बिहार में पलायन की तस्वीर आज भी नहीं बदली है. रोजगार की तलाश में लोग आज भी दूसरे राज्यों की तरफ उम्मीद ​​से देखते रहते हैं. कोरोना काल में भी यह तस्वीर सामने आयी. मध्यम वर्ग से लेकर मजदूरों तक की त्रासदी टीवी चैनलों की सुर्खियों में रही. उसमें बिहार की तस्वीर सबसे आगे रही. दिल्ली, पंजाब, गुजरात, मुंबई समेत कई राज्यों से लोग बिहार लौटते नजर आये. इस पर खूब राजनीति भी हुई. बिहार सरकार ने फौरन उनकी मदद का ऐलान भी किया. मगर सरकार की खूब फजीहत भी हुई. अब चुनावी साल है. 15 साल बनाम 15 साल हो रहा है. कभी नीतीश मॉडल काफी सुर्खियां बटोर चुका है. मगर नीतीश के करीबी रहे. प्रशांत किशोर ने भी कुछ समय पहले उनकी खूब फजीहत कर दी. उनके दावों ने मीडिया के सामने प्रस्तुत किया कि बिहार आज भी पिछड़ा है.

अब सवाल उठता है. क्या प्रदेश का विधान सभा चुनाव केवल कास्ट पॉलटिक्स पर ही खेल दिया जाएगा. उससे आगे की बात होगी या नहीं. विपक्ष सरकार को कटघड़े में लाकर यह सवाल पूछ रहा है कि रोजगार कहां है. वहीं सरकार उनके शासन में हुये अपराध की घटनाओं को समाने लाकर उन्हें सवालों के घेरे में ला रही है. पक्ष व विपक्ष के बीच केंद्र भी ऐलानों की फेहरिस्त जारी कर रहा है. मगर इन सबके बीच जनता की समस्यायें क्या धूल फांकती रहेगी. आंकड़े बताते हैं कि आज भी बिहार में प्रति व्यक्ति आय नहीं बढ़ी. देशभर के तुलना में अ​ब भी बहुत कम है. बिहार की आबादी 10 करोड़ से अधिक हो गयी है. यहां युवाओं की संख्या 2 करोड़ 80 लाख के आसपास है. बिहार में प्रति व्यक्ति आय का औसत देश के मुकाबले आज भी सबसे कम है. देश का प्रति व्यक्ति आय 22,946 औसतन इतना है. उस मुकाबले में बिहार बहुत पिछड़ा है.

एक आंकड़े के अनुसार बिहार में पलायन का दर 2009 में जहां 17 प्रतिशत था. वह अब 2018 तक के आंकड़ों के अनुसार 26 प्रतिशत तक जा पहुंचा है. अब इसमें और इजाफा हो गया होगा. अंग्रेजों के शासनकाल से लेकर कई समय में यहां औद्योगिक विकास हुये. बिहार में लगे 3132 फैक्ट्रियों में 1,15,000 हजार कर्मचारी हैं. फूड प्रोसेसिंग की 278 यूनिट हैं. उसमें 48 हजार 404 कर्मचारी हैं.हैंडलूम ​इकाईयां 1089 हैं जिसमें करीब 47 हजार कर्मचारी हैं. प्रदेश में हर साल तकरीबन 45 से 50 लाख लोग पलायन करते हैं. जानकार बताते हैं कि प्रदेश में उद्योगों का विकास नहीं हो पाया. जो इंडस्ट्रियल पॉलिसी है. उसमें यहां के लोगों को प्राथमिकता नहीं दी जाती है. बाहर से निवेश हो नहीं पा रहा. बाहरी निवेश न हो पाने की बड़ी वजह कोशी का बाढ़ भी है. हर साल बाढ़ की त्रासदी भारी नुकसान पहुंचाती है.

पहले सड़कों के हालात व अपराध की घटनायें भी बड़ी वजह थी. मगर अब मौजूदा नीतीश सरकार ने उसमें सराहनीय कार्य किये हैं. आंकड़ों की माने तो पलायन की वजह है. बड़े बड़े निवेशों की कमी है. आज भी औद्योगिक निवेश नहीं हैं. मल्टीनेशनल कंपनियों के अलावे निजी नौकरियां कम हें. समय समय पर सरकारी दावें तो होते हैं. बिहार सरकार ने मॉल, रेस्टोरेंट व बड़ी बड़ी इमारतें तो बनायी. मगर अब भी पलायन का दर कम नहीं हो पाया. बिहार में चुनाव के समय केवल वोट की राजनीति होती है. बिहार में कई जिलों का हाल बेहाल है. गरीबी से लेकर रोजगार की समस्या है. प्रदेश का साक्षरता दर भी 62 के आसपास है. अब चुनावी साल है. क्या चुनावों में यह मुदृे भी होंगे. क्या चुनाव में पलायन भी मुदृदा बनेगा.

Source : Live Cities

Muzaffarpur Now – Bihar’s foremost media network, owned by Muzaffarpur Now Brandcom (OPC) PVT LTD