अजीबोगरीब स्थिति है। लॉकडाउन लगाने में देर की तो पटना हाईकोर्ट से फटकार पर फटकार मिली। जब लॉकडाउन लगा कर सख्ती की तो लोग पुलिस से लड़ने-भिड़ने को तैयार हैं। ये सही है कि राज्य सरकार की नाकामी से स्थिति लगातार खराब होती रही है। पटना हाईकोर्ट सरकारी तंत्र के फेल होने पर लगातार सवाल उठाता रहा है। लेकिन कोरोना की भयावह स्थिति के बीच क्या अराजकता को स्वीकार किया जा सकता है ? कोरोना से मरने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अपनों के यूं गुजर जाने से लोगों के मन गुस्सा है। दुख-तकलीफ से गुस्सा है। लेकिन अगर यह गुस्सा अराजकता में बदल जाए तो क्या स्वीकार होगा ? इस स्थिति के लिए क्या केवल सरकार जिम्मेवार है ? हमारा कोई कसूर नहीं ?

इस बार नीतीश कुमार की आलोचना इसलिए हो रही है कि उन्होंने देर से ल़ॉकडाउन लगाया। इस बात के लिए भी आलोचना हो रही है कि लॉकडाउन के पहले जब नाइट कर्फ्यू लगाया तो सख्ती क्यों नहीं की। अब जब लॉकडाइन लगा और सख्ती हो रही है तो कहा जा रहा है कि पुलिस ज्यादती कर रही है। पटना में बुधवार की रात को स्कूटी सवार लड़की ने पुलिसवालों और मीडियाकर्मियों के साथ जो बदसलूकी की, क्या उसे जनसामान्य का गुस्सा कहा जाएगा ? वह जिस तरह से अपशब्दों का प्रयोग कर रही थी वह तो अराजकता की निशानी है। पुलिस ने हेलमेट नहीं पहनने के लिए अगर चालान काट दिया को क्या गलत किया ? मीडिया में हाइप मिलने के कारण ऐसे सिरफिरे लोग भी सुर्खियां बटोरने लगते हैं। इस दुख घड़ी में भी कई लोग चर्चा में रहने के लिए गलत तरीके अपना रहे हैं। करीब 20 दिन पहले दिल्ली में भी एक दम्पति ने बीच सड़क पर पुलिसवलों के साथ अभद्रता की थी। पत्नी ने तो असभ्यता की सारी हदें पार कर दी थी। लेकिन जब उनकी गिरफ्तारी हो गयी तो सारा गुस्सा पानी के बुलबुले की तरह फूट गया। ये तो पटना पुलिस की उदारता है कि इतना कुछ सुनने के बाद भी स्कूटी वाली मैडम को बदसलूकी के आरोप में गिरफ्तार नहीं किया।

आजादी चाहिए या जीवन की सुरक्षा ?

शास्त्रों में कहा गया है कि जब अनुनय विनय के बाद भी राज्यादेश का अनुपालन सुनिश्चित नहीं हो तो दंड का प्रयोग अवश्य किया जाना चाहिए। चीन ने कोरोना पर कैसे काबू पाया ? कहा जाता है कि साम्यवादी सरकार की निरंकुशता ने उसके इस काम को आसान कर दिय। जब वुहान में कोरोना का विस्फोट हुआ तो सरकार ने एक झटके में छह करोड़ की आबादी को घरों में कैद कर दिया। न कोई सवाल न कोई जवाब। बेवजह घरों से बाहर निकलने पर कठोर दंड ने लोगों को डरा दिया। जब चीन ने वुहान में संक्रमण चेन तोड़ने के लिए कड़ाई की तो कई लोगों ने मानवाधिकार का सवाल उठाया। पश्चिमी देशों ने मौलिक अधिकारों के हनन का सवाल उठाया। लेकिन चीन ने वही किया जो सोशल डिस्टेंसिंग के लिए जरूरी था। भारत में लोकतंत्र है। कोरोना गाइडलाइंस अनुपालन से लोगों की आजादी कम हो रही है। पाबंदी पसंद नहीं। रोको-टोको तो गुस्सा ही हुस्सा। ऐसी मनमानी की वजह से आज भारत में मौत का हाहाकार है तो दूसरी तरफ चीन के लोग बिल्कुल महफूज हैं।

नहीं किया तो गुस्सा, किया तो भी गुस्सा

मार्च 2020 में जब लॉकडाउन लगा था तब नीतीश कुमार ने प्रवासी मजदूरों को बिहार बुलाये जाने का विरोध किया था। उनका तर्क था कि जब लॉडाउन में आवाजाही होगी तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कैसे होगा ? बाहर से आने वाले लोगों की वजह से अगर बिहार में कोरोना का संक्रमण बढ़ता है तो इसके लिए जिम्मेवार कौन होगा ? सवाल वाजिब था लेकिन राजद ने इसे राजनीतिक मुद्दा बना लिया। राजद के नेता कहने लगे कि नीतीश कुमार गरीब मजदूरों के खिलाफ हैं और उन्हें भुखमरी के कगार पर पहुंचाना चाहते हैं। यहां तक कि इस मुद्दे पर भाजपा ने भी नीतीश कुमार का विरोध कर दिया। नीतीश कुमार ने जब मार्च 2020 के लॉकडाउन में सख्ती की तो विरोधी दलों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। वे आरोप लगाने लगे थे कि सरकार ने मजदूरों और रेहड़ी वालों की रोजी-रोटी छीन ली। 2021 में जब कोरोना की दूसरी लहर आयी तो सरकार ने लॉकडाउन लगाने में जल्दबाजी नहीं की। सख्ती का कहीं नामोनिशान नहीं। कोरोना लाशों का ढेर लगा रहा था। फिर भी गाइडलाइंस के पालन के लिए कहीं कड़ाई नहीं। सरकार पिछली बार की तरह लोगों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती थी। फिर भी सरकार की फजीहत हुई। पटना हाईकोर्ट ने दो दिन पहले कहा था, लॉकडाउन लगेगा कि नहीं, आज बताएं, वर्ना कोर्ट ले सकता है कड़ा फैसला। अब जब सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया है तब भी परेशानी है।

Input: one india

Muzaffarpur Now – Bihar’s foremost media network, owned by Muzaffarpur Now Brandcom (OPC) PVT LTD