इस गांव से उस गांव में घूमकर भीख मांग कर अपना पेट भरने वाला दयानंद गोसाईं नाम का शख्स एक झटके में गांव का बड़ा जमींदार बन गया। पटना और नालंदा जिले में कई कोठियों और करीब 150 बीघा खेत का मालिक बन गया। ऐसा हुआ कि उसके ‘कन्हैया’ अवतार के बाद। बिहार के जमुई जिले से शुरू हुई यह कहानी नालंदा में जिस अंदाज में खत्म हुई, उसके सामने तो अच्छी-अच्छी फिल्मों और वर्षों तक चले धारावाहिकों की स्क्रिप्ट भी फेल है।

नालंदा की कोर्ट में 41 साल चली सुनवाई
नालंदा जिले के सिलाव (वर्तमान में बेन) थाना क्षेत्र के मोरगावां निवासी जमींदार स्व. कामेश्वर सिंह के असली वारिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लोअर कोर्ट में 41 वर्ष से सुनवाई चल रही थी। इसके पहले लोअर कोर्ट ने केस को खारिज कर दिया था। तब कोर्ट ने कहा था कि पिता इसे अपना पुत्र मान रहे हैं तथा सूचिका रामसखी देवी का देहांत हो चुका है, ऐसे में केस चलाने से कोई फायदा नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दोबारा शुरू हुई सुनवाई
इसके बाद कामेश्वर सिंह की बेटी विद्या देवी फैसले के विरोध में हाईकोर्ट चलीं गईं। वहां भी अपने को कन्हैया बताने वाले दयानंद गोसाईं के पक्ष में फैसला आया। तब विद्या देवी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं। माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मदन मोहन पूंछी ने विद्या देवी को अपना पक्ष रखने तथा मामले का ट्रायल करने के लिए लोअर कोर्ट को आदेश दिया। इसके बाद लोअर कोर्ट में फिर से सुनवाई शुरू हुई।

हाईकोर्ट के आदेश पर चला स्पीडी ट्रायल
तीन महीने पहले एसीजेएम- पांच बने मानवेंद्र मिश्रा ने वर्ष 2000 से पूर्व के लंबित सभी मामलों का स्पीडी ट्रायल माननीय उच्च न्यायालय पटना के निर्देश पर चलाया। यह मामला कोर्ट में 41 वर्ष से लंबित था। जुबेनाइल जस्टिस बोर्ड से एसीजेएम-पांच बने मानवेंद्र मिश्रा ने जब इस केस को देखा तो पुराने वाद विशेषकर जो वर्ष 2000 से पहले के हैं, उन्हें उच्च न्यायालय पटना के विशेष दिशा-निर्देश पर स्पीडी ट्रायल से फैसला करने का आदेश दिया। लिहाजा दो महीने से इसकी डे-टू-डे सुनवाई चल रही थी।
दयानंद गोसाईं का मृत्यु प्रमाणपत्र भी फर्जी
मंगलवार की सुबह साढ़े नौ बजे एसीजेएम-पांच मानवेंद्र मिश्रा ने अभियुक्त तथाकथित कन्हैया को दयानंद गोस्वामी पाते हुये दोषी करार दिया। इसे दयानंद गोसाईं बताया। फैसले में उन्होंने कहा कि कोर्ट को दयानंद गोसाईं के नाम से प्रस्तुत किया गया मृत्यु प्रमाण-पत्र भी गलत है। इसके बाद लंच ब्रेक हो गया। सुबह 10 बजे फैसला सुनाया गया। अपने को स्व. कामेश्वर सिंह का पुत्र कन्हैया बताने वाले को कोर्ट ने दयानंद गोसाईं करार दिया। इसके बाद उसे तीन धाराओं में सजा दी गई।

सुनवाई के दौरान इन बिंदुओं पर कोर्ट को गहराया शक
अभियोजन अधिकारी डा. राजेश कुमार पाठक ने बताया कि कोर्ट ने जब दयानंद गोसाईं को डीएनए टेस्ट कराने की बात कही तो वह मुकर गया। इसके अलावा मृत्यु प्रमाण पत्र भी जांच में गलत पाया गया। गायब होने के बाद 1977 से 1981 के बीच वह कहां रहा, इसका कोई प्रमाण नहीं प्रस्तुत कर पाया। किसी व्यक्ति ने कोर्ट में आकर गवाही नहीं दी कि कन्हैया हमारे साथ था।

जमुई के तीन लोगों ने की दयानंद की पहचान
जमुई के चौकीदार, उसी गांव के ग्रामीण नंदन व विष्णु गोसाईं भी उसने पहचान दयानंद गोसाईं के रूप में की। दयानंद गोसाईं का मृत्यु प्रमाण-पत्र भी 2014 में इसने दिया। इसके पहले वह कहता रहा कि दयानंद गोसाईं नाम का कोई है ही नहीं। 1980 में बिहार बोर्ड में दर्ज है कि प्रभु गोस्वामी के पुत्र दयानंद गोसाईं ने परीक्षा दी है। पुलिस जांच में भी पता चला कि प्रभु गोस्वामी का छोटा बेटा भीक्षु बनकर गया-नालंदा गया है और वहां जमींदार की संपत्ति पर कब्जा जमाए है।

मां ने भी कहा था, नहीं है मेरा बेटा माथे पर पीछे चोट के निशान भी गायब
अभियोजन अधिकारी डा. राजेश कुमार पाठक ने बताया कि कन्हैया की मां रामसखी देवी ने भी दयानंद गोसाईं को अपना बेटा मानने से इन्कार कर दिया था। कहा था कि बेटे के माथे के पीछे चोट था। वहां बाल नहीं उग सका था। इसके माथे पर ऐसा कोई निशान नहीं है। वहीं अभियुक्त सात गवाह लाया। कोई कन्हैया का हमउम्र नहीं था। परिवार का भी कोई सदस्य नहीं आया, जो इसे कन्हैया बता सके। जो दो मामा को इसने प्रस्तुत किए, वे सौतेली मां के गांव लखीसराय के थे। पास के बख्तियारपुर वाला में रहने वाले इसके मामा नहीं आए। यानी चचेरे सौतेले मामा 85 की उम्र में इसके लिए गवाही देने पहुंचे।

मरने के बाद पिता को मुखाग्नि तक नहीं दी
गांव वालों ने बताया कि कामेश्वर सिंह की मौत के बाद दयानंद गोसाईं ने पिता का श्राद्ध तक नहीं किया। हालांकि कन्हैया बनकर रह रहे दयानंद गोसाईं ने तब बताया था कि वह उस वक्त जेल में था। इस कारण पिता का श्राद्ध नहीं कर सका। कामेश्वर सिंह के इकलौते पुत्र होने के नाते कन्हैया को उनके निधन पर मुखाग्नि देनी चाहिए थी। परंतु उसने ऐसा नहीं किया। तब भतीजे ने मुखाग्नि दी थी।
लक्ष्मीपुर में दयानंद गोसाईं को पहचानने वाला अब भी है जिंदा
केस के आइओ अनिरुद्ध सिंह थे। जमुई जिले के लक्ष्मीपुर थाना प्रभारी को लेकर वे लखीसराय गए। वर्तमान में बरहट थाना प्रभारी चितरंजन ने जांच की। वहां एक गवाह अब भी जिंदा है। वह अब भी दयानंद गोसाईं को पहचान रहा है। उसने थाने में यह बयान भी दिया है। कोर्ट के सामने थानेदार ने वीडियो भी प्रस्तुत किया है।
Source : Dainik Jagran





