इस ‘शिक्षा एक्सप्रेस’ में सजती पाठशाला, ‘मंजिल’ की ओर बढ़े जा रहे विद्यार्थी

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शिक्षा एक्सप्रेस ट्रेन’ के दरवाजे नियत समय से खुलते हैं, मगर इसमें यात्री की जगह स्कूल ड्रेस में प्रवेश करते बच्चे। सबके कंधे पर बैग, जिसमें किताबें हैं। एकबारगी समझना मुश्किल है कि इतने बच्चे ट्रेन से कहां जा रहे हैं। चंद सेकेंड में ही तंद्रा भंग होती है और पता चलता कि यह ट्रेन नहीं, बल्कि उसकी शक्ल का विद्यालय है। आठ वर्ग कक्ष ट्रेन की शक्ल में, दरवाजे, खिड़कियां और रंग भी।

हम बात कर रहे हैं समस्तीपुर के मोहिउद्दीनगर प्रखंड स्थित राजकीय मध्य विद्यालय नंदनी की। शिक्षा की इस ट्रेन को बनाने के पीछे तर्क है कि छात्र ट्रेन की तरह ही मंजिल की ओर तेजी से बढ़ते रहें।

दिल्ली में एक विद्यालय को देख मिली प्रेरणा

सरकारी स्कूलों में जिले में अव्वल स्थान रखने वाले इस स्कूल की गतिविधियां हमेशा से लोगों को आकर्षित करती हैं। यहां सभी वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं। बच्चों का स्कूल के प्रति लगाव बढ़े। यहां आने पर आनंद की अनुभूति हो, इसे लेकर अक्सर प्रयास किए जाते रहे हैं।

विद्यालय में इस बदलाव का श्रेय प्रधानाध्यापक रामप्रवेश ठाकुर को जाता है। उनका कहना है कि बोगीनुमा दीवार सजाने की प्रेरणा उन्हें दिल्ली के एक विद्यालय से मिली। अपने निजी कार्य से 2012 में वहां गए थे तो इसी तरह का एक स्कूल देखा। तब से मन में यह विचार चल रहा था।

रामप्रवेश ठाकुर की वर्ष 2014 में इस स्कूल में तैनाती हुई। पहले यहां की शैक्षणिक सहित अन्य कमियां दूर कीं। इसके बाद इस साल विद्यालय को भी उसी तरह ढालने की ठानी। डिजाइन प्रकाश आर्ट बलथारा ने बनाया। फिर कई पेंटरों से पूछा। अंत में बसंत मांझी तैयार हुए। पूरी जनवरी की शीतलहर में जब तक विद्यालय बंद रहा, पेंटिंग कराई। इसपर सरकार से प्राप्त 10 हजार रुपये खर्च हुए। वैसे तो विद्यालय में 27 कमरे हैं, लेकिन आठ को बोगी की शक्ल में ढाला गया है।

पढ़ाई और अनुशासन अनुकरणीय

शिक्षा की इस अद्भुत प्रयोगशाला में पढ़ाई और अनुशासन अनुकरणीय है। कक्षा एक से आठ तक के इस स्कूल में 400 छात्र और 350 छात्राएं हैं। सभी छात्र और शिक्षक नौ बजे से पहले आ जाते हैं। प्रार्थना के बाद साढ़े नौ बजे मुख्य द्वार बंद हो जाता है। स्कूल में प्रयोगशाला और कैंटीन भी है।

सभी छात्र-छात्राएं ड्रेस में शांति के साथ शिक्षा एक्सप्रेस ट्रेन की क्लास में पढ़ते दिखते हैं। एक खास बात यह भी कि विद्यालय में प्रवेश करते ही हरियाली से सामना होता है।

महापुरुषों के नाम पर वर्ग कक्ष

यहां वर्ग कक्ष के नाम भी अलग-अलग महापुरुषों के नाम पर हैं। कोई महात्मा गांधी के नाम पर तो कोई जवाहर लाल नेहरू या लोहिया के नाम पर। इससे छात्रों को इन महापुरुषों के बारे में जानने और उनसे प्रेरणा लेने में मदद मिलती है।

तीन बार पुरस्कृत हो चुके प्रधानाध्यापक

यहां के प्रधानाध्यापक तीन बार पुरस्कृत हो चुके हैं। 2015-16 में जिला शिक्षा विभाग की ओर से एवं 2017 में सूबे के शिक्षा मंत्री से। मध्याह्न भोजन के बेहतर संचालन के लिए भी उन्हें पुरस्कृत किया जा चुका है।

Input : Dainik Jagran


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