राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री रामसूरत राय ने अफसरों को कहा है कि वे उगाही के फेर में पड़कर जमीन के मुआवजा भुगतान में देरी न करें। जनवरी तक बकाए मुआवजे का भुगतान करें। विशेष कैंप लगाएं। उसमें सभी स्तर के जन प्रतिनिधियों को भी बुलाएं। वे गुरुवार (24 दिसंबर) को जिला भू अर्जन पदाधिकारियों की बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे समेत बड़ी परियोजनाओं के लिए अर्जित जमीन के मुआवजे का भुगतान समय पर हो जाता है। गांव, अंचल या जिला स्तर की जरूरतों के लिए अधिग्रहीत जमीन का मुआवजा मिलने में परेशानी होती है। इसमें उगाही की कोशिश होती है।

रिश्‍वतखोरी के लिए मांगा जाता है सबूत

राय ने कहा कि बांध, सड़क या रेल के लिए जमीन अधिग्रहण के पहले चरण में रैयतों को  80 प्रतिशत मुआवजे का भुगतान हो जाता है। बाकी 20 प्रतिशत के लिए ऐसे सबूत मांगे जाते है, जिनका अस्तित्व ही नहीं होता। रिश्वतखोरी के लिए नदी की धार में समा गए मकानों का सबूत मांगा जाता है। अधियाची विभाग ने पैसा दे दिया है। भू-अर्जन कार्यालय के पास पैसा है। भू-धारी को मुआवजा नहीं मिल रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मंत्री ने कहा कि वे जनवरी के पहले सप्ताह से विभाग की प्रमंडलवार समीक्षा करेंगे। साथ में अपर मुख्य सचिव विवेक कुमार सिंह भी रहेंगे।

महत्‍वपूर्ण प्रोजेक्‍ट में देरी का कारण पूछा

मंत्री ने बागमती परियोजना, मुजफ्फरपुर-सीतामढ़ी रेल लाईन, राष्ट्रीय राजमार्ग-77 समेत राज्य की कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लंबित होने का कारण पूछा। बताया गया कि ज्यादा मामले इसलिए लंबित हैं, क्योंकि रैयतों को मुआवजे की राशि मंजूर नहीं है। कई मामले न्यायालय में विचाराधीन है। अपर मुख्य सचिव विवेक कुमार सिंह ने कहा कि लोगों से सीधी बातचीत करके समस्याओं का हल निकाला गया है। जब लोगों को लग जाता है कि सरकार की भी सीमा है, और इससे अधिक मुआवजा नहीं मिल सकता है तो अक्सर वे मान जाते है।

अधिकारियों ने कहीं ये बात

-रोहतास के जिला भू-अर्जन पदाधिकारी ने कहा कि भू-अर्जन कार्यालय एवं अधियाची विभाग के बीच बेहतर समन्वय का अभाव है। इसके चलते एक दूसरे की जरूरतों का पता नहीं चलता है। इससे भी परियोजना पूरी होने में  देरी होती है।

-सिवान के भू-अर्जन पदाधिकारी संजीव कुमार सिंह ने कहा कि अधियाची विभाग द्वारा सीएस मैप एवं सीएस खतियान के आधार पर अलाइनमेंट बनाया जाता है। सीएस खतियान में जमीन की प्रकृति कृषि दर्ज है। वास्तविकता में उस जमीन का व्यावसायिक या आवासीय उपयोग हो रहा होता है। नए सिरे से जमीन की प्रकृति का निर्धारण और उसके हिसाब से एमवीआर को अपडेट करने की जरूरत है। सालों से एमवीआर को अपडेट नहीं किया गया है।

Source : Dainik Jagran

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