रंगो के त्योहार होली में अब चंद दिन ही शेष बचे हैं। ऐसे में होली का चौपाल नहीं जमे यह मुमकिन नहीं। इन दिनों हर एक गांव टोले में फगुआ का चौपाल जम रहा है जिसमें होली का धमाल मच रहा है। ढोलक झाल के साथ यह चौपाल शाम ढलते हीं परवान चढ़ती है जो देर रात तक जवान रहती है। इस चौपाल में कहीं अबीर तो कहीं गुलाल उड़ रहे हैं। युवाओं की टोली भक्ति रस में डूब रही है तो युवाओं की टोली श्रृंगार रस में झूम रही है। इन चौपालों के धुन ने माहौल को होलियाना बना डाला है।

होली के चौपालों में जब पारंपरिक फगुआ के गीत गूंजते हैं तो लोग होली की मस्ती में सराबोर हो उठते हैं। होली गायन में सिद्धहस्त सिमरिया बस्ती के सुदर्शन सिंह बताते हैं कि दो दशक पूर्व होली का गायन बसंत पंचमी से प्रारंभ हो जाता था जो पूरे एक महीने चलता था। उन दिनों गांव के प्रत्येक मानिद परिवार में होली की टोली पहुंचती थी और चौपाल जमता था। इस चौपाल में गांव के सभी संगीत प्रेमी जुटते थे और देर रात तक होली का गायन होता था।

इस चौपाल ने गांव में आपसी प्रेम, सौहार्द और भाईचारा बना रखा था। इस चौपाल के कारण ही नई पीढ़ी तक होली गायन का पारंपरिक गीत और संगीत पहुंचता था। किंतु अब चौपालों में सिर्फ खानापूर्ति होती है। अगर यही हाल रहा तो होली के पारंपरिक संगीत लुप्त होकर रह जाएंगे। इधर ढोलक वादक सुबोध पांडेय ने बताया कि युवाओं में पहले जैसा दमखम तो नहीं है बावजूद उनसे जितना कुछ सीखा है उससे चौपाल जम रही है। आधुनिक होली गीत पारंपरिक गीतों को नुकसान पहुंचा रही है।

चौपालों में पारंपरिक गीतों को पुन: स्थापित करने की कोशिश की जा रही है ताकि चौपालों की वास्तविक संस्कृति बनी रहे।

Input: Live Hindustan

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