राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह पटना के वीरचंद पटेल मार्ग स्थित पार्टी दफ़्तर में अपने समर्थकों के साथ बैठे हैं.
यहाँ सबकी निगाहें टीवी पर हैं. जेडीयू और बीजेपी में गठबंधन की घोषणा की प्रेस कॉन्फ़्रेंस चल रही है. जगदानंद सिंह कहते हैं इस बार बीजेपी ने नीतीश कुमार को ठिकाने लगाने की पूरी योजना बना ली है.
आरजेडी के एक नेता कहते हैं, ”सर, राजेंद्र सिंह तो लोजपा में चले गए. 2015 में इन्हें बीजेपी का सीएम उम्मीदवार बताया जा रहा था. झारखंड में बीजेपी के संगठन मंत्री रहे. सर, सब कुछ सेट है. बीजेपी ही एलजेपी के उम्मीदवार तय कर रही है.”
इस पर जगदानंद सिंह कहते हैं, ”बीजेपी के संगठन मंत्री की बड़ी हैसियत होती है. भला इतना कुछ छोड़कर कोई विधायक के लिए क्यों दांव लगाएगा. नीतीश कुमार ने हमें धोखा दिया था, अब उन्हें पता चलेगा.”
जगदानंद सिंह की इस बात पर उनके चेंबर में बैठे सभी नेता सहमति जताते हैं. इसी दौरान टीवी पर एक ब्रेकिंग चलती है- आरजेडी में आए ‘अनंत’ बाहुबली, मोकामा से मिला टिकट. इस पर मैंने पूछा कि आपने अनंत सिंह को टिकट क्यों दिया? जगदानंद सिंह ने कहा, ”कल तक नीतीश के लिए वो ठीक थे और हमारे लिए ख़राब हो गए?”
राजेंद्र सिंह कहते हैं, ”दिनारा के लोग चाहते थे कि मैं चुनाव लड़ूँ. इस बार भी ये सीट जेडीयू के पास चली गई. मैं जनता के दबाव में चुनाव लड़ रहा हूँ. लेकिन पार्टी बदलने से मेरी विचारधारा नहीं बदली है. मैं अब भी उसी विचारधारा के साथ हूँ.”
पटना के सभी राजनीतिक दलों में इस बात की चर्चा गर्म है कि बीजेपी ने इस बार नीतीश कुमार को राजनीतिक रूप से ठिकाने लगाने के लिए सारे दाँव खेल दिए हैं.
एलजेपी बिहार में सभी सीटों पर जेडीयू के ख़िलाफ़ उम्मीदवार उतारेगी.
चिराग पासवान ने कहा है कि उनकी पार्टी बिहार में 143 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और अगर ऐसा होता है तो ज़ाहिर है कि 21 उन सीटों पर भी उम्मीदवार उतारेगी, जहाँ बीजेपी चुनाव लड़ रही है. क्या बीजेपी और एलजेपी में कोई मौन गठबंधन है?
‘बेलगाम महत्वाकांक्षा’
जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद कहते हैं, ”ऐसा अब नहीं लगता. अब तो स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी 121 और जेडीयू 122 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. यह चुनाव बहुत ही ध्रुवीकृत होने जा रहा है और लड़ाई एनडीए बनाम आरजेडी ही है. बाक़ियों को जो करना हैं करें.”
‘मैं चिराग को लेकर यही कहूँगा कि बेलगाम महत्वाकांक्षा अक्सर औंधे मुँह गिरा देती है. रामविलास जी होते तो स्थिति दूसरी होती. अभी वो बीमार हैं, इसलिए इतना कुछ हुआ है.”
राजीव रंजन कहते हैं, ”जिस गठबंधन में नीतीश कुमार रहेंगे, उस गठबंधन की जीत होगी. कोई इस मुगालते में ना रहे कि बिना नीतीश कुमार के चुनाव जीत लेगा और सरकार बना लेगा.”
”बीजेपी और एलजेपी में मौन सहमति की आशंका लोगों में है लेकिन जैसे-जैसे चुनाव क़रीब आएगा, स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी. बीजेपी ने साफ़ कह दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर केवल एनडीए ही इस्तेमाल करेगा और बिहार में एलजेपी अब एनडीए में नहीं है.”
हालाँकि ऐसा भी नहीं है कि रामविलास पासवान और नीतीश कुमार के रिश्ते बहुत अच्छे रहे हैं. फ़रवरी 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था.
रामविलास पासवान की पार्टी से 29 विधायक जीते थे और उन्होंने किसी का भी समर्थन नहीं किया था.
अक्तूबर 2005 में फिर से चुनाव हुआ और एलजेपी अप्रासंगिक हो गई क्योंकि बीजेपी और जेडीयू को स्पष्ट बहुमत मिल गया था. दूसरी ओर एलजेपी फ़रवरी के प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाई थी और 10 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था.
2015 में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव साथ आ गए. एलजेपी को बीजेपी ने 42 सीटें दीं, लेकिन जीत महज दो सीटों पर मिली. इस बार जेडीयू एलजेपी को 15 सीट से ज़्यादा देने पर तैयार नहीं थी और एलजेपी 42 से कम सीटों पर लड़ने के लिए तैयार नहीं थी.
नीतीश कुमार और रामविलास पासवान में दलित वोटों को लेकर भी जंग है. हाल ही में नीतीश कुमार ने अशोक चौधरी को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया है. अशोक चौधरी रविदास जाति से हैं और नीतीश कुमार ने इस जाति को महादलित श्रेणी में रखा है.
नीतीश कुमार में दलित जातियों के बीच भी एक लक़ीर खींची. उनका तर्क था कि दलितों के बीच जिन जातियों को सरकारी योजनाओं का फ़ायदा नहीं पहुँच पाया है, उन पर प्राथमिकता के आधार पर ध्यान दिया जाएगा.
Input: BBC Hindi







