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प्रत्यक्ष देवता की अनूठी अराधना का पर्व है छठ व्रत, जानें अनूठी परंपरा के बारे में कुछ खास बातें

Dr. Shekhar Shankar Mishra

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सम्पूर्ण जगत के प्रत्यक्ष और जाग्रत देवता भगवान् भास्कर की अभ्यर्थना–उपासना का चतुर्दिवसीय अनुष्ठान, हमारी कृषि संस्कृति का महत्त्वपूर्ण लोकपर्व ‘छठ’ केवल सनातन धर्मी श्रद्धालुओं का पारंपरिक पर्व ही नहीं, बल्कि यह अकेला ऐसा पर्व है, जिसने लोक और शास्त्र की विभाजक सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए समाज में साम्प्रदायिकता की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दीवार को भी तोड़ा है, इसका मुख्य कारण प्रकृति और पर्यावरण से इसकी गहरी सम्बद्धता है. सम्पूर्ण ऋतुचक्र सूर्य की गति से ही नियंत्रित होता है, इस कारण समस्त प्राणिजगत के साथ सूर्य का प्राकृतिक तथा पर्यावरणिक सम्बन्ध है. सभी प्राणियों में सूर्य अंश रूप में विद्यमान हैं. ज्योतिष-शास्त्र कहता है कि सूर्य से ही व्यक्ति में तेज, बल, पराक्रम, मेधा और ऊर्जा का संचार होता है. सूर्य के निर्बल या वक्री होने की स्थिति में ये गुण क्षीण हो जाते हैं और उनकी विधिवत अभ्यर्थना- उपासना से इन गुणों को सबलता प्राप्त होती है. स्पष्ट है कि सूर्य हमारी सनातनधर्मी परंपरा में एक प्रत्यक्ष देवता के रूप सदा से पूज्य रहे हैं साथ ही कृषि और पर्यावरण से जुड़े सूर्य के प्रत्यक्ष सम्बन्ध लोक-जीवन से उन्हें जोड़े रखने में भी सहायक हुए हैं. नयी फसल के नवान्न और खाद्य-पौधों के साथ सम्पूर्ण प्रकृति और पर्यावरण के नियंता की अभ्यर्थना, वह भी अस्ताचलगामी स्वरूप को पहला अर्घ्य इसलिए कि हम पूरी नियम-निष्ठा से रात भर उनकी प्रतीक्षा करते हुए कल के भोर में उनका स्वागत कर सकें.

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मनुष्य समेत सभी प्राणियों में अपनी कोटि-कोटि किरणों से ऊर्जा का संचार करनेवाले, सम्पूर्ण प्रकृति की गति और लय के नियामक भगवान भास्कर के असीमित दाय के प्रति आस्था और कृतज्ञता प्रकट करने के उद्देश्य से समायोजित यह चार दिवसीय पवित्र अनुष्ठान एक साथ सामान्य जन और बुद्धिजीवी दोनों के लिए अपार आस्था का केंद्र है. अपने लौकिक स्वरूप में छठ तिथि मातृका की उपासना है तो शास्त्रीय स्वरूप में प्रकृति और पर्यावरण के सूत्रधार सूर्य के दाय के कृतज्ञ- स्मरण का अनुष्ठान भी. भारतीय संस्कृति में विभिन्न ऋतुओं में अलग-अलग पर्व-त्योहार के आयोजन होते हैं, सबके पौराणिक धार्मिक आधार भी हैं मगर छठ का स्वरूप भिन्न है, इसमें पौरोहित्य परम्परा का अतिक्रमण कर धार्मिक अनुष्ठान को सर्वजन सुलभ बनाने का एक सुनियोजित उपक्रम दिखाई देता है.

परम्परा विभंजन का यह अप्रत्यक्ष दर्शन भी इसे अन्य पर्वों की तुलना में महत्वपूर्ण बनाता है छठ पर्व के लौकिक, शास्त्रीय, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व- निरूपण के क्रम में अनेक बिंदु उजागर हो सकते हैं किन्तु इस पूरे पर्व पर केवल प्रकृति और सूर्य की केन्द्रीयता में विचार करें तो भी इस पर्व के लगातार बढ़ते प्रसार और बदलते समय में भी इसके अक्षुण्ण महत्त्व का पता चल सकता है. यह अकेला पर्व है, जिससे समाज का हरेक वर्ग ही नहीं बल्कि परंपरा को सिरे से नकारनेवाली नयी पीढ़ी भी संवेदनात्मक जुड़ाव महसूस करती है. अपने माता-पिता और दूरदराज बसनेवाले अन्य सदस्यों से वर्ष भर में कम-से-कम एक बार मिलने का एक अच्छा अवसर है यह पर्व. कुछ लोग इसे संतान की कामना से जुड़ा पर्व मानते हैं मगर उस मामले में भी एकदम अनूठा है, इस अवसर पर गाये जाने वाले लोकगीतों में बेटों का महत्त्व है तो ‘रूनकी-झुनकी बेटी’ का भी. मूलतः सूर्योपासना के इस अनुष्ठान से छठी मइया का क्या सम्बन्ध है? यह जिज्ञासा स्वाभाविक है. इस व्रत का एक नाम प्रतिहार षष्ठी भी है. यह अनुष्ठान षष्ठी तिथि को पड़ता है. इसी ‘षष्ठी’ शब्द का लोकभाषा रूपांतर ‘छठी’ है, इस चार दिवसीय अत्यन्त पवित्र और कठिन अनुष्ठान में शुचिता की संरक्षिका और अभिभाविका के रूप में तिथिमातृका छठीमइया हमें सचेत और आश्वस्त करने के उपस्थित रहती हैं.

– डॉ. शेखर शंकर मिश्र

 

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पटना हाईकोर्ट ने कहा- तिरुपति, काशी विश्वनाथ व वैष्णो देवी मंदिर जैसा हो गया के विष्णुपद मंदिर का प्रबंधन, बने कानून

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टना. गया के प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर (Vishnupad Temple) के मामले पर सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट (Patna High Cour) ने राज्य सरकार को सभी संबंधित पक्षों के साथ मिल कर बैठक करने का निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा कि जिस तरह से तिरुपति (Tirupati) काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी (Kashi Vishwanath Temple) और वैष्णो देवी मंदिर (Vaishno Devi Temple) का प्रबंधन के लिए कानून बनाया गया, उसी तरह विष्णुपद मंदिर के प्रबंधन के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू हो. कोर्ट ने यह भी कहा कि पुजारियों को पूजा कराने व दक्षिणा लेने के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं किया जाए. गौरव कुमार सिंह की जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए उक्त टिप्पणी की है.

गौरतलब है कि बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड व मंदिर प्रबंधन समिति के बीच विवाद के मामले में गया कोर्ट में अपील पर सुनवाई लंबित है. याचिकाकर्ता के वकील सुमित सिंह ने कोर्ट को बताया कि यह मंदिर सदियों पुराना है, जो आमलोगों के आस्था का केंद्र है. मंदिर के पंडों के हितों का ख्याल रखा जाएगा, लेकिन इस मंदिर से आमलोगों की आस्था जुड़ी हुई है.

इस जनहित याचिका में मांग की गई थी कि राज्य सरकार इस मंदिर को अपने नियंत्रण में लेकर इसका प्रबंधन के लिए बोर्ड का गठन करे ताकि माता वैष्णो देवी या बाला जी मंदिर के प्रबंधन बोर्ड जैसा यहां भी प्रबंध हो. याचिका में यह भी कहा गया है कि विष्णुपद मंदिर की संपत्ति को सार्वजनिक संपत्ति घोषित किया जाये, क्योंकि ये निजी संपत्ति नहीं है. इस मामले पर अगली सुनवाई 15 दिसंबर को होगी.

Source : News18

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बिहार: नहीं थम रहा कोरोना से मौत का सिलसिला, पटना में सबसे अधिक गई जानें

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बिहार में तेजी से बढ़ रहे कोरोना संक्रमण की वजह से एक बार फिर से लोगों में दहशत बढ़ गयी है तो वहीं, सरकार की चुनौतियां भी बढ़ती जा रही हैं. एक तरफ जहां कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है, वहीं राज्य में मौत के आंकड़ों में भी वृद्धि देखी जा रही है. पिछले 8 माह में बिहार में कोरोना से 1248 लोगों की जान चली गई है जिनमें सबसे अधिक मौत पटना जिले में हुई है.

पटना जिले में अबतक 320 लोगों की मौत हो चुकी है जिसमें छोटे बच्चे से लेकर युवा और बुजुर्ग तक शामिल हैं. वहीं भागलपुर मौत के मामले में दूसरे स्थान पर है जहां अबतक 73 लोगों की कोरोना से जान चली गयी है. जबकि नालन्दा में भी 55 लोग काल के गाल में समा गए हैं. वहीं गया में भी अबतक 50 मौतें हो चुकी है. वहीं, मुंगेर में 48, मुजफ्फरपुर में 45, पूर्वी चंपारण में 47 जबकि सारण में अबतक 48 मौतें हो चुकी है.

हैरानी की बात तो ये है कि राज्य में रिकवरी रेट पिछले 2 माह से 90 प्रतिशत से ज्यादा है यानि वर्तमान में भी रिकवरी रेट 97.09 प्रतिशत है बावजूद रोजाना 6 से 7 मरीजों की मौतें हो रही है. राज्य में अब तक कुल पॉजिटिव मरीजों की बात करें तो कुल 233840 मरीज कोरोना पॉजिटिव हुए हैं जिसमें वर्तमान में 5545 केसेज अब भी एक्टिव हैं. जबकि राज्य में कुल 14275274 सैंपल्स की अबतक जांच हो चुकी है और प्रतिदिन जांच की क्षमता बढ़ती ही जा रही है.

वर्तमान में रोजाना जांच की क्षमता बढ़कर 1 लाख 31 हजार के पार कर गयी है. स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य है कि प्रतिदिन अब डेढ़ लाख सैम्पल्स की जांच हो. अबतक राज्य में कुल कोरोना मरीजों में 227046 मरीज स्वस्थ हो चुके हैं, लेकिन रोजाना 600 से 700 मरीजों में अब भी पॉजिटिव की पुष्टि हो रही है.

स्वास्थ्य विभाग ने अब आरटीपीसीआर से और ट्रू नेट मशीनों से भी जांच की क्षमता बढ़ाने का फैसला लिया है, वहीं सभी सिविल सर्जन को निर्देश दिया गया है कि पॉजिटिव पाए गए मरीजों की तत्काल कांटेक्ट ट्रेसिंग की जाए ताकि तेजी से मरीजों का पता चल सके.

Source : News18

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तेजस्वी यादव के लिए ‘छि: छि:’ कह CM नीतीश के साथ आए उपेंद्र कुशवाहा, कही बड़ी बात

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7वीं बिहार विधानसभा (Bihar Legislative Assembly) में पहले सत्र के अंतिम दिन नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव (Tejaswi Yadav) की सीएम नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) व एनडीए के विधायकों पर की गई अमर्यादित टिप्पणियों के बाद से ही बिहार का राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है. तेजस्वी यादव ने कहा था कि 1991 में सीएम नीतीश पर हत्या का मुकदमा चला जिसे बिना किसी पूछताछ के रफा-दफा कर दिया गया. कंटेंट चोरी के मामले में मुख्यमंत्री रहते थे 25000 का जुर्माना भरना पड़ा. तेजस्वी सृजन घोटाले की भी चर्चा की और एनडीए के विधायकों की ओर इशारा करते हुए कहा था कि यह डरे हुए चोर और बेईमान लोग हैं. उस समय सदन में सीएम नीतीश कुमार भी मौजूद थे. तेजस्वी ने सीएम नीतीश की संतान को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि उन्होंने दूसरा बच्चा इसलिए पैदा नहीं किया क्योंकि उन्हें बेटी होने का डर था.

तेजस्वी की एक के बाद एक निजी टिप्पणियों से आहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आक्रोशित हो उठे और पहली बार सदन में उन्हें काफी तल्ख अंदाज में देखा गया .सीएम नीतीश ने अपने ऊपर की गई टिप्पणी पर ऐतराज भी जताते हुए कहा आप सभी मुझे इतना दिनों से जानते हैं. किसी के बारे में इस तरह असत्य बात कही जाए यहअशोभनीय है. सदन की एक मर्यादा है. अब इस मामले में सीएम नीतीश को पूर्व केंद्रीय मंत्री व राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा का भी साथ मिला है. कुशवाहा ने इसके लिए ट्वीट किया और तेजस्वी यादव के आचरण को अमर्यादित करार दिया.

उपेंद्र कुशवाहा ने अपने ट्वीट में लिखा, माननीय तेजस्वी यादव ने आज सदन में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के प्रति जिस तरह की अभद्र भाषा का प्रयोग किया, वह घोर निंदनीय है. छि: छि: ! क्या इसी राड़ी-बेटखउकी के लिए सदन है?

इसी मसले पर जदयू एमएलसी नीरज कुमार ने भी तेजस्वी पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा, भाषाई विकृति राजनीति के संक्रमण काल में एक बड़ी चुनौती. भाषाई रूप में हर राजनीतिज्ञ को समृद्ध होना चाहिए. ऐसे लोग ईर्ष्या और विद्वेष की बुनियाद पर राजनीतिक एजेंडा तैयार करते हैं. ऐसी टिप्पणी से राजनीतिक जीवन की शुचिता प्रभावित होती है.

भाजपा सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव ने भी तेजश्वी यादव को अपने निशाने पर लेते हुए कहा कि सदन में निजी हमला राजनीति के गिरते स्तर का परिचायक है. राजनीति के इस गिरते रूप की मैं निंदा करता हूं. आखिर हम ऐसा आचरण दिखा कर आनेवाली पीढ़ी को क्या सीख दे पाएंगे?

वहीं, राजद नेता शिवानन्द तिवारी ने तेजस्वी का बचाव करते हुए नीतीश कुमार पर तंज कसा है. उन्होंने कहा, सदन में सीएम नीतीश का व्यवहार सदमे की बात है क्योंकि नीतीश कुमार भाषा और व्यवहार के मामले में शालीनता के प्रतीक है. लेकिन कल विधसनसभा में जो किया व्यवहार वह पहली बार दिखा. नीतीश कुमार राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुके हैं. इसलिए चुनाव के समय तेजश्वी पर निजी हमला किया था.

वहीं तेजस्वी यादव के बयान पर कांग्रेस नेता प्रेमचंद मिश्रा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सत्ता पक्ष के लोग सदन में लालू परिवार को टारगेट कर रहे थे. इसलिए हर क्रिया की विपरीत प्रतिक्रिया होती है और वही हुआ. लेकिन, राजनीति में इस तरह की परंपरा दुर्भाग्यपूर्ण है.

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