बिहार में खनन बंद होते ही बालू की कालाबाजारी शुरू हो गयी है। हाल यह है कि बाजार में इसकी कीमत दोगुनी से भी अधिक हो चुकी है। आम लोगों की परेशानी का आलम यह है कि वे बालू के लिए जगह-जगह भटक रहे हैं, लेकिन उन्हें जरूरत के अनुरूप बालू नहीं मिल पा रहा। यदि बालू मिल भी रहा है तो इसके लिए उन्हें दोगुनी से भी अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। बालू माफिया और बिचौलियों की बल्ले-बल्ले है। वे जरूरतमंदों से मनमाना पैसा ले रहे हैं। इसके लिए अघोषित रूप से बाजार में बालू की किल्लत बतायी जा रही है और कमी बताकर लोगों से उसी के अनुरूप कीमतें वसूली जा रही हैं। उधर, विभाग का दावा है कि सभी जिलों में उसके पास बालू का पर्याप्त भंडार है। कहीं कोई दिक्कत नहीं है।

सूबे में हर माह औसतन 4 से 5 करोड़ घनफीट बालू की खपत होती है। इसके आधार पर विभाग ने कम से कम 16 करोड़ घनफीट बालू के स्टॉक की योजना बनायी है। लेकिन, इस स्टॉक के बाद भी सूबे में न तो अवैध खनन पूरी तरह बंद हो पाया है और न ही बालू की कालाबाजारी। बड़ी संख्या में बालू के अवैध कारोबारी सक्रिय हैं। वे खुलेआम बालू का खनन भी कर रहे हैं और लोगों को मनमाने दाम में बेच भी रहे हैं। उधर, हाल यह है कि राजधानी पटना समेत तमाम जिलों में बालू को लेकर लोग बाजार में भटक रहे हैं।

कोर्ट के निर्देश के तहत इस वर्ष पहली जून से ही सूबे में बालू का खनन बंद कर दिया गया है। कोर्ट के आदेश के बाद नए सिरे से बालू घाटों की बंदोबस्ती होनी है। हालांकि एनजीटी (राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण) के प्रावधानों के तहत बिहार में पहली जुलाई से 30 सितंबर तक नदियों में बालू का खनन नहीं होगा। यह अवधि बिहार में मानसून का होता है और नदियों में काफी पानी होने के कारण खनन कार्य बंद किया जाता है। लिहाजा, तीन माह तक बालू खनन पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है। इस दौरान किसी बंदोबस्तधारी के नदी में जाकर बालू निकालने पर पूरी तरह रोक रहती है। ऐसे में जरूरतमंदों को पहले के स्टॉक से ही बालू की आपूर्ति की जाती है।

इस कारण भी संकट: 24 जिलों में होता था खनन, दो वर्ष में घटकर हो गया था 8 जिला
दो साल पहले तक 24 जिलों में बालू खनन हो रहा था। जो बाद में सिमटकर एक तिहाई जिले में रह गया। हाल यह था कि केवल 8 जिलों में ही बालू खनन होता था। हालांकि बाद में संख्या बढ़कर 16 हुई। 2019 में सरकार ने 24 जिलों में बालू की बंदोबस्ती की थी। लेकिन वर्ष 2020-24 के लिए बालूघाटों की बंदोबस्ती को पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई। लिहाजा राज्य सरकार ने वर्ष 2015-19 के बालू बंदोबस्तधारियों को बंदोबस्ती राशि में 50 फीसदी वृद्धि के साथ 2020 के लिए बालूघाटों के संचालन का अधिकार सौंप दिया, लेकिन सरकार के इस निर्णय के बाद मात्र 14 जिलों के बंदोबस्तधारी ही बालूघाटों के संचालन के लिए तैयार हुए। इधर, वर्ष 2021 के लिए 31 मार्च के बाद पहली अप्रैल से फिर से बंदोबस्तधारियों को पुरानी राशि में 50 फीसदी वृद्धि के साथ छह माह के लिए बालूघाटों के संचालन की जिम्मेवारी सौंपी गयी। इनमें छह जिलों के बंदोबस्तधारियों ने बालूघाट संचालन से इनकार कर दिया।

फिर से पूरे सूबे में खनन की तैयारी
राज्य सरकार पूरे प्रदेश में बालू खनन की तैयारी कर रही है। इसके लिए सभी जिलों में बालू घाटों के बंदोबस्ती की योजना बनायी गयी है। सभी जिलों में बालू की उपलब्धता को लेकर विभाग ने सर्वे रिपोर्ट तैयार किया है। इसी को आधार बनाकर पूरे प्रदेश में बालू घाटों की बंदोबस्ती होगी।

100 सीएफटी के लिए 8000 तक वसूल रहे
100 सीएफटी बालू के लिए बिचौलिये 8000 रुपए तक वसूल रहे हैं। जबकि, इसकी औसत कीमत 3500-4000 रुपए हैं। हालांकि अलग-अलग जिलों में बालू की कीमत भी अलग-अलग तय है। इसमें परिवहन की दूरी आदि को ध्यान में रखकर कीमतें तय की जाती हैं।

इन प्रमुख जिलों में है बालू की उपलब्धता
पटना, भोजपुर, सारण, रोहतास, औरंगाबाद, जमुई, बांका, लखीसराय, नवादा, किशनगंज, वैशाली, मधेपुरा, बेतिया, बक्सर, अरवल, गया, भागलपुर, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, नालंदा, जहानाबाद, मोतिहारी, मधुबनी, सीवान, सुपौल, सहरसा, गोपालगंज, पूर्णिया, कैमूर।
खान एवं भूतत्व विभाग के अनुसार उसके पास 16 करोड़ घनफीट बालू का स्टॉक है। जरूरतमंदों को इसी स्टॉक से बालू दिया जा रहा है। पिछले साल भी सरकार ने 15.64 करोड़ सीएफटी बालू का स्टॉक किया गया था। उसने सभी जिलों में बालू वितरण के लिए लाइसेंस भी दिया था।
Source : Hindustan





