बिहार में विधान परिषद की 24 सीटों के लिए हुए एमएलसी चुनाव में वैशाली से भूषण राय की जीत हुई है. इस जीत को केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस की उपलब्धि के तौर पर आंका जा रहा है. इस नतीजे से यह बात उभरी है कि हाजीपुर में लगभग चार दशक तक अपना राजनीतिक परचम लहराने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने जो कामयाबी हासिल नहीं की थी, वह कामयाबी उनके छोटे भाई केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस ने कर दिखाया है.

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याद दिला दें कि विधान परिषद के पिछले एमएलसी चुनाव में रामविलास पासवान ने वैशाली से एनडीए की तरफ से लोजपा समर्थित प्रत्याशी अजय कुशवाहा को चुनाव मैदान में उतारा था. चुनाव में एनडीए के प्रत्याशी कुशवाहा को राजद समर्थित प्रत्याशी सुबोध कुमार ने परास्त कर दिया था. इस चुनाव में पासवान की कर्मभूमि रहे हाजीपुर में उनके छोटे भाई केंद्रीय मंत्री पशुपति पारस ने लोजपा प्रत्याशी भूषण राय को जीत दिलवाकर चिराग पासवान को अपनी ताकत का एहसास कराया है. वह भी ऐसे समय में जब मतदान के ठीक 1 दिन पहले एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने चिराग के प्रति आभार प्रकट किया था. ऐसी परिस्थिति में लोजपा प्रत्याशी भूषण की जीत काफी मायने रखती है.

वैशाली जिले में स्थानीय निकाय से विधान परिषद के बीते चुनाव में भाजपा से बगावत कर चुनाव मैदान में निर्दलीय उतरे राजेश कुमार सिंह के कारण ही लोजपा प्रत्याशी अजय कुशवाहा को हार का मुंह देखना पड़ा था. बीते चुनाव में राजद समर्थित प्रत्याशी सुबोध कुमार ने 659 मतों के अंतर से लोजपा प्रत्याशी को हराया था. सुबोध कुमार राय को कुल 2146 वोट मिले थे जबकि लोजपा प्रत्याशी अजय कुशवाहा को 1487 मत मिले थे. तब के निर्दलीय राजेश सिंह को 602 वोट मिले थे जबकि 619 मत रद्द घोषित किए गए थे. राजेश सिंह के कारण ही लोजपा प्रत्याशी को हार का मुंह देखना पड़ा था. पिछले चुनाव में गठबंधन में राजद के साथ कांग्रेस थी. लेकिन इस बार चुनाव में कांग्रेस ने यहां से अपने प्रत्याशी मोहम्मद खलीलुल्लाह को चुनावी मैदान में उतारा था. हालांकि कांग्रेस प्रत्याशी कुछ खास नहीं कर पाए. कांग्रेस प्रत्याशी को 19 वोटों पर ही संतोष करना पड़ा. इस बार भी चुनाव में राजेश सिंह ने ताल ठोक रखी थी. लोजपा रामविलास की ओर से उनका चुनाव लड़ना तय माना जा रहा था. आखिरी वक्त में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया. राजेश अगर इस बार भी चुनाव मैदान में उतरते तो जीत होती या नहीं – ये बता पाना मुश्किल है. लेकिन इतना तय था कि उनके चुनाव लड़ने की स्थिति में बीते चुनाव की तरह रालोसपा का खेल बिगड़ जाता. राजेश ने इस बार चुनाव में रालोजप प्रत्याशी भूषण राय की मदद की और उनकी जीत हुई.

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