सावन में कांवड़ उठाने का महत्व, इन नियमों की न करें अनदेखी
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सावन में कांवड़ उठाने का महत्व, इन नियमों की न करें अनदेखी

Santosh Chaudhary

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सावन में भगवान शिव ने विष्पान किया था और उस विष की ज्वाला को शांत करने के लिए भक्त, भगवान को जल अर्पित करते हैं. कांवड़ के जल से भगवान शिव का अभिषेक करने से तमाम समस्याएं दूर होती हैं.

कांवड़ में जल भरकर शिवलिंग या ज्योतिर्लिंग पर चढाने की परंपरा होती है. सावन में भगवान शिव ने विष्पान किया था और उस विष की ज्वाला को शांत करने के लिए भक्त, भगवान को जल अर्पित करते हैं. कांवड़ के जल से भगवान शिव का अभिषेक करने से तमाम समस्याएं दूर होती हैं और तमाम मनोकामनाएं पूरी होती हैं. जो लोग भी कांवर से भगवान शिव को नियमानुसार जल अर्पित करते हैं, उनको मृत्यु का भय नहीं होता.

कांवड़ उठाने के नियम क्या हैं?-

– किसी पवित्र नदी से जल भरकर शिवलिंग पर जल अर्पित करना चाहिए. गंगा नदी का जल सर्वश्रेष्ठ है.

– कांवड़ के जल को भूमि पर नहीं रखना चाहिए.

– जो लोग भी कांवड़ उठाते हैं , ऐसे लोग एक समय भोजन करते हैं , तथा शिव मंत्र का जाप करते रहते हैं.

– कांवड़ उठाने वाले व्यक्ति के घर में भी सात्विक भोजन बनना चाहिए.

– भगवा वस्त्र धारण कर कांवड़ उठाना चाहिए ताकि ऊर्जा का स्तर संतुलित रहे और शक्ति बनी रहे.

– अगर कांवड़ उठाने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य बीच में ख़राब हो जाय तो कोई और भी उसकी जगह कांवड़ उठा सकता है.

घर पर ही कांवड़ यात्रा का लाभ कैसे उठाएं?-

– लोटे में जल भरकर या गंगाजल भरकर शिवमंदिर की 27 बार परिक्रमा करें

– इसके बाद वही जल शिवलिंग पर अर्पित कर दें

– ध्यान रक्खें कि आप नंगे पैर रहें और पीले या नारंगी रंग का वस्त्र धारण करें

– लोटे में थोडा सा बचा हुआ जल रक्खें और घर के कोने कोने में छिड़क दें

– अगर ये प्रक्रिया सोमवार को करें तो सर्वोत्तम फल प्राप्त होगा.

Input : Ajj Tak

MUZAFFARPUR

खोदाई में पत्थर से निकले ‘लाल द्रव’ ने डाल दी थी बाबा गरीबनाथ मंदिर की नींव

Santosh Chaudhary

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सावन के प्रत्येक शुक्रवार को पहलेजा घाट से हजारों कांवरियों के कदम बाबा गरीबनाथ मंदिर की ओर बढ़ते हैं। करीब 77 किमी की दूरी तय कर बाबा के दरबार में पहुंचने वाली आस्था के ये कदम साल दर साल बढ़ते जा रहे। कभी पारिवारिक रहा यह मंदिर अब बड़ा धाम बन चुका है।

गरीबों के तारणहार बाबा गरीबनाथ को लेकर मंदिर के प्रशासक व मुख्य पुजारी पंडित विनय पाठक कहते हैं- कभी यह इलाका जंगल था। दो सौ वर्ष पहले जमींदार रहे मदन मोहन मिश्र की जमीन नीलाम की गई। इसे शहर के चचान परिवार ने खरीदी। इसके बाद जंगल की सफाई की जाने लगी। जंगल में सात पीपल के पेड़ भी थे। छह के बाद मजदूरों ने सातवें पेड़ के पास खोदाई शुरू की। इस दौरान कुल्हाड़ी का वार एक पत्थर पर पड़ा। फिर क्या था उस पत्थर से ‘लाल द्रव’ का फव्वारा फूट पड़ा। खोदाई रोक दी गई। कहा जाता है कि बाद में चचान परिवार ने सात धूर जमीन को घेरकर पूजा-पाठ आरंभ कराई। बाद में पत्थर को दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए खोदाई की गई। मगर, जैसे-जैसे खोदाई की गई, पत्थर फैलता गया। अंतत: इसे यहीं छोड़ पूजा-पाठ जारी रहा। आज भी पीपल का पेड़ यहां है। साथ ही शिवलिंग पर कटे का निशान भी।

..और बाबा कहलाने लगे गरीबनाथ: मुख्य पुजारी कहते हैं कि इलाके के एक व्यापारी के मुंशी इस मंदिर में रोज पूजा करते थे। उनकी एक बेटी थी। जिसकी शादी कम उम्र में हो गई थी। उसके गवना (द्विरागमन) का समय आने पर मुंशी के पास देने को कुछ नहीं था। उन्होंने घर व जमीन बेचने का निर्णय लिया। जमीन रजिस्ट्री करने जाने से पहले वे नित्य की तरह पूजा करने आए। मगर, उदासी चेहरे पर थी। वहां एक बालक ने उदासी का कारण पूछा। रजिस्ट्री के लिए जाने के समय टोकने को अपशकुन मान मुंशी बौखला गए। कहते हैं कि मुंशी का रूप धारण कर एक बैलगाड़ी में गवना के सारे सामान लेकर महादेव उनके घर पहुंच गए, वहां उन्होंने मुंशी की पत्नी को हुक्का बनाकर रखने की बात कही और निकल गए। इधर, मुंशी ने घर पहुंचने पर सामान देखा तो समझते देर नहीं लगी। बोल पड़े, मंदिर में मिला ब्राrाण लड़का कोई और नहीं, साक्षात गरीब के नाथ महादेव थे।

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1950 के दशक में चढ़ा पहला कांवर, हर साल जलाभिषेक

धीरे-धीरे बाबा गरीबनाथ की प्रसिद्धि फैलने लगी। लोगों की मन्नतें पूरी होने लगीं। इसी कड़ी में सरैयागंज के कुछ लोगों ने वर्ष 1950 के आसपास पहलेजा से जल लेकर पहला कांवर चढ़ाया। तबसे यह प्रथा चली आ रही। आज सावन में आठ से दस लाख श्रद्धालु यहां जलाभिषेक करते हैं।

सवा करोड़ हुई न्यास समिति की सालाना आय

वर्ष 2006 में मंदिर का अधिग्रहण किया गया। बाबा गरीबनाथ न्यास समिति बनी। प्रसिद्धि के साथ मंदिर की समृद्धि भी बढ़ी। परिसर अब चार कट्ठे में विस्तार पा चुका है। वहीं बाबा गरीबनाथ न्यास समिति की सालाना आमदनी सवा करोड़ हो गई। अचल संपत्ति के रूप में दादर में 19 कट्ठा जमीन है। नाम के अनुरूप यह समिति गरीबों की सेवा भी करती है। डे केयर सेंटर में आयुर्वेद व होम्योपैथ का निशुल्क इलाज होता है। समय-समय पर यह समिति दिव्यांग, गरीबों की मदद के लिए कार्यक्रमों का आयोजन भी करती है।

Input : Dainik Jagran

 

 

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सावन में करें शनिदेव को प्रसन्न, करियर-नौकरी-धन में होगा लाभ

Santosh Chaudhary

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सावन में शनिदेव की आराधना इसलिए भी बेहद खास हो जाती है क्योंकि सावन में अगर शनिदेव की पूजा-उपासना की जाए तो साल भर शनिदेव की आराधना करने की जरूरत नहीं पड़ती.

संपत शनिवार यानी सावन के शनिवार में की गई शनि की पूजा अद्भुत फल देती है. जिस तरह नाम से ही साफ हो जाता है संपत मलतब संपत्ति. शनिदेव की आराधना से सावन में धन संपत्ति का वरदान भी मिल सकता है. सावन में शनिदेव की आराधना इसलिए भी बेहद खास हो जाती है क्योंकि सावन में अगर शनिदेव की पूजा-उपासना की जाए तो साल भर शनिदेव की आराधना करने की जरूरत नहीं पड़ती.

साल के बाकी महीनों में शनिदेव की कृपा पाना जितना मुश्किल होता है. उतनी ही आसानी से संपत शनिवार को पूजा करके शनिदेव को ना केवल प्रसन्न किया जा सकता है. बल्कि करियर, नौकरी, धन संपदा का वरदान भी मिल सकता है. आइए आपको बताते हैं कि सावन के शनिवार में शनि की पूजा किस तरह से की जाए.

सावन में शनिदेव को करें प्रसन्न-

– शनिदेव की विशेष पूजा शाम के समय करें

– शाम को पहले शिवजी के मंत्र जपें

– इसके बाद शनिदेव के मन्त्रों का जाप करें

– पीपल की 3 बार परिक्रमा करते हुए उसके तने में काला धागा लपेटें

– पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलायें

– रोजगार और करियर की समस्याओं से मुक्ति की प्रार्थना करें,

– महादेव और शनिदेव से धन-संपत्ति का आशीर्वाद मांगे

सावन में शनिदेव की पूजा से पूरे साल का फल मिलता है. संपत शनिवार को धन संपत्ति का विशेष वरदान मिलता है. शनिदेव ना सिर्फ कष्टों को दूर करते हैं बल्कि जीवन को मंगलमय भी कर देते हैं

आप भी सावन में शनिदेव की विशेष कृपा पा सकते हैं. पूरे साल भर तक शनिदेव का आशीर्वाद पा सकते हैं. तो इस सावन संपत शनिवार को शनि की पूजा उपासना जरूर करिएगा. शनिदेव आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा जरूर बरसाएंगे.

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सभी देवी-देवताओं की पूजा में बोला जाता है कर्पूरगौरं करुणावतारं… मंत्र

Santosh Chaudhary

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किसी भी मंदिर में या हमारे घर में जब भी पूजन कर्म होते हैं तो वहां कुछ मंत्रों का जाप अनिवार्य रूप से किया जाता है। सभी देवी-देवताओं के मंत्र अलग-अलग हैं, लेकिन जब भी आरती पूर्ण होती है तो यह मंत्र विशेष रूप से बोला जाता है-

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि।।

मंत्र का अर्थ

इस मंत्र से शिवजी की स्तुति की जाती है। इसका अर्थ इस प्रकार है-

कर्पूरगौरं- कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले।

करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं।

संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार हैं।

भुजगेंद्रहारम्- इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं।

सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभावनी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है।

ये मंत्र का पूरा अर्थ

जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है।

यही मंत्र क्यों….

किसी भी देवी-देवता की आरती के बाद कर्पूरगौरम् करुणावतारं….मंत्र ही क्यों बोला जाता है, इसके पीछे बहुत गहरे अर्थ छिपे हुए हैं। भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय विष्णु द्वारा गाई हुई मानी गई है। शिवजी श्मशान वासी और अघोरी हैं, लेकिन फिर भी ये स्तुति बताती है कि उनका स्वरूप बहुत दिव्य है।

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