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बुद्ध जयंती : हर मनुष्य को जानना चाहिए भगवान गौतम बुद्ध के बताए हुए 4 आर्यसत्य

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वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन ही भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण भी मनाया जाता है। भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण ये तीनों एक ही दिन अर्थात वैशाख पूर्णिमा पर हुए थे। इस बार बुद्ध पूर्णिमा 18 मई को है। बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के साथ ही हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिए भी बुद्ध पूर्णिमा बेहद महत्व रखता है। कुछ ग्रंथों के अनुसार भगवान बुद्ध नारायण के अवतार हैं। उन्होंने लगभग 2500 साल पहले धरती पर लोगों को अहिंसा और दया का ज्ञान दिया था।

Credit : Navin Vatsa Photography

  • भगवान बुद्ध द्वारा बताए गए 4 आर्यसत्य

1. दुख : संसार में दुःख है,

2. समुदय: दुःख के कारण हैं,

3. निरोध: दुःख के निवारण हैं,

4. मार्ग: निवारण के लिए मार्ग हैं।

Credit : Navin Vatsa Photography

बुद्ध ने बताया कि सुख प्राप्ति से पहले हर इंसान को ये बातें जान लेनी चाहिए

1. दुख है

  • महात्मा बुद्ध ने जो प्राणी जगत को पहला आर्य सत्य का ज्ञान दिया वह है ‘संसार में दुःख है’। महात्मा बुद्ध ने अपने पहले आर्य सत्य में यह बताया कि इस संसार में कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जिसे दुःख ना हो। इसलिए दुःख में भी सदैव प्रसन्न रहना चाहिए।

2. दुख का कारण इच्छा है

  • महात्मा बुद्ध ने दूसरा आर्य सत्य बताया कि दुःख का प्रमुख कारण तृष्णा (तीव्र ईच्छा ) है। इसलिए किसी भी चीज के प्रति अत्यधिक तृष्णा नहीं रखना चाहिए। ऐसा करने से दुख से बचा जा सकता है।

3. हर दुख का निवारण है

  • महात्मा बुद्ध ने तीसरा आर्य सत्य उपदेश ये बताया कि इस संसार में जितने भी दुःख हैं उनका निवारण है। ऐसा कोई दुख नहीं जिसका कोई हल नहीं हो।

4.दुख निवारण के उपाय भी है

  • महात्मा बुद्ध ने चौथा आर्य सत्य बताया कि दुखों के निवारण के उपाय भी मौजूद है। दुःख की समाप्ति के लिए मनुष्य को सदमार्ग (अष्टांगिक मार्ग) से परिचित होना चाहिए।

Input : Dainik Bhaskar

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अबु धाबी में है दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद, एकसाथ 40 हजार लोग पढ़ सकते हैं नमाज

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संयुक्त अरब अमीरात की सबसे बड़ी और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद शेख जायद ग्रैंड मस्जिद विश्वभर के मुस्लिमों के लिए विशेष स्थान रखती है। सऊदी अरब की मक्का और मदीना की मस्जिदों के बाद इसका स्थान आता है। अबु धाबी की शेख जाएद मस्जिद में 40000 लोग एक साथ नमाज अदा कर सकते हैं। सफेद रंग की यह शानदार मस्जिद कारीगरी का बेजोड़ नमूना है, जो दुनिया में सबसे सुंदर भी मानी जाती है।

  • दूर से ही चमकती है मस्जिद

इस मस्जिद के निर्माण का कार्य संयुक्त अरब अमीरात के पूर्व शासक शेख जायद बिन सुल्तान अल नाहयान ने वर्ष 1996 में शुरू किया था। इस मस्जिद को बनाने के पीछे दुनिया भर में फैली इस्लामिक मान्यताओं और रीति -रिवाजों को एक स्थान पर लाना था, जहां इस्लाम की विविधता में एकता को दर्शाया जा सके। इसको बनाने में मुख्य रूप से मकराना (राजस्थान) के मार्बल का उपयोग किया गया है। जो अपनी चमक के चलते मस्जिद को दूर से ही भव्य आभा देता है। मार्बल के अलावा मस्जिद को बनाने में अर्द्ध कीमती पत्थरों, क्रिस्टल आदि का प्रयोग किया गया है।

  • अंदर की गई गोल्ड कोटिंग

मस्जिद के अंदर भव्य नक्काशी और गोल्ड कोटिंग की गई है। सफेद रंग की इस भव्य मस्जिद के मुख्य गुंबद की ऊंचाई 75 मीटर और लंबाई 32.2 मीटर है। मस्जिद के मुख्य हॉल का कालीन हाथ का बुना दुनिया का सबसे बड़ा कालीन है। लगभग 6000 वर्गफीट के क्षेत्रफल वाला यह कालीन विशेष रूप से ईरान से मंगवाया गया है। इस कालीन को 1200 से अधिक ईरानी महिलाओं ने 2 साल तक दिन रात की मेहनत कर के बुना है।

  • सुंदर कैलीग्राफी

इस मस्जिद का निर्माण 12 वर्षों में पूरा हुआ। मस्जिद बनाने के लिए मोरक्को, तुर्की, भारत, मलेशिया, चीन, ईरान, ब्रिटेन, और ग्रीस से कारीगर बुलाए गए थे। मस्जिद की दीवारों तथा खंभों पर कैलीग्राफी की गई है। साथ ही अल्लाह के 99 पवित्र नाम भी बेहद खूबसूरती से लिखे गए हैं। मस्जिद के सेंट्रल हॉल में लगभग 9 टन वजनी झूमर भी टांगा गया है।

 

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शक्ति साधना का सबसे बड़ा केंद्र है कामाख्या मंदिर

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कामाख्या शक्तिपीठ गुवाहाटी (असम) के पश्चिम में 8 कि.मी. दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है. माता के सभी शक्तिपीठों में से कामाख्या शक्तिपीठ को सर्वोत्तम कहा जाता है. माता सती के प्रति भगवान शिव का मोह भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के 51 भाग किए थे.

जिस-जिस जगह पर माता सती के शरीर के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए. कहा जाता है कि यहां पर माता सती का गुह्वा मतलब योनि भाग गिरा था, उसी से कामाख्या महापीठ की उत्पत्ति हुई. कहा जाता है यहां देवी का योनि भाग होने की वजह से यहां माता रजस्वला होती हैं.

 

कामाख्या शक्तिपीठ चमत्कारों और रोचक तथ्यों से भरा हुआ है. यहां जानिए कामाख्या शक्तिपीठ से जुड़े ऐसे ही 6 रोचक तथ्य:

1. मंदिर में नहीं है देवी की मूर्ति: इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, यहां पर देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है. मंदिर में एक कुंड सा है, जो हमेशा फूलों से ढका रहता है. इस जगह के पास में ही एक मंदिर है जहां पर देवी की मूर्ति स्थापित है. यह पीठ माता के सभी पीठों में से महापीठ माना जाता है.

2. यहां माता हर साल होती हैं रजस्वला: इस पीठ के बारे में एक बहुत ही रोचक कथा प्रसिद्ध है. कहा जाता है कि इस जगह पर मां का योनि भाग गिरा था, जिस वजह से यहां पर माता हर साल तीन दिनों के लिए रजस्वला होती हैं. इस दौरान मंदिर को बंद कर दिया जाता है. तीन दिनों के बाद मंदिर को बहुत ही उत्साह के साथ खोला जाता है.

Kamakhya Temple in 1903

3. प्रसाद के रूप में मिलता है गीला वस्त्र: यहां पर भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गीला कपड़ा दिया जाता है, जिसे अम्बुवाची वस्त्र कहते हैं. कहा जाता है कि देवी के रजस्वला होने के दौरान प्रतिमा के आस-पास सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है. तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं, तब वह वस्त्र माता के रज से लाल रंग से भीगा होता है. बाद में इसी वस्त्र को भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है.

4. लुप्त हो चुका है मूल मंदिर: कथा के अनुसार, एक समय पर नरक नाम का एक असुर था. नरक ने कामाख्या देवी के सामने विवाह करने का प्रस्ताव रखा. देवी उससे विवाह नहीं करना चाहती थी, इसलिए उन्होंने नरक के सामने एक शर्त रखी. शर्त यह थी कि अगर नरक एक रात में ही इस जगह पर मार्ग, घाट, मंदिर आदि सब बनवा दे, तो देवी उससे विवाह कर लेंगी. नरक ने शर्त पूरी करने के लिए भगवान विश्वकर्मा को बुलाया और काम शुरू कर दिया.
काम पूरा होता देख देवी ने रात खत्म होने से पहले ही मुर्गे के द्वारा सुबह होने की सूचना दिलवा दी और विवाह नहीं हो पाया. आज भी पर्वत के नीचे से ऊपर जाने वाले मार्ग को नरकासुर मार्ग के नाम से जाना जाता है और जिस मंदिर में माता की मूर्ति स्थापित है, उसे कामादेव मंदिर कहा जाता है. मंदिर के संबंध में कहा जाता है कि नरकासुर के अत्याचारों से कामाख्या के दर्शन में कई परेशानियां उत्पन्न होने लगी थीं, जिस बात से क्रोधित होकर महर्षि वशिष्ट ने इस जगह को श्राप दे दिया. कहा जाता है कि श्राप के कारण समय के साथ कामाख्या पीठ लुप्त हो गया.

5. 16वीं शताब्दी से जुड़ा है मंदिर का इतिहास: मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में कामरूप प्रदेश के राज्यों में युद्ध होने लगे, जिसमें कूचविहार रियासत के राजा विश्वसिंह जीत गए. युद्ध में विश्व सिंह के भाई खो गए थे और अपने भाई को ढूंढने के लिए वे घूमत-घूमते नीलांचल पर्वत पर पहुंच गए.

Source : NorthEast Travelers

वहां उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी. उस महिला ने राजा को इस जगह के महत्व और यहां कामाख्या पीठ होने के बारे में बताया. यह बात जानकर राजा ने इस जगह की खुदाई शुरु करवाई. खुदाई करने पर कामदेव का बनवाए हुए मूल मंदिर का निचला हिस्सा बाहर निकला. राजा ने उसी मंदिर के ऊपर नया मंदिर बनवाया. कहा जाता है कि 1564 में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर को तोड़ दिया था. जिसे अगले साल राजा विश्वसिंह के पुत्र नरनारायण ने फिर से बनवाया.

6. भैरव के दर्शन के बिना अधूरी है कामाख्या यात्रा: कामाख्या मंदिर से कुछ दूरी पर उमानंद भैरव का मंदिर है, उमानंद भैरव ही इस शक्तिपीठ के भैरव हैं. यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में है. कहा जाता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है. कामाख्या मंदिर की यात्रा को पूरा करने के लिए और अपनी सारी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए कामाख्या देवी के बाद उमानंद भैरव के दर्शन करना अनिर्वाय है.

7. तंत्र विद्या का सबसे बड़ा मंदिर: कामाख्‍या मंदिर तंत्र विद्या का सबसे बढ़ा केंद्र माना जाता है और हर साल जून महीने में यहां पर अंबुवासी मेला लगता है. देश के हर कोने से साधु-संत और तांत्रिक यहां पर इकट्ठे होते हैं और तंत्र साधना करते हैं. माना जाता है कि इस दौरान मां के रजस्‍वला होने का पर्व मनाया जाता है और इस समय ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिन के लिए लाल हो जाता है.

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