वक्त के साथ कुछ परंपराएं-मान्यताएं फिर लौट आएंगी, या अभी के वक्त के कहर के साथ ही ये भी खत्म हो जाएंगी, कहना मुश्किल है। लेकिन इस समय कोसी की एक परंपरा को जरूर तिलांजलि दे दी गई है। माछ (मछली), पान और मखान यहां की संस्कृति रही है। पान के साथ भी एक रोचक परंपरा है कि यहां शादी में सालियां जीजा को जूठा पान खिलाती हैं। इस पर कोरोना संकट के काल में इसपर भी लॉकडाउन लग चुका है।

यह मौसम शादियों का है और इस माह 27 तारीख तक मुहूर्त भी है। लॉकडाउन के बीच कहीं-कहीं शादी हो भी रही है तो बस रस्म अदायगी भर। न भीड़ है, न गीत। कोरोना के कहर में जूठा पान कौन खिलाए? आगे भी शायद ही ऐसा हो, क्योंकि कोरोना ने बहुत कुछ सिखा भी दिया है।

सहरसा स्थित रमेश झा महिला महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. रेणु सिंह कहती हैं कि यह परंपरा सदियों पुरानी है। उनके दादा-दादी भी अपनी शादियों के किस्से सुनाते वक्त इसके बारे में बताते थे। ऐसी मान्यता है कि जो दूल्हा जूठा पान खा लेता है वह पत्नी पर विशेष ध्यान रखता है।

सामाजिक कार्यकर्ता लाजवंती झा कहती हैं कि दूल्हे के पान में जो सुपारी दी जाती है, दुल्हन उसे मुंह में रखती है। उसी सुपारी को पान में डालकर साली अपने जीजा को खिलाती है। शादी के पहले दुल्हन अपने पति को जूठा खिला सकती है, लेकिन शादी के बाद जीवन भर वह ऐसा नहीं कर सकती। सुपौल के कर्णपुर निवासी 90 वर्षीय नागेंद्र नाथ झा बताते हैं कि उनकी शादी 74 वर्ष पूर्व खगडिय़ा के मोरादपुर गांव में श्रीमती झा के साथ हुई थी। उस समय उन्हें भी वरमाला के बाद जूठा पान खाना पड़ा था। यह रस्म बहुत पुरानी है।

इस बाबत भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एवं अस्‍पताल के चिकित्‍सक डॉ. आलोक कुमार सिंह कहते हैं कि परंपराएं-मान्यताएं वक्त के साथ टूटती भी हैं। कोरोना का संकट है। ऐसे में हमें एक-दूसरे से शारीरिक दूरी बनाए रखनी चाहिए। किसी का जूठा न खाएं और न खाने दें। लार और थूक से भी कोरोना का संक्रमण फैलता है। इसलिए सतर्कता और सावधानी जरूरी है।

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