मधुबनी: बिहार के मधुबनी जिले के बाबूबरही प्रखंड स्थित ऐतिहासिक बलिराजगढ़ में जारी वैज्ञानिक उत्खनन से लगातार महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य सामने आ रहे हैं। अब तक की खुदाई में प्राचीन ईंटों की दीवारें, आंगन, फर्श, रिंग-वेल (कुआं), उन्नत जल निकासी प्रणाली, सोख्ता गड्ढे, मिट्टी के बर्तन, सिक्के, मुहरें, मिट्टी की मूर्तियां, खिलौने और पत्थर की गेंदें जैसी कई महत्वपूर्ण वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये अवशेष लगभग 3000 वर्ष पुराने विकसित नगर की ओर संकेत करते हैं।

28 मार्च को राज्यसभा सांसद और जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय कुमार झा ने इस उत्खनन कार्य का शुभारंभ किया था। वर्तमान में पुरातत्वविद किले की दीवार और उसके दक्षिणी हिस्से में बनाई गई छह खाइयों में विस्तृत खुदाई कर रहे हैं, जहां लगातार नई संरचनाएं और पुरावशेष मिल रहे हैं।

मधुबनी के जिलाधिकारी आनंद शर्मा ने उत्खनन में मिल रहे अवशेषों को बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत बताया। उन्होंने कहा कि शुरुआती निष्कर्षों से यह स्पष्ट हो रहा है कि यहां प्राचीन काल में एक सुव्यवस्थित और विकसित नगर अस्तित्व में था।

उन्होंने बताया कि इस ऐतिहासिक स्थल की गहराई से वैज्ञानिक जांच के लिए अगले 10 वर्षों तक चरणबद्ध उत्खनन किया जाएगा। इस परियोजना को आगे बढ़ाने में सांसद संजय कुमार झा की पहल महत्वपूर्ण रही है।

सांसद संजय कुमार झा ने सोशल मीडिया के माध्यम से खुदाई में हुई प्रगति की जानकारी साझा करते हुए केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और मधुबनी जिला प्रशासन की सराहना की। उन्होंने बताया कि वर्तमान उत्खनन में सात परतों वाली ईंटों की संरचनाएं, प्राचीन भवनों के अवशेष, जल निकासी व्यवस्था और अन्य स्थापत्य प्रमाण मिले हैं, जो उस समय की उन्नत नगर योजना को दर्शाते हैं।

साथ ही खुदाई से प्राप्त विभिन्न प्रकार के बर्तन, सिक्के, मुहरें, मिट्टी की मूर्तियां और खिलौने इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं।

संजय कुमार झा ने हाल ही में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों से बातचीत कर बलिराजगढ़ परियोजना की प्रगति की समीक्षा की। मंत्रालय की ओर से उन्हें जानकारी दी गई कि इस स्थल पर अगले दस वर्षों तक लगातार वैज्ञानिक उत्खनन कराने की योजना है। इसके अलावा यहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का कार्यालय स्थापित करने और संग्रहालय निर्माण की दिशा में भी कार्रवाई की जा रही है।

इससे पहले सांसद ने नई दिल्ली में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से मुलाकात कर बलिराजगढ़ के संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने को लेकर विस्तृत चर्चा की थी।

संजय कुमार झा का कहना है कि बलिराजगढ़ मिथिला की प्राचीन सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां होने वाला विस्तृत उत्खनन न केवल मिथिला के गौरवशाली इतिहास को नए प्रमाणों के साथ सामने लाएगा, बल्कि भारतीय इतिहास और प्राचीन नगरीय विकास को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

उन्होंने शोधकर्ताओं के लिए आवश्यक आधारभूत सुविधाएं विकसित करने, पुरातात्विक संरचनाओं के तत्काल संरक्षण और बलिराजगढ़ को एएसआई के स्वतंत्र सब-सर्किल के रूप में विकसित करने का भी प्रस्ताव रखा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित योजनाएं समय पर पूरी होती हैं, तो बलिराजगढ़ आने वाले वर्षों में देश के प्रमुख पुरातात्विक और पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकता है। इससे न केवल मिथिला की ऐतिहासिक विरासत को वैश्विक पहचान मिलेगी, बल्कि पर्यटन, शोध और स्थानीय आर्थिक विकास को भी नई गति मिलने की उम्मीद है। अगले दस वर्षों तक चलने वाली खुदाई से इस प्राचीन नगरी के और भी कई महत्वपूर्ण रहस्य सामने आने की संभावना जताई जा रही है।

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