(दिग्विजय कुमार) लाेकल फाॅर वाेकल काे जमीन पर उतारने के लिए देशभर के प्रशिक्षु आईएएस काे जिम्मा दिया जा रहा है। इन प्रशिक्षु अफसराें काे देशभर की उन खास वस्तुओं काे चिह्नित करने को कहा गया है कि जिन्हें जिओग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैगिंग नहीं मिल पाई है।

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इसके लिए बिहार समेत सभी राज्याें काे लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अकेडमिक ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन मसूरी के निदेशक ने पत्र जारी कर अफसराें काे मदद का आग्रह किया है। बिहार में मखाना काे जीआई टैगिंग के लिए चिह्नित किया गया है। कृषि विभाग के सचिव डाॅ. एन सरवण कुमार ने इस बाबत सभी डीएम काे पत्र लिखा है।

पत्र में कहा गया है कि 2019 बैच के आईएएस प्रशिक्षु मसूरी में जीआई असाइनमेंट पर काम करने वाले हैं। अबतक, भागलपुरी कतरनी चावल व जर्दालु आम, मगही पान तथा मुजफ्फरपुर की शाही लीची काे जीआई टैग मिल चुका है। मखाना काे दिलाने की प्रक्रिया चल रही है। इसमें स्थानीय किसानाें के समूह के अलावा बिहार कृषि विवि सबाैर की भूमिका अहम है। मिथिला मखाना के नाम से जीआई टैगिंग काे लेकर सबौर ने सहमति दे दी है।

सूबे में 15 हजार टन से अधिक मखाना का उत्पादन

मखाना की खेती मधुबनी से शुरू हुई थी। 1954 के बिहार गजेटियर में जिक्र भी है। देश की 85 फीसदी खेती बिहार में होती है। उत्तर बिहार के 5 लाख से अधिक लोग मखाना व्यवसाय से जुड़े हैं। दरभंगा स्थित मखाना रिसर्च सेंटर ने 2014 में सर्वाधिक उत्पादन वाला प्रभेद स्वर्ण वैदेही तैयार किया जो पहले से दोगुनी और मात्र 5 माह में तैयार होती है। क्वालिटी भी काफी अच्छी है।

मिथिलांचल-सीमांचल व तिरहुत में इसका डिमोंस्ट्रेशन हुआ। फायदा यह हुआ कि 2004 में पूरे बिहार में 3 हजार टन मखाना लावा का उत्पादन होता था, अब 15 हजार टन से अधिक हो रहा है। मिथिलांचल में 16 हजार से अधिक तालाब हैं। इसके अलावा निचले इलाके की जमीन में पानी रोक कर भी खेती की जा सकती है। उत्पादक प्रति एकड़ 5 लाख रुपए तक कमा सकते हैं।

Source : Dainik Bhaskar

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