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बेस्ट इम्युनिटी बूस्टर है लीची, गर्मी में स्किन का भी रखती है ख्याल

Muzaffarpur Now

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लीची (Lychee) गर्मियों के सीजन में आने वाला एक प्रमुख फल है. ये सेहत के लिहाज से बहुत फायदेमंद है. लीची में कार्बोहाइड्रेट, विटामिन सी, विटामिन ए और बी कॉम्प्लेक्स काफी मात्रा में पाया जाता है. इसके अलावा लीची में पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस और आयरन जैसे मिनरल्स पाये जाते हैं. लीची स्वादिष्ट फल होने के साथ ही शरीर में ऊर्जा के लिए आवश्यक स्टेरॉयड हार्मोन और हीमोग्लोबिन का निर्माण करने का काम करती है.

इम्युनिटी बढ़ाती है

द हेल्थ साइट की खबर के अनुसार लीची में विटामिन-सी की प्रचुरता होती है इसके कारण यह प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट्स का स्त्रोत है. ऐसे में यह तत्त्व रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर संक्रमण से बचाता है. साथ ही बढ़ती उम्र के प्रभाव को कम करता है. इससे स्किन चमकदार रहती है. लीची का प्रयोग अस्‍थमा से बचाव के लिए भी किया जाता है.

न्यूट्रीशन इंडेक्स 100 ग्राम लीची में 72मिलीग्राम विटामिन-सी होता है. साथ ही इसमें 66 कैलौरी ऊर्जा, 5मिग्रा कैल्शियम, 10 मिग्रा मैग्नीशियम आदि विभिन्न तत्त्व होते हैं. इसमें कार्बोहाइड्रेट, विटामिन-ए, सी व बी कॉम्प्लेक्स, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, लौह जैसे खनिज लवण भी होते हैं. इसमें सैचुरेटेड फैट और सोडियम की मात्रा बेहद कम होती है.

कितनी मात्रा खाएं

लीची ऊर्जा के बेहतर स्त्रोतों में से एक है. रोजाना 4-5 लीची खा सकते हैं. बेस्ट टाइम-गर्मियों में लीची शरीर में तरावट बनाए रखती हैं. घर से बाहर कहीं निकल रहे हैं तो बीच-बीच में लीची खा सकते हैं. शाम को या भोजन के बाद खा सकते हैं.

ये लोग न करे सेवन

डायबिटीज के मरीजों को इसकी कम ही मात्रा खानी चाहिए क्योंकि इसमें शुगर का स्तर ज्यादा होता है.

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ये हैं सर्दियों में मूली खाने के 5 जबरदस्त फायदे, आज से ही शुरू कर दें खाना

Santosh Chaudhary

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सर्दियों में मूली (Radish) हर किसी की किचन का अहम हिस्सा होती है. किसी को मूली के पराठे पसंद होते हैं, तो कोई मूली की सब्जी खाना पसंद करता है. कुछ लोग तो सलाद (Salad) में कच्ची मूली खा लेते हैं. बहुत सारे लोगों को मूली का अचार भी बेहद पसंद होता है. वहीं ऐसे लोग भी हैं जो खाना तो दूर इसे देखना तक पसंद नहीं करते. अगर आप भी उन्हीं लोगों में से हैं तो इससे होने वाले फायदे जान लें. एक बार इसे खाने के फायदे जान लेंगे तो आप खुद को इसे अपनी डाइट में जरूर शामिल करेंगे.

Radishes With Crème Fraîche and Furikake Recipe | Bon Appétit

किडनी को रखे स्वस्थ

पौष्टिक तत्वों से भरपूर मूली हमारी किडनी को स्वस्थ रखने में मदद करती है. यह हमारे शरीर से विषैले पदार्थों को निकालने में भी मदद करती है और इसलिए इसे नेचुरल क्लींजर भी कहा जाता है. यह हमारी आंतों को स्वस्थ रखने में मदद करती है. इसमें अच्छी मात्रा में फाइबर पाया जाता जो कब्ज के मरीजों के लिए रामबाण है.

भूख बढ़ेगी

अगर किसी को भूख न लगने की परेशानी है तो इसके लिए आप मूली के रस में अदकर का रस मिलाकर पिएं. ऐसा करने से आपकी भूख बढ़ेगी और आपको अगर पेट संबंधित कोई रोग है तो वो भी दूर होगा.

Cooking with White Radish | Love Wholesome

लिवर की परेशानी होगी दूर

अगर आपको पेट में भारीपन महसूस हो रहा है तो आप मूली के रस में नमक मिलाकर पिएं. इससे आपको आराम मिलेगा. जिन लोगों को लिवर संबंधित कोई परेशानी है तो उन्हें अपनी डाइट में मूली को जरूर शामिल करना चाहिए. यह हमारे लीवर को स्वस्थ रखता है.

हाई बीपी में फायदेमंद

हाई बीपी के लोगों के लिए भी मूली बहुत फायदेमंद है. एंटी हाइपरटेंसिव गुणों से भरपूर मूली उच्च रक्तचाप को कंट्रोल करने में मदद करती है. इसके अलावा इसमें पर्याप्त मात्रा में पोटेशियम होता है, जो हमारे शरीर में सोडियम-पोटेशियम के अनुपात को बैलेंस बनाए रखता है जिससे ब्लड प्रेशर मेंटेन रहता है.

Connecticut Garden Journal: Unusual Radishes | Connecticut Public Radio

पीलिया रोग में मददगार

पीलिया पेशेंट्स के लिए यह रामबाण का काम करती है. इन लोगों को अपनी डाइट में ताजी मूली को शामिल करना चाहिए. रोजाना सुबह एक कच्ची मूली खाने से पीलिया रोग सही हो जाता है. मधुमेह के मरीजों के लिए भी यह बेहद फायदेमंद है. इसमें मौजूद तत्व इंसुलिन को कंट्रोल करने का काम करते हैं.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. मुजफ्फरपुर नाउ इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

Source : News18

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ऐतिहासिक खोज : वैज्ञानिकों ने इंसानी शरीर में खोजा एक नया अंग, कैंसर के इलाज में मिलेगी बड़ी मदद

Muzaffarpur Now

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जो पिछले 300 सालों में नहीं हुआ था, अब हुआ साल 2020 में… वैज्ञानिकों ने मानव शरीर में गले के ऊपरी हिस्से में लार ग्रंथियों का एक सेट खोजा है. माना जा रहा है कि पिछली तीन सदियों में मानव शरीर संरचना से जुड़ा यह सबसे बड़ा और अहम अनुसंधान है, जिससे जीवन और चिकित्सा विज्ञान को और बेहतर किए जाने में काफी मदद मिलेगी. खास तौर से गले और सिर के कैंसर के उन मरीज़ों के इलाज में, जिन्हें रेडिएशन थेरेपी से गुज़रना होता है.

ग्रंथियों का यह नया सेट नाक के पीछे और गले के कुछ ऊपर के हिस्से में मिला है, जो करीब 1.5 इंच का है. एम्सटरडम स्थित नीदरलैंड्स कैंसर इंस्टिट्यूट के रिसर्चरों ने कहा कि इस खोज से रेडियोथेरेपी की वो तकनीकें विकसित करने और समझने में मदद मिलेगी, जिनसे कैंसर के मरीज़ों को लार और निगलने में होने वाली समस्याओं को दूर किया जा सकेगा.

Pesquisadores encontram órgão humano desconhecido até hoje (FOTO) - Sputnik  Brasil

क्या रखा गया इन ग्लैंड्स का नाम?

रेडियोथेरेपी एंड ओंकोलॉजी नाम पत्र में प्रकाशित हुए शोध में शोधकर्ताओं ने लिखा कि मानव शरीर में ये माइक्रोस्कोपिक सलाइवरी ग्लैंड लोकेशन चिकित्सा विज्ञान के लिहाज़ से काफी अहम है, जिसे अब तक जाना ही नहीं गया था. रिसर्चरों ने इन ग्लैंड्स का नाम ‘ट्यूबेरियल ग्लैंड्स’ प्रस्तावित किया. इसकी वजह यह है कि ये ग्लैंड्स टोरस ट्यूबेरियस नाम के कार्टिलेज के एक हिस्से पर स्थित हैं.

हालांकि कहा गया है कि इस बारे में और गहन रिसर्च की ज़रूरत है ताकि इन ग्लैंड्स को लेकर बारीक से बारीक बात कन्फर्म हो सके. अगर आने वाली रिसर्चों में इन ग्लैंड्स की मौजूदगी और इससे जुड़ी कुछ और जिज्ञासाओं का समाधान हो जाता है तो पिछले 300 सालों में नये सलाइवरी ग्लैंड्स की यह पहली अहम खोज मानी जाएगी.

हेड स्कैन और नए अंगों की इमेज.

क्या इत्तेफाक से हो गई खोज?

जी हां, रिसर्चर वास्तव में, प्रोस्टेट कैंसर को लेकर स्टडी कर रहे थे और इसी दौरान संयोग से उन्हें इन ग्लैंड्स के बारे में पता चला. संकेत मिलने पर इस दिशा में और रिसर्च की गई. रिसर्चरों ने कहा कि मानव शरीर में सलाइवरी ग्लैंड्स के तीन बड़े सेट हैं, लेकिन जहां नई ग्लैंड्स मिली हैं, वहां नहीं. रिसर्चरों ने खुद माना कि इन ग्लैंड्स के बारे में पता चलना उनके लिए भी किसी आश्चर्य से कम नहीं था.

भारत के लिए बड़ी राहत?

मेडिकल रिसर्च संबंधी भारतीय परिषद की कैंसर इकाई के मुताबिक भारत में गर्दन और और​ सिर का कैंसर बड़ी संख्या में होता है. साथ ही, ओरल कैविटी के कैंसर के केस भी काफी हैं. भारत में रेडिएशन ओंकोलॉजी के विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस खोज से कैंसर मरीज़ों के रेडियोथेरेपी इलाज में काफी मदद मिलेगी. कैसे मिलेगी? आइए विशेषज्ञों के मुताबिक इसका जवाब जानें.

Cancer patients waiting longer for treatment in Scotland - BBC News

कैसे मिलेगी इलाज में मदद?

कैंसर के इलाज में रेडिएशन का साइड इफेक्ट ये होता है मुंह में लार संबंधी ग्रंथियां डैमेज हो जाती हैं, जिससे मुंह सूखा रहता है यानी मरीज़ को खाने और बोलने में लंबे समय की तकलीफ़ हो जाती है. अब जो नई ग्लैंड्स की खोज हुई है, उनसे सलाइवरी ग्लैंड्स का एक और जोड़ा मिलता है. एम्स दिल्ली में रेडिएशन ओंकोलॉजी के विशेषज्ञ रहे डॉ. पीके जुल्का के हवाले से एचटी की रिपोर्ट कहती है कि माना जा रहा है कि ये ग्लैंड्स चूंकि ऊपरी हिस्से में है इसलिए रेडिएशन के दायरे से बाहर रहेगी इसलिए बेहतर इलाज संभव होगा.

क्या कोविड से कोई कनेक्शन है?

यह समझना चाहिए कि सलाइवा यानी लार वो द्रव है, जिसमें को​रोना वायरस के रहने के सबूत मिल चुके हैं. कोविड 19 केसों में सलाइवा टेस्ट को काफी तवज्जो दी जा चुकी है. ओरल कैविटी में वायरस की एंट्री से लेकर सलाइवरी डक्ट के ज़रिये वारयस के पार्टिकल रिलीज़ होने तक के बारे में शोध हो चुके हैं. चूंकि कोविड की बीमारी, परीक्षण और इलाज तीनों ही लार ग्रंथियों से लेकर श्वास ग्रंथियों से जुड़े हैं, इसलिए ऐसे में नाक और गले के बीच में नई सलाइवरी ग्लैंड्स की खोज कोरोना के नज़रिये से भी खासी अहम हो सकती है. हालांकि इस बारे में अभी शोध होने बाकी हैं.

Source : News18

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WHO की चेतावनी- कोरोना बढ़ा तो हर 16 सेकेंड में एक मरा हुआ बच्चा पैदा होगा

Muzaffarpur Now

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लंदन. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (Unicef) और उनके सहयोगी संगठनों ने चेतावनी जारी कर कहा है कि कोरोना महामारी से प्रेग्नेंट महिलाओं और उनके गर्भ के लिए ख़तरा पहले से बढ़ गया है. WHO ने एक रिपोर्ट जारी कर बताया है कि कोरोना महामारी बढ़ी तो हर 16 सेकेंड में एक मृत बच्चा पैदा होगा और हर साल 20 लाख से भी ज्यादा ‘स्टिलबर्थ’ के केस सामने आएंगे. रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से ज्यादातर मामले विकासशील देशों से जुड़े होंगे.

Baby died after mother fell asleep with him on sofa - BBC News

WHO ने गुरूवार को प्रकाशित रिपोर्ट में यह खुलासा किया कि प्रत्येक वर्ष करीब 20 लाख शिशु मृत पैदा (स्टिलबर्थ) होते हैं और ये मामले ज्यादातर विकासशील देशों से जुड़े हैं. गर्भाधान के 28 हफ्ते या उसके बाद मृत शिशु के पैदा होने अथवा प्रसव के दौरान शिशु की मौत हो जाने को ‘स्टिलबर्थ’ कहते हैं. संयुक्त राष्ट्र स्वास्थ्य एजेंसी ने कहा कि पिछले वर्ष उप-सहारा अफ्रीका अथवा दक्षिण एशिया में चार जन्म में से तीन ‘स्टिलबर्थ’ थे.

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ) की कार्यकारी निदेशक हैनरिटा फोर ने कहा, ‘प्रत्येक 16 सेकेंड में कहीं कोई मां ‘स्टिलबर्थ’ की पीड़ा झेलेगी.’ उन्होंने कहा की बेहतर निगरानी, प्रसव पूर्व अच्छी देखभाल और सुरक्षित प्रसव के लिए पेशेवर चिकित्सक की सहायता से ऐसे मामलों को रोका जा सकता है.

महामारी से ख़राब होगी स्थिति

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि कोविड-19 महामारी से ये वैश्विक आंकडे बढ़ सकते हैं. इसमें कहा गया है संक्रमण के कारण स्वास्थ्य सेवाएं 50 प्रतिशत तक घटी हैं और इसके परिणामस्वरूप अगले वर्ष 117 विकासशील देशों में 2,00,000 और ‘स्टिलबर्थ’ हो सकते हैं. डब्लूएचओ ने कहा कि ‘स्टिलबर्थ’ के 40 प्रतिशत से अधिक मामले प्रसव के दौरान के हैं और अगर महिलाएं दक्ष स्वास्थ्य कर्मियों की मदद से सुरक्षित प्रसव कराए तो ऐसे मामलों को रोका जा सकता है.

उप-सहारा अफ्रीका और मध्य एशिया में ‘स्टिलबर्थ’ के करीब आधे मामले प्रसव के दौरान के हैं वहीं यूरोप, उत्तर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में इसके छह प्रतिशत मामले हैं. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक विकासित देशों में जातीय अल्पसंख्यकों में ‘स्टिलबर्थ’ के मामले ज्यादा होते हैं. उदाहरण के तौर पर कनाडा में इन्यूइट समुदाय की महिलाओं में पूरे देश के मुकाबले ‘स्टिलबर्थ’ के मामले तीन गुना ज्यादा होते हैं.

Source : News18

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