बिहार, बिहारीयों और हर सुशांत सिंह राजपूत के चाहने वालों समेत बिहार कि हर राजनीतिक दल के नेताओं कि सारी मांगे अभी एक हीं मांग पर टिकी हुई है वो है कि महाराष्ट्र पुलिस के जाँच के रवैये और नीयत को देखते हुए CBI जाँच कि मांग। आपको बता दें कि CBI केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है इसलिए CBI को स्वायत्त संस्था मान कर निष्पक्ष निबटारे कि आस लिए लोग अन्य बड़े मामलों में भी CBI से ही जाँच कि मांग करतें हैं। हमेशा किसी बड़ी घटना जिसकी जाँच पर लोगों को राज्य पुलिस पर भरोसा नहीं रहता है अथवा पुलिस लंबी जाँच के बावजूद नतीज़े पर नहीं पहुँच पाती है उसे इन जाँच एजेंसियों को सौंपने कि मांग लोगों के द्वारा उठाई जाती है और राज्य सरकारों कि इच्छा और मामले कि गंभीरता और बेहतर निष्पक्ष जांच के लिए राज्य सरकार कि अनुशंसा अथवा सिर्ष कोर्ट के आदेश पर केस CBI जैसी जाँच एजेंसियों को सौंप दी जाती है। पुर्व में भी कई चर्चित लंबित मामलों में जाँच के लिए केस CBI को सौंपी जाती रही है। लगभग 50 दिनों के बाद भी न्याय नहीं मिलता देख लोगों ने केस CBI को सौंपने की मांग तेज कर दी है।

राजनीतिक पार्टियाँ भी राजनीतिक रोटी सेंकने के फिराक में तो नहीं?
जिस तरह चुनावी साल में बिहार के हर एक राजनीतिक दल ने एक स्वर में सिर्फ CBI जाँच के लिए ही आवाज़ उठाना शुरू किया है वो भी हैरतंगेज है क्योंकि कभी गोपालगंज में हुए राजद कार्यकर्ता कि हत्या पर तेजस्वी यादव के CBI जाँच कि मांग के लिए धरना देने पर भी नहीं सुनने वाले नितीश कुमार के स्वर सुशांत सिंह राजपूत कि मृत्यु के CBI जाँच कि मांग पर तेजस्वी से एक हुआ जा रहा है। तो CBI जाँच के सहारे लालु यादव को चारा घोटाले में जेल पहुँचाने वाले बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और उसी जाँच पर सवाल उठा कर लालू प्रसाद यादव के साथ हुए अन्याय कि दुहाई देने वाले तेजस्वी यादव के सुर एक हुए जा रहें हैं।

जो बात गौर करने वाली है वह यह है कि महाराष्ट्र में “महाविकास अगाड़ी” कि सरकार है जिसमें शिवसेना,एनसीपी समेत कांग्रेस भी मुख्य घटक दल है और बिहार में राजद और रालोसपा कांग्रेस समेत “महागठबंधन” का हिस्सा है ऐसे में बिहार के चुनावी साल में यहाँ से जाँच के लिए आवाज उठाने वाले लोग महागठबंधन का हिस्सा होते हुए भी महाराष्ट्र में अपने साथ वाले दल कि ही सरकार के रहते हुए भी पता नहीं क्यों ये दल कांग्रेस पर दवाब बना के CBI जाँच कि अनुशंसा महाराष्ट्र सरकार से करवा पा रहें हैं।

क्या CBI को केस सौंप मात्र देने से न्याय मिल जाता है?
जेसिका लाल जैसे चर्चित मर्डर केस हो या अपने मुजफ्फरपुर के चर्चित और अभी तक अभेद नवरुना चक्रवर्ती के रहस्मय तरिके से घर से ग़ायब हो जाने का केस CBI हमेशा सफल नहीं भी होती है। जिस तत्परता से बिहार पुलिस मुंबई जा के तेजी से सुशांत सिंह राजपूत केस पर काम करके सुर्खियां बटोर रही है काश उसका आधा मात्र भी दिखा दिया होता 2012 में तो केस पहले CIDऔर फ़िर CBI के हवाले नहीं सौंपना पड़ता,आगे चल कर केस के बारे में सूचना देने वाले को 10 लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया गया। शहर के ही कुछ चर्चित लोगों को शक के आधार पर गिरफ्तार भी किया गया पर सब साक्ष्य के अभाव में जमानत पर छूट गए। पिछले साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने 10 मार्च 2020 तक जांच पूरा करके रिपोर्ट कोर्ट में जमा करने का आदेश दिया था,लेकिन CBI को जाँच सौंप देने मात्र से या प्राथमिकी दर्ज करा देने से तो न्याय नहीं मिलता है न,हुआ भी यही दसवीं बार CBI को सुप्रीम कोर्ट से छः महीने के लिए एक्सटेंशन दिया गया। 2012 से 2020 के बिच बीते आठ सावन के बाद भी अगर CBI जाँच से भी न्याय नहीं मिल पाता है तो लोगों का भरोसा जाँच एजेंसियों पर कम ही माना जाए,लेकिन उठ रहे शोर के साथ शोर मचाने में सब ऐसे मशगूल हुए कि इस बात पर ध्यान देना भूल गए हैं।

ऐसे में नवरुना के गायब हो जाने कि घटना पर CBI कि सुप्रीम कोर्ट को दि जाने वाली रिपोर्ट में देरी और शहर में हुए कई बड़े-बड़े हत्याकांड जैसे पुर्व मेयर समीर कुमार हत्याकांड के आरोपियों की पहचान और जाँच के लिए केस CBI को सौंपे जाने का इंतजार मुजफ्फरपुर ज़िला वर्षों बाद आज भी कर रहा है, इसी बीच बिहार के ही लाल सुशांत सिंह राजपूत कि मौत के मामले में न्याय कि आस को जाँच के लिए CBI को सौंप देने मात्र से न्याय मिल जाएगा इस खोखले राजनीतिक दावे और लोगों कि आस का क्या होता है ये आगे आने वाले समय में देखा जाएगा।





