आजकल प्रशांत किशोर जी बिहार विधानसभा की कोलाहल से कहीं दूर है। लेकिन सोशल मीडिया पर कही बात आजकल खूब वायरल हो रहा है, जिसमें वह कह रहे हैं।
एक युवा के तौर पर, आपको राजनिति के असल हालात समझने चाहिए। नेताओं के बीच इतनी द्वेष – विदे्ष दिखाई पड़ती है, असल में सच्चाई कुछ और ही होती है। इन बातों पर खासकर युवा वर्ग ज्यादा ही उत्साहित हो जाते हैं, भावनाओं के आवेश में मत आइये, अपनी वस्तुनिष्ठता के साथ खड़े रहिए।

अब जब चुनाव सिर पर है, और बिहार को 10 महीनों में टाॅप – 10 राज्यों में पहुँचाने का वादा अधूरा, और युवाओं के आस अधूरे। युवाओं ने प्रशांत किशोर पर विश्वास कर उनके आंदोलन को सफल बनाने में उद्दत हुए, लेकिन इन जोश , विश्वास और हौसलों का हश्र क्या हुआ… प्रशांत किशोर बंगाल के राजनीति की रणनीति की बागडोर संभालें हुए है।
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बदलाव के नाम पर, रोजगार के नाम पर, व्यवस्था उन्नत करने के नाम पर झासें में आ जाना बिहार के लोगों की पुरानी आदत है। बिहार बदलने की बात प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में ऐसा पहली बार नहीं किया था, लेकिन राज्य उत्थान के नाम पर हर बार युवाओं ने जोड़ लगाया है। नेताओं के हर आवाह्न पर एकजुट हुए। बात बिहार की बिगुल कभी जयप्रकाश नारायण के रूप में, तो कभी प्रशांत किशोर ने बजाया। आंदोलन दोनों के ही सफल हुए, सबने उज्जवल बिहार के सपनें दिखाएं , लेकिन बिहार की जनता को क्या मिला, युवाओं को क्या मिला ..

शायद यही आलोचक तंज कसते हुए कहते हैं,
“लोकनायक बनें जयप्रकाश
और युवा हुए नालायक ”
आज छात्र आंदोलन के 43 साल हो गए, बिहार के युवाओं की स्थिति जस की तस बनी हुई है। हर बार दिलासा देनेवाले के चक्कर में धूलें फांकतें नजर आते हैं। हर राजनीतिक वादे के बाद युवाओं का हर्ष पूछने वाला कोई नहीं मिलता, नेताजी राजनीतिक फसल काटते मिलेंगे। और भविष्य बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शासन व्यवस्था जनित समस्याओं के सवाल में उलझें।

“न दिशा न दशा
और ना ही उज्जवल भविष्य
है वर्षो की जीवटता और संघर्ष
पूछता बिहार का हर युवा
कब उदय होगें रवि,कब बदलेगा समय ”






