मुजफ्फरपुर : वसन्त पंचमी का दिन मां सरस्वती को समर्पित है, माता सरस्वती को ज्ञान, संगीत, कला, विज्ञान और शिल्प-कला की देवी माना गया है। आज के इस दिन को श्री पंचमी भी कहा जाता है। ज़िले में जगह-जगह हर नुक्कड़,चौक-चौराहे पर विधार्थियों की टोली मिलकर पूजा पंडाल स्थापित किए दिख जाएंगे। विधार्थियों का समूह में युवाओं की संख्या ही सर्वाधिक होती है ऐसे में जोश उत्साह चरम पर होता है। लाईट और साज सज्जा के बीच डीजे भी बजाने का चलन पिछले 5-10 वर्षों में अधिक हुआ है। जैसे-जैसे डिजिटल क्रांति ने कोने कोने में अपनी पहुँच बनाई है वैसे-वैसे गीतों में शोर अश्लीलता बढती गयी है। लगभग हर पूजा पंडाल में प्रतिवर्ष अश्लील गानों के बजने का प्रचलन बढ़ता ही रहा है। यहाँ बड़ों की यह सामाजिक जिम्मेदारी है की जहाँ भी ऐसा हो रहा दिखे वहाँ टोके और रोकें।

अभिभावकों और समाज की क्या है जिम्मेदारी?

जैसे दिवाली में बच्चों को अपनी निगरानी में ही पटाखे जलाने दिया जाता है वैसे ही अभिभावकों को ये तय करना होगा की ध्वनि प्रदूषण और अश्लील गीतों के बीच अपने परिवार के सदस्यों को ज्ञान की देवी की उपासना करते देखेंगे या उन्हें टोकेंगें रोकेंगें। समाज़ के बीच हो रहे इस पर्व में जरुरी नहीं है की सिर्फ पारिवारिक सदस्यों की ही ये जिम्मेदारी है हर जागृत नागरिक की ये जिम्मेदारी है की अश्लील गानों के चलन पर रोक लगाने के लिए आगे आ कर अपने आस परोस के उत्साहित समूहों को समझाए।

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पिछले वर्षों में ये अश्लील गीतों का पूजा के दौरान बजाने का प्रचलन आम होता जा रहा है क्योंकि हम रोकते टोकते नहीं हैं, उत्साहित बाल समूहों को त्योहार के मनोरंजन के बीच कहाँ ख्याल रहता है की जीन गीतों पर वो मनोरंजन कर रहें हैं वो धीरे धीरे चलन में आ जाता है और साल दर साल यही चलन प्रचलित हो कर पूजा का हिस्सा मान लीया जाता है जहाँ बगैर डीजे बाक्स के पूजा करने के सरकारी आदेशों को धार्मिक आज़ादी तक से ज़ोर दिया जाता है। आइए आगे बढ़ते हुए अश्लील गानों से शोर मचा श्रीपंचमी के इस पावन त्योहार को उचित प्रतिबंध लगाने की जिम्मेदारी निभाते हुए टोके, रोके और समझा कर अपने अपने समाज़ में व्यवहारिक परिवर्तन लाएं और माँ शारदा से सबकी सुबुद्धि की कामना करें।

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