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बिहार : भांजी पर आया मामा का दिल, पत्नी और बेटे को छोड़कर हुआ फरार, दो सालों से चल रहा था प्रेम प्रसंग

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नवादा: बिहार के नवादा जिले में हैरान करने वाला मामला सामने आया है. मामला जिले के गोविंदपुर थाना क्षेत्र के बुधवारा गांव का है, जहां मुंबई से नवादा आया शख्स पत्नी को छोड़कर अपनी भांजी को लेकर फरार हो गया है. इस मामले में शख्स के ससुर उक्त गांव निवासी विनोद शर्मा ने नगर थाना में आवेदन देकर दमाद के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. विनोद शर्मा ने बताया है कि उनका दामाद जिले के वजीरगंज थाना क्षेत्र के तिलोरी गांव निवासी उपेंद्र शर्मा का बेटा धर्मेंद्र शर्मा उर्फ चंदन शर्मा है, जो अपनी ही भांजी को लेकर भाग गया है. वहीं, अपनी पत्नी को घर पर छोड़ दिया है.

साल 2015 में हुई थी शादी

उनकी मानें तो धर्मेंद्र ने अपने मामा पप्पू शर्मा की बेटी रानी कुमारी को बीते 13 तारीख को फोन कर कर बुलाया और उसे लेकर फरार हो गया. लड़की की काफी खोजबीन की गई, लेकिन उसका अब तक पता नहीं चला है. विनोद शर्मा ने कहा कि साल 2015 में हिंदू रीति रिवाज के अनुसार उनकी बेटी की धर्मेंद्र के साथ शादी कराई गई थी और दोनों को एक बेटा भी है.

धर्मेंद्र मुंबई में रह कर प्राइवेट कंपनी नौकरी करता है. बीते दिनों वो वहां से आता और आने के बाद अपनी ही भांजी को लेकर भाग गया. फिलहाल पूरे मामले में विनोद शर्मा ने नगर थाना में आवेदन देकर उपेंद्र शर्मा (समधी), रेनू देवी (समधन) और धर्मेंद्र शर्मा (दामाद) के विरुद्ध लिखित आवेदन देकर कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है.

दो सालों से चल रहा था प्रेम प्रसंग

बताया जाता है कि मामा-भांजी के बीच लगभग दो सालों से प्यार मोहब्बत चल रहा था. इसी को लेकर धर्मेंद्र शर्मा बीते दिनों मुंबई से नवादा आया आया था. कुछ दिन घर पर रहा. इस दौरान वो भांजी को मिलने बुलाया करता था. उसके बाद 13 तारीख को फोन पर उसे नवादा के सद्भावना चौक बुलाया और पूरी प्लानिंग के साथ भगनी को लेकर फरार हो गया.

Source : ABP News

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मुकेश सहनी ने तेजस्वी को दी चुनौती, कहा- मछली पकड़ना है तो ब्रांडेड जूते उतार कर तालाब में उतरिये, फिर…

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बिहार विधानसभा के दो सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर प्रचार का सिलसिला जारी है. चुनाव प्रचार के बाबत बीते दिनों बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव तारापुर विधानसभा क्षेत्र पहुंचे थे, जहां उन्होंने नुक्कड़ सभाओं को संबोधित किया. साथ ही इस दौरान वे खेतों में घूमते व तालाब में मछली मारते दिखे. हालांकि, उनके मछली मारने पर विवाद शुरू हो गया है. सत्ता पक्ष के नेता उनके इस कार्य को लेकर हमलावर हैं और तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.

ललन सिंह ने साधा निशाना

इसी क्रम में जेडीयू (JDU) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह  ने तेजस्वी पर निशाना साधा. बुधवार को उन्होंने ट्वीट कर कहा, ” पढ़ाई में कक्षा छोड़कर 9वीं फेल रहे वैसे ही जनता से मुंह चुराकर मछली पकड़ने का नाटक राजनीतिक अविश्वास सिद्ध होगा. 2020 में सरेआम मत्स्यजीवी समाज के नेता व वर्तमान कैबिनेट मंत्री मुकेश सहनी की बेइज्जती सबको याद है, ढ़ोंग मत करिए प्रवासी बाबू, लोग जागरूक हैं.”

तेजस्वी यादव ने किया पलटवार

इधर, ललन सिंह के वार पर पलटवार करते हुए तेजस्वी ने कहा, ” मत्स्यजीवी समाज को कम आत्मविश्वास वाला और मछली पकड़ने को हेय काम बताने वाले नीतीश कुमार के ‘राष्ट्रीय अध्यक्ष’ को पूरे मल्लाह समाज से माफी मांगनी चाहिए. ये जेडीयू-बीजेपी वाले अपनी सामंती सोच को बस किसी तरह दबा, छुपा कर बैठे हैं. रह-रहकर वंचितों के प्रति जहर इनके मुंह से निकलता ही रहता है.”

हालांकि, जब विवाद के बीच मुकेश सहनी का नाम आया तो वे चुप नहीं बैठे. उन्होंने 2020 की बात याद दिलाते हुए तेजस्वी यादव को खुले तौर पर चुनौती दे डाली. उन्होंने ट्वीट कर कहा, ” तेजस्वी यादव मछली पकड़ने का इतना ही शौक है तो चमकदार कुर्ता-पैजामा, ब्रांडेड जूते उतारकर मेरे साथ तालाब में उतरिए, तब समझ में आएगा कि एक मछुआरे को मछली पकड़ने में कितना मेहनत लगता है. ख़ैर, मछुवारे समाज को 2020 में आपके द्वारा पीठ में भोंका ख़ंजर अच्छे से याद है.”

Source : ABP News

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इतिहास : पीएम मोदी से लेकर आमिर खान तक, चिट्टी चोखा की फैन हैं बड़ी हस्तियां

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लिट्टी चोखा को बिहार का प्रमुख व्यंजन माना जाता है. लिट्टी एक आटे का गोला होता है जिसे जलते अलाव में सेका जाता है. लिट्टी के भीतर सत्तू का मसाला भी भरा जाता है. अगर चोखे की बात करें तो चोखा आग पर सेके गए आलू, बैंगन, टमाटर से बनाया जाता है.

लिट्टी चोखा सबसे आसानी से बनने वाले व्यंजनों में से एक है. ये बनाने में आसान होता है. बिहार के अलावा लिट्टी चोखा उत्तर प्रदेश के पुर्वांचल में भी फेंमस है. पुर्वांचल में बारिश होने के बाद अक्सर लोगों के घरों में लिट्टी चोखा बनाए जाता हैं. इस डिश को महिलाओं के अपेक्षा ज्यादात्तर पुरुष बनाते हैं.

History of Litti and Chokha: पीएम मोदी से लेकर आमिर खान तक, चिट्टी चोखा की फैन हैं बड़ी हस्तियां, जानिए इसका इतिहास

पीएम नरेंद्र मोदी और बॉलीवुड सुपरस्टार आमिर खान सहित कई बड़ी हस्तियां इसका स्वाद चखने से खुद को रोक नहीं पाई हैं. तो आज आइए जानते हैं लिट्टी चोखे का इतिहास क्या है.

लिट्टी चोखे का इतिहास

लिट्टी चोखे का इतिहास मगध काल से जुड़ा हुआ है. मगध शासनकाल के दौरान लिट्टी चोखा प्रचलन में आया. चंद्रगुप्त मौर्य मगध के राजा थे जिनकी राजधानी पाटलीपुत्र (वर्तमान पटना) थी लेकिन उनका साम्राज्य अफगानिस्तान तक फैला था. इतिहासकारों के मुताबिक चंद्रगुप्त मौर्य के सैनिक युद्ध के दौरान अपने साथ लिट्टी चोखा रखते थे. 18वीं शताब्दी की कई किताबों के अनुसार लंबी दूरी तय करने वाले मुसाफिरों को मुख्य भोजन लिट्टी चोखा था.

302 ईसापूर्व में ग्रीक यात्री मेगस्थनीज भारत आया था. वह मगध साम्राज्य की भव्यवता को देखकर हैरान हो गया. उसने अपनी किताब में लिखा कि पाटलीपुत्र में 64 गेट, 570 टावर और ढेर सारे बाग-बगीचे हैं. इस राज्य महलों और मंदिरों से भरा हुआ है. मेगस्थीन ने आगे लिखा, ‘मैंने पूरब के एक भव्य शहर को देखा है. मैंने पर्सियन महलों को भी देखा है लेकिन यह शहर दुनिया के सबसे बड़े और खुबसुरत शहरों में से एक है’.

मुगल काल में लिट्टी चोखा

मुगल काल में लिट्टी चोखा के प्रमाण मिलते हैं लेकिन इस दौरान इसे खाने का तौर-तरीका बदल गया. मुगल काल में मांसाहारी खाने का प्रचलन ज्यादा था. इसलिए लिट्टी को शोरबा और पाया के साथ खाया जाने लगा. अंग्रेजों के वक्त लिट्टी को करी के साथ खाया जाने लगा. वक्त के साथ लिट्टी चोखा के साथ कई तरह के नए प्रयोग किए गए.

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आंदोलनकारियों का व्यंजन

लिट्टी चोखा के फेंमस होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों से लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता सैनानी अपने साथ लिट्टी चोखा लेकर चलते थे. इस व्यजंन की खास बात यह है कि यह जल्दी खराब नहीं होता है इसके अलावा इसे बनाना काफी आसान होता है और यह काफी हेल्दी होता है.

साल 1857 के विद्रोह के दौरान तात्या तौपे और रानी लक्ष्मी बाई के सैनिक बाटी या लिट्टी को पंसद करते थे क्योंकि इसके लिए ज्यादा सामान की जरुरत नहीं थी और इसे पकाना आसान था.

आज लिट्टी चोखा की पॉपुलैरिटी का आलम ऐसा है कि जो भी बिहार जाता है वो खुद को लिट्टी चोखा खाने से नहीं रोक पाता है.

Source : ABP News

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दरभंगा एयरपोर्ट पर अगले दो-तीन महीने में मौसम खड़ी कर सकती मुश्किलें

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देश के अन्य महानगरों के एयरपोर्ट की तुलना में दरभंगा एयरपोर्ट की बढ़ती लोकप्रियता यात्रियों की आवाजाही को लेकर चर्चा में है। दरभंगा एयरपोर्ट को आल वेदर एयरपोर्ट बनाने की कवायद भी की जा रही है। लेकिन, इसमें हो रही देरी के कारण जिस रफ्तार से यात्रियों की संख्या आम दिनों में होती है, वो बारिश या फिर ठंड के दिनों में उतनी ही तेजी से घटने लगती है। कारण, दरभंगा एयरपोर्ट पर आइएलएस (इंस्टूमेंटल लैंड‍िंंग सिस्टम) का नहीं होना है।

आइएलएस सिस्टम होने से लो विजिवलिटी में भी विमानों की लैंड‍िंग और टेक आफ हो सकती है। फिलहाल इस सुविधा नहीं होने के कारण दरभंगा एयरपोर्ट पर बारिश और घने कोहरे में विमानों की रफ्तार पर ब्रेक लग जाता है। फ्लाइटें रद होने लगती है या फिर देरी से विमानों की आवाजाही होती है। इन दिनों जिले में भारी बारिश की चेतावनी का अलर्ट जारी कर दिया गया है। सोमवार से ही जिले में भारी बारिश हो रही है। इसका असर आम जनजीवन के साथ विमान सेवा भी दिखता है। ऊपर से ठंड का मौसम आ रहा है। सो, कोहरे के कारण विमान सेवा प्रभावित होने की प्रबल संभावना है। अगले दो से तीन महीने कोहरे की वजह से विमान सेवा प्रभावित हो सकती है।

शुरुआती दौर में जब दरभंगा एयरपोर्ट से विमानों का संचालन किया गया था, उस वक्त महज तीन फ्लाइटें उड़ान भरा करती थी। इनमें दरभंगा से दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरू की सेवा शामिल थी। लेकिन, यात्रियों की बढ़ती भीड़ और मांग को देखते हुए सेवा प्रदात्ता कंपनी ने अन्य महानगरों के लिए इसे विस्तारित किया। उसके बाद दूसरी सेवा प्रदात्ता कंपनी इंडिगो ने यहां से अपनी विमान सेवा शुरू की। तीन विमानों के साथ शुरू हुआ हवाई सेवा की संख्या अब 18 तक पहुंच गई है। इधर, सरकार ने भी दरभंगा एयरपोर्ट की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इसे अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस करने का फैसला लिया। इसे कैबिनेट की मंजूरी भी मिल गई है। बावजूद इसमें अभी वक्त लगेगा।

वर्ष 2022 के अंत तक शुरू हो सकती नए सिविल एनक्लेव निर्माण की प्रक्रिया

दरभंगा एयरपोर्ट के नए सिविल एनक्लेव व रनवे विस्तार को राज्य सरकार की हरी झंडी मिलने के बाद उम्मीदों को पंख लग गए है। लेकिन, इससे कम से कम आठ महीने का वक्त लगेगा। जानकार बतातें है कि कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद भी प्रक्रिया शुरू होने में कम से कम सात से आठ महीने का वैधानिक समय लगेगा। कारण, पहले सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण की प्रक्रिया होगी। इसमें कम से कम छह महीने का वक्त लगेगा। इसके बाद जिला स्तर पर गठित कमेटी रिपोर्ट का रिव्यू करेेगी, जिसमें कम से कम दो महीने का वक्त लगेगा। इसके बाद निर्माण की प्रक्रिया शुरू होगी।

Source : Dainik Jagran

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