अब पुआल पर मशरूम उगाया जाएगा। इससे कम लागत में ज्यादा मुनाफा हो सकेगा। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के मशरूम वैज्ञानिकों ने यह तकनीक विकसित की है। वैज्ञानिक डॉ. दयाराम का कहना है कि गर्मी के मौसम में पुआल पर कम समय में मशरूम का अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। इसका कारण है कि पुआल की उष्मा अन्य तकनीक से ज्यादा होती। यह गर्मी के मौसम में दूधिया मशरूम की खेती के लिए उपयुक्त है। इससे मशरूम वैज्ञानिक डॉ. दयाराम काफी खुश हैं।  उनका कहना है कि दूसरी तकनीक एवं प्रभेद से 30 से 35 दिनों में मशरूम तैयार होता था, वहीं पुआल पर इसे 15 से 20 दिनों में ही तैयार कर लिया जाएगा।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विवि के मशरूम वैज्ञानिक डॉ. दयाराम के नेतृत्व में काम कर रही टीम ने लॉकडाउन की अवधि में पुआल पर मशरूम उगाने की तकनीक विकसित की है। इस संबंध में वैज्ञानिक डॉ दयाराम का कहना है कि पुआल को खेतों में जलाने से वातावरण दूषित होने के साथ मिट्टी के पोषक तत्वों को नुकसान होता था। वहीं, गर्मी में पारंपरिक तकनीक से दूधिया मशरूम उगाया जाता है। इसके विकल्प के रूप में पुआल पर एक्स्ट्रा पैडी मशरूम विकसित की जा रही है।

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शोध के परिणाम से संतुष्‍ट हैं वैज्ञानिक

डॉ दयाराम ने कहा कि अभी तक के शोध से परिणाम संतोषजनक हैं। इसके उत्पादन के लिए 30 से 38 डिग्री सेल्सियस तापमान और सापेक्ष आर्द्रता 90 परसेंट उपयुक्त देखा गया है। यानी, गर्मी में भी इसका अच्छा उत्पादन हो सकता है। अन्य प्रभेदों के तैयार होने में जहां 30 से 35 दिन लगते थे, वहीं यह मात्र 15 से 20 दिनों में तैयार हो रहा। इस विधि में प्रोटीन की मात्रा समेत अन्य पोषण तत्व भी अन्य प्रभेदों के सामान ही हैं।

घर में किया जा सकता उत्पादन

धान की कटाई के बाद जो पुआल होते हैं, उसे छोटी-छोटी मुट्ठी (अंटिया) बांध लिया जाता है। उन्हें 15 से 20 मिनट तक पानी में फुलाकर गर्म पानी से उपचारित किया जाता है। फिर चौकोर या बोझे की तरह उसे बांधकर नीचे के पुआल वाली मुट्ठी पर मशरूम के बीज को रखा जाता है। इसके बाद परत दर परत पुआल रखकर बीज डाला जाता है। इस तरह छोटे टेबल का आकार बनाकर घर में ही मशरूम उत्पादन किया जा सकता है।

Input : Dainik Jagran

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