साल 2015 के विधानसभा चुनावों (Bihar Assembly Election 2015) में एग्जिट पोल के अनुमान जनता का मूड भांपने में नाकाम रहे थे. उस साल भाजपा ने जेडीयू को छोड़कर दूसरी पार्टियों के साथ चुनाव लड़ा था, जबकि नीतीश खुद राजद से जा मिले थे. पोल के अनुमान बीजेपी को विजेता बता चुके थे, जबकि हुआ उल्टा. जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने महागठबंधन बनाकर बीजेपी को शिकस्त दी थी.
सुशासन के नाम पर और जंगलराज को खत्म करने के वादे के साथ जेडीयू के नेता नीतीश कुमार साल 2005 में जो सत्ता में आए, तो अगले चुनावों में भी जनता ने उनका साथ नहीं छोड़ा. हालांकि उसके बाद भाजपा से नीतीश के तनाव सामने आने लगे और जेडीयू ने लालू यादव की पार्टी आरजेडी के साथ महागठबंधन बना लिया था.
इस साल 5 चरणों में हुए चुनावों का नतीजा 8 नवंबर को आया. इसमें बड़ी कामयाबी पाते हुए आरजेडी ने कुल 80 सीटों पर कब्जा कर लिया. ये 18.8 फीसदी वोट शेयर था. यानी हवा एक बार फिर लालू के पक्ष में बह रही थी. नीतीश की पार्टी जदयू भी टक्कर पर रही और उसने 71 सीटें पाईं, जो कि 17.3 फीसदी वोट शेयर था. कांग्रेस ने भी इस बार दूसरे चुनावों से काफी बेहतर प्रदर्शन करते हुए 27 सीटें पा ली थीं. ये साल 2010 के चुनावों से उपजी शर्म को काफी हद तक खत्म करने वाला रहा, जिसमें कांग्रेस को केवल 4 वोट मिले थे.
दूसरी ओर एनडीए के तहत बीजेपी को 53 वोट मिल सके थे. ये नतीजे पोल से पूरी तरह विपरीत थे. पोल के मुताबिक एनडीए बहुमत लाने वाली थी. यहां तक कि उस बार पार्टी दफ्तर में लड्डू तैयार हो चुके थे और काउंटिंग से पहले ही पटाखे भी फूटने लगे थे लेकिन नतीजे आए तो एग्जिट पोल गलत निकले. जितनी सीटें NDA को दी जा रही थीं उतनी नीतीश की अगुवाई वाला महागठबंधन बटोर ले गया.
यही वजह है कि इस बार एग्जिट पोल के आंकड़ों को लेकर पार्टियों में बड़ी खदबदाहट है. तेजस्वी के नेतृत्व में आरजेडी उत्साहित है क्योंकि नतीजे इसके पक्ष में होंगे, ऐसा माना जा रहा है. हालांकि तब भी साल 2015 के चुनावी उलटफेर को देखते हुए अतिरिक्त सावधानी रखी जा रही है और चर्चा है कि खुद तेजस्वी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से खुशियां न मनाने की अपील की है. दूसरी ओर यही बात नीतीश के पक्ष में जा सकती है कि शायद एग्जिट पोल के अनुमान गलत साबित हो जाएं.
बहरहाल, जो भी होगा, फिलहाल लौटते हैं, साल 2015 के चुनावों पर. तो महागठबंधन के साथ मिलकर जीत के बाद भी नीतीश कुमार ने राजद, कांग्रेस और अन्य दलों को मिलाकर सरकार बनाई. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने और उप मुख्यमंत्री बने लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव. लेकिन 2017 में नीतीश कुमार ने राजद से गठबंधन तोड़ लिया और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली.
उस बार साल 2000 के बाद एक बार फिर से लालू यादव किंग मेकर बनाकर उभरे थे. उनकी पार्टी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर दोबारा खड़ी हो गई. सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी लालू यादव मन की नहीं चला सके क्योंकि वे चारा घोटाले के कारण जेल में थे. ऐसे में उन्होंने अपने बेटे तेजस्वी यादव को उप-मुख्यमंत्री बना दिया ताकि सत्ता उनके परिवार में ही रहे. हालांकि नीतीश के साथ काम करने के लगभग 16 महीने बाद तेजस्वी को पद से हटना पड़ा क्योंकि नीतीश एक बार फिर से बीजेपी से मिल गए थे.
वैसे एग्जिट पोल के अनुमान गलत होने के बाद इसपर खूब चर्चा हुई कि बिहार में भाजपा के साथ एनडीए का बुरा हाल क्यों हुआ. तब भाजपा के साथ कोई लहर नहीं थी. वो लगातार नीतीश के कामों पर सवालिया निशान लगाती रही, जो कि मतदाताओं के गले नहीं उतर सका. एक और वजह ये थी कि भाजपा के पास सीएम पद के लिए कोई चेहरा नहीं था. साथ ही संघ प्रमुख महोन भागवत के कई बयानों से बिहार के मुस्लिम वोटर काफी आहत हुए. चूंकि संघ से बीजेपी का सीधा कनेक्ट माना जाता है, लिहाजा इसका असर वहां पार्टी वोट पर हुआ.
Source : News18





