बसंत पंचमी : सरस्वती पूजा विधि एवं तिथि मुहूर्त जानें

0
853

शास्त्रों में माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी कहा गया है। इस दिन सरस्वती पूजन का विधान है। इस साल बसंत पंचमी की तिथि को लेकर उलझन की स्थिति है।

दरअसल पंचमी तिथि 2 दिन लग रही है। देश के कुछ भागों में चतुर्थी तिथि 9 तारीख को दोपहर से पहले ही समाप्त हो जा रही है और पंचमी तिथि शुरू हो रही है और 10 तारीख को पंचमी तिथि 2 बजकर 9 मिनट तक है। ऐसे में सरस्वती पूजन किस दिन करना शुभ रहेगा जानिए क्या कहते हैं शास्त्र।

कहां किस दिन सरस्वती पूजा?

पंजाब, जम्मू, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में मां सरस्वती पूजा का पर्व 9 फरवरी को मनाया जाना शास्त्र सम्मत होगा क्योंकि इन क्षेत्रों में 9 तारीख को दोपहर से पहले ही पंचमी तिथि लग जाएगी। जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ ही देश के अन्य हिस्सों में यह पर्व 10 फरवरी को मनाया जाएगा।

इसकी वजह यह है कि यहां 9 तारीख को दोपहर के बाद पंचमी तिथि लगेगी इसलिए 10 तारीख को सरस्वती पूजन करना शास्त्र सम्मत होगा।

10 फरवरी को सरस्वती पूजन का शुभ समय

बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ था इसलिए इसे देवी सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन कामदेव और इनकी पत्नी रति धरती पर आते हैं और प्रकृति में प्रेम रस का संचार करते हैं इसलिए बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती के साथ कामदेव और रति की पूजा का भी विधान है।

शास्त्रों में पूर्वाह्न से पूर्व सरस्वती पूजन करने का नियम बताया गया है इसलिए 10 तारीख को सुबह 6 बजकर 45 मिनट से दोपहर 12 बजकर 25 मिनट तक सरस्वती पूजन करना शुभ मंगलकारी होगा।

सरस्वती पूजन में रखें इन बातों का ध्यान

देवी सरस्वती ज्ञान और आत्मिक शांति की प्रतीक हैं। इनकी प्रसन्नता के लिए पूजा में सफेद और पीले रंग के फूलों और वस्त्रों का प्रयोग करना चाहिए। देवी सरस्वती को प्रसाद स्वरूप बूंदी, बेर, चूरमा, चावल का खीर भोग लगाना चाहिए।

इस दिन से बसंत का आगमन हो जाता है इसलिए देवी को गुलाब अर्पित करना चाहिए और गुलाल से एक-दूसरे को टीका लगाना चाहिए।

सरस्वती पूजा के दिन राधा-कृष्ण की पूजा

बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती के साथ ही राधा-कृष्ण की पूजा का भी शास्त्रों में उल्लेख मिलता है। दरअसल राधा और कृष्ण प्रेम के प्रतीक हैं और इस दिन कामदेव का पृथ्वी पर आगमन होता है। प्रेम में कामकुता पर नियंत्रण और सादगी के लिए राधा-कृष्ण की पूजा का विधान सदियों से चला आ रहा है।

बसंत पंचमी के दिन पहली बार राधा-कृष्ण ने एक दूसरे को गुलाल लगाया था इसलिए बसंत पंचमी पर गुलाल लगाने की परंपरा भी चली आ रही है।