व समझा पाएगा. इसलिए जीवन की प्रत्येक कड़ी का संरक्षण जरूरी है.

और अंत में, आज हम अपनी पैंट-पतलून कसने के लिए बेल्ट का प्रयोग करते हैं. महादेव पुत्र गणेश ने सर्वप्रथम अपनी कमर से नागराज को बांधकर लड्डुओं की पोटली संभाली थी. ध्यान से देखें तो प्रकृति की हर संरचना में जीवन को सुलभ बनाने का मार्ग है.

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