बिहार में जमीन खरीदने और बेचने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए सरकार नई व्यवस्था लागू करने जा रही है। प्रस्तावित नियमों के तहत अब जमीन खरीदने वाले लोगों को रजिस्ट्री से पहले ही जमीन से जुड़ी सभी जरूरी जानकारियां ऑनलाइन उपलब्ध कराई जाएंगी। इससे खरीदार पहले से यह जांच सकेंगे कि जमीन सही है या नहीं और विक्रेता द्वारा दी गई जानकारी कितनी प्रमाणिक है। सरकार का मानना है कि इस कदम से जमीन से जुड़े धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े के मामलों पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकेगी।

जानकारी के अनुसार, नई व्यवस्था इसी महीने 15 मई से लागू की जा सकती है। इसके लिए राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने अंचलाधिकारियों (CO) को प्रशिक्षण भी दे दिया है, ताकि नई प्रक्रिया को सुचारु रूप से लागू किया जा सके।
नई व्यवस्था के तहत जमीन की खरीद-बिक्री से पहले आवेदन ऑनलाइन अपलोड करना अनिवार्य होगा। आवेदन के साथ जमीन और विक्रेता से संबंधित 13 तरह की जानकारियां देनी होंगी। इनमें विक्रेता का विवरण, खाता नंबर, खेसरा नंबर, रकबा, जमाबंदी सहित अन्य जरूरी दस्तावेज शामिल रहेंगे।

आवेदन जमा होने के बाद संबंधित अंचलाधिकारी 10 दिनों के भीतर उसकी जांच करेंगे। जांच रिपोर्ट तैयार होने के बाद खरीदार यह तय कर सकेगा कि जिस जमीन का सौदा किया जा रहा है, उसकी जानकारी सही है या नहीं। यदि विक्रेता द्वारा दी गई जानकारी और सरकारी रिकॉर्ड में अंतर पाया जाता है, तो खरीदार समय रहते सतर्क हो सकेगा।
सरकार को उम्मीद है कि इस नई प्रक्रिया से जमीन विवादों में कमी आएगी। बिहार में लंबे समय से ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जहां भूमाफिया या बिचौलिए सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से दूसरों की जमीन बेच देते थे। कई बार खरीदारों को रजिस्ट्री के बाद पता चलता था कि जमीन विवादित है या किसी और के नाम दर्ज है।
नई ऑनलाइन सत्यापन प्रणाली लागू होने के बाद जमीन की वास्तविक स्थिति पहले ही स्पष्ट हो जाएगी। इससे फर्जी दस्तावेजों के आधार पर होने वाली रजिस्ट्री पर भी रोक लगाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

बिहार में जमीन विवाद एक गंभीर समस्या बनी हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में राज्य में दर्ज 2787 हत्या के मामलों में से 424 मामलों की वजह जमीन विवाद रही। इस मामले में बिहार देश में पहले स्थान पर है, जबकि ओडिशा दूसरे और उत्तर प्रदेश तीसरे स्थान पर है।
ऐसे में सरकार की यह पहल कानून-व्यवस्था और सामाजिक विवादों को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हालांकि, इस नई व्यवस्था को लागू करने में कई व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। बिहार में अंतिम व्यापक भूमि सर्वेक्षण वर्ष 1970-71 में हुआ था। अनुमान है कि राज्य के करीब 70 प्रतिशत रैयतों की जमीन अब भी उनके पूर्वजों के नाम पर दर्ज है।

ऐसी स्थिति में अक्सर जमीन बेचने वाला व्यक्ति और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज मालिक अलग-अलग होते हैं। कई मामलों में दादा या पिता के नाम दर्ज जमीन का सौदा उनके बेटे या पोते करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक व्यापक भूमि सर्वेक्षण और रिकॉर्ड अपडेट नहीं होगा, तब तक नई व्यवस्था का पूरा लाभ मिलना मुश्किल हो सकता है।
इसके बावजूद सरकार को भरोसा है कि ऑनलाइन सत्यापन और दस्तावेज जांच की नई प्रक्रिया से जमीन खरीद-बिक्री में पारदर्शिता बढ़ेगी और आम लोगों को राहत मिलेगी।










