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MANTRA

शुक्रवार का दिन है सभी देवियों को समर्पित, ऐसे करें मां दुर्गा की पूजा तो मिलेगा वरदान

Santosh Chaudhary

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लाल रंग का महत्‍व

देवी की आराधना का अर्थ है शक्‍ति की आराधना और पंडित विजय त्रिपाठी जी कहते हैं कि शक्‍ति का रंग है लाल इसीलिए देवी दुर्गा की आराधना में लाल रंग का बहुत महत्‍व है। दुर्गा जी की पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त सबसे श्रेष्‍ठ होता है। इस लिए शुक्रवार को सूर्योदय से पहले उठ कर नित्‍य क्रियाओं से निर्वत हो कर स्‍नान आदि करके शुद्ध हो जायें। देवी की पूजा के लिए धूप, दीप नैवेद्य, मौलि, फल और फूल एकत्रित करें। देवी को लाल फूल अत्‍यंत प्रिय हैं इसलिए गुड़हल, गुलाब जैसे लाल फूल जरूर रखें। फूल ही नहीं देवी को लाल रंग ही अत्‍यंत प्रिय हैं, इसलिए उन्‍हें तो लाल वस्‍त्र और चूनर चढ़ायें ही स्‍वयं भी लाल वस्‍त्र पहन कर पूजा के लिए उपस्‍थित हों।

ऐसे करें पूजा

अब एक लकड़ी के पटरे पर लाल कपड़ा बिछा कर उस पर मां दुर्गा की मूर्ति या फोटो स्‍थापित करें। उसके सामने आसन बिछा कुश बिछा कर आप बैठे। फिर उनकी आराधना शुरू करें। पूजा में देवी पर जल चढ़ा कर उन्‍हें वस्‍त्र, चूड़ी बिंदी और लाल सिंदूर अर्पित करें फिर, दुर्गा चालीसा का पाठ करें। इसके बाद दुर्गा जी की आरती करें। पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप करना भी अत्‍यंत फलदायक रहता है, ‘ॐ श्री दुर्गाय नमः’। मान्‍यता है कि इस मंत्र के जाप से सभी प्रकार की मानसिक, आर्थिक और शारीरिक परेशानियां खत्म हो जाती हैं। शुक्रवार को दुर्गा सप्‍तशती का पाठ करने से भी कष्‍ट दूर होते हैं।

हमारे शास्त्रों में देवी-देवताओं को भोग लगाने का नियम बताया गया है। ऐसा कहा जाता है देवी-देवता हमारे घर में निवास करते है तथा हम उनका घर के सदस्य के रूप में ख्याल रखते हैं और खाने से लेकर उनके सोने का, उनके आराम करने का ध्यान रखते हैं।

ध्यान रखें माता को भोग लगते वक़्त इस मंत्र का उच्चारण करें:

त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ।

गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ।।

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भगवान शिव के व्यक्तित्व से सीखें जीवन में कैसे लाएं संतुलन, संघर्ष के दिनों में रखें याद

Muzaffarpur Now

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भगवान शिव को देवों के देव महादेव ही नहीं कहा जाता बल्कि उन्हें उनके व्यक्तित्व के कई गुणों की वजह से भी सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। कभी वो सौम्य-शांत है, तो कभी वो अत्यंत क्रोधी। ऐसे में उनके व्यक्तित्व से सीखा जा सकता है कि कैसे जीवन में संतुलन लाना है-

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नकरात्मकताओं से गुजरते हुए भी सकरात्मक बने रहना 
समुद्रमंथन से जब विष बाहर आया, तो सभी ने कदम पीछे खींच लिए थे क्योंकि विष कोई नहीं पी सकता था। ऐसे में महादेव ने स्वयं विष (हलाहल) पिया और उन्हें नीलकंठ नाम दिया गया। इस घटना से बहुत बड़ा सबक मिलता है कि हम भी जीवन में आने वाली नकरात्मक चीजों को अपने अंदर  रखकर या इससे गुजरते हुए भी जीवन की सकरात्मकता बनाए रख सकते हैं।

शांत रहकर खुद को नियंत्रित रखना 
शिव से बड़ा कोई योगी नहीं हुआ। किसी परिस्थिति से खुद को दूर रखते हुए उस पर पकड़ रखना आसान नहीं होता है। महादेव एक बार ध्यान में बैठ जाएं, तो दुनिया इधर से उधर हो जाए लेकिन उनका ध्यान कोई भंग नहीं कर सकता है। शिव का यह गुण हमेंं जीवन की चीजों पर नियंत्रण रखना सिखाता है।

जीवन के हर रूप को खुलकर जीना 
शिव की जीवन शैली हो या उनका कोई अवतार, वे हर रूप में बिल्कुल अलग हैं। फिर वो रूप तांडव करते हुए नटराज हो, विष पीने वाले नीलकंठ, अर्धनारीश्वर, सबसे पहले प्रसन्न  होने वाले भोलेनाथ का हो। वे हर रूप में जीवन को सही राह देते हैं।

बाहरी सुंदरता की जगह गुणों को चुनना 
शिव का संपूर्ण रूप देखकर यह संदेश मिलता है कि हम जिन चीजों को अपने आस-पास देख भी नहीं सकते, उसे उन्होंने बड़ी आसानी से अपनाया है। उनके विवाह में भूतों की मंडली पहुंची थी। वहीं, शरीर में भभूत लगाए भोलेनाथ के गले में सांप लिपटा होता है। बुराई किसी में नहीं बस एक बार आपको उसे अपनाना होता है।

अपनी प्राथमिकताओं को समझना 
भगवान शिव को हमेशा से अपनी प्राथमिकताओं का भान रहा। उन्होंने अपनी पत्नी से प्रेम और सम्मान को सबसे ऊपर रखने के साथ अपने मित्र और भक्तों को भी उचित स्थान दिया।

 

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चाणक्य नीति : इन 4 लोगों को कभी न रखें अपने साथ

Santosh Chaudhary

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आचार्य चाणक्य के अनुसार व्यक्ति अपना भाग्य विधाता स्वंय होता है। कभी-कभी छोटी-छोटी गलतियां हमें जीवन में बहुत दुख पहुंचा देती है, इसलिए हमें ऐसी छोटी-छोटी चीजों को शुरुआत में ही बड़ी मानकर चलना चाहिए, जिससे कि हम भविष्य में कई परेशानियों से बच सकें। चाणक्य जीवन को सरल और खुशहाल बनाने के लिए 4 लोगों से दूर रहने की सलाह देते हैं-

बुरी आदतों वाले लोगों से बनाएं दूरी 
चाणक्य ने इन्हें सांप से भी खतरनाक बताया है। इन्होंने कहा है कि सांप तो काल के वश होता है जब व्यक्ति की मृत्यु आती है तभी वह व्यक्ति को काटता है लेकिन दुर्जन व्यक्ति का कोई भरोसा नहीं यह तो कभी भी कहीं भी आपको धोखा दे सकता है और आपकी जान ले सकता है। इसलिए अच्छे और संस्कारी लोगों से ही मित्रता करनी चाहिए।

मूर्ख मित्र की संगति को दूर से करें नमस्कार 
मूर्ख व्यक्ति को आचार्य चाणक्य ने दैत्य के समान बताया है। इनका कहना है कि मनुष्य होकर भी जिनमें बुद्धि और विवेक नहीं है वह दैत्य के समान है इसलिए इनकी संगत नहीं करनी चाहिए। ऐसे लोगों की संगत करने वाला हमेशा संकट में रहता है इसलिए कहा गया है कि बुद्धिमान शत्रु अच्छा लेकिन मूर्ख मित्र नहीं।

लालची लोगों से दूरी ही भली 
अपने से कमजोर और लोभी व्यक्ति से मित्रता कभी नहीं करना चाहिए। लोभी व्यक्ति अपने लाभ के लिए आपको कभी भी छोड़ सकता है और आपके विरोधी से मिलकर आपको नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए जो संतुष्ट हो उसी को साथ रखना चाहिए, लेकिन किसी पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए।

अंहकारी से मित्रता रखने से होता है विनाश 
जिस व्यक्ति में अहंकार भरा हो और अपने को सबसे ज्ञानी मान बैठा हो उसका साथ कभी नहीं करना चाहिए। ऐसे लोग बिल्ली के समान होते हैं जिन पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता है। यह अपने को बड़ा दिखाने के लिए आपकी छवि खराब कर सकते हैं और आपका अपमान भी कर सकते हैं।

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MANTRA

संत से लड़के से कहा बाग में से सबसे सुंदर गुलाब तोड़ लाओ, लड़का खाली हाथ वापस आया

Santosh Chaudhary

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पुरानी लोक कथा के अनुसार एक लड़का प्रसिद्ध संत के पास गया और बोला कि महाराज मुझे कम समय में सबसे आगे पहुंचना चाहता था, मैं नीचे शुरू नहीं करना चाहता, मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे कि मैं सीधे मेरे लक्ष्य पर पहुंच जाऊं।

  1. संत ने कहा कि ठीक है मैं तुम्हें उपाय बता दूंगा, लेकिन पहले मेरा एक काम कर दो। मेरे बाग में से सबसे सुंदर फूल तोड़कर ले आओ, लेकिन ध्यान रखना एक बार आगे निकल जाओ तो पीछे पलट कर फूल नहीं तोड़ना है।
  2. लड़का बोला कि मैं अभी ले आता हूं, ये तो छोटा सा काम है। वह व्यक्ति संत के बाग में गया तो उसे पहला ही फूल बहुत सुंदर लगा, लेकिन उसने सोचा कि आगे इससे भी अच्छे फूल होंगे। लड़का आगे बढ़ा, उसे एक से बढ़कर एक सुंदर फूल दिख रहे थे, लेकिन वह अच्छे से अच्छा फूल देखने के लिए आगे बढ़ता रहा। जब वह बाग के अंत में पहुंचा तो वहां मुरझाए हुए और बेजान फूल थे। ये देखकर लड़का निराश हो गया और खाली हाथ ही संत के पास पहुंच गया।
  3. संत ने उससे पूछा कि तुम गुलाब लेकर नहीं आए, खाली हाथ क्यों आ गए। लड़के ने कहा कि महाराज में बाग में फूल तो बहुत अच्छे-अच्छे थे, लेकिन मैं सबसे सुंदर फूल की चाहत में आगे बढ़ता रहा। अंत में सभी फूल मुरझाए हुए थे, इस वजह से मैं खाली हाथ आ गया।
  4. संत ने उसे समझाते हुए कहा कि हमारे जीवन में भी ऐसा ही होता है। इसीलिए प्रारंभ से काम करना शुरू कर देना चाहिए। जैसे ही कोई अवसर मिले, उसका उपयोग कर लेना चाहिए। ज्यादा अच्छे अवसर के चक्कर में हाथ आए अवसर को नहीं छोड़ना चाहिए। वरना अंत में खाली हाथ लौटना पड़ता है।

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