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RELIGION

कब से शुरू हुई छठ महापर्व मनाने की परंपरा, जानिए पौराणिक बातें

Santosh Chaudhary

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रामायण एवं महाभारत काल से ही रही है छठ मनाने की परंपरा

पटना। त्योहारों के देश भारत में कई ऐसे पर्व हैं, जिन्हें काफी कठिन माना जाता है और इन्हीं में से एक है लोक आस्था का महापर्व छठ, जिसे रामायण और महाभारत काल से ही मनाने की परंपरा रही है।

नहाय-खाय के साथ आज से आरंभ हुए लोकआस्था के इस चार दिवसीय महापर्व को लेकर कई कथाएं मौजूद हैं। एक कथा के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया। इससे उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। इसके अलावा छठ महापर्व का उल्लेख रामायण काल में भी मिलता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती है। कहते हैं कि छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। मान्याताओं के अनुसार, वे प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे।

किंवदंती के अनुसार, ऐतिहासिक नगरी मुंगेर के सीता चरण में कभी मां सीता ने छह दिनों तक रह कर छठ पूजा की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार 14 वर्ष वनवास के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूय यज्ञ करने का फैसला लिया। इसके लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण दिया गया था, लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम एवं सीता को अपने ही आश्रम में आने का आदेश दिया। ऋषि की आज्ञा पर भगवान राम एवं सीता स्वयं यहां आए और उन्हें इसकी पूजा के बारे में बताया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को गंगा छिड़क कर पवित्र किया एवं कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। यहीं रह कर माता सीता ने छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।

लोकआस्था और सूर्य उपासना का महान पर्व छठ की आज से शुरुआत हो गई है। इस चार दिवसीय त्योहार की शुरुआत नहाय-खाय की परम्परा से होती है। यह त्योहार पूरी तरह से श्रद्धा और शुद्धता का पर्व है। इस व्रत को महिलाओं के साथ ही पुरुष भी रखते हैं। चार दिनों तक चलने वाले लोकआस्था के इस महापर्व में व्रती को लगभग तीन दिन का व्रत रखना होता है जिसमें से दो दिन तो निर्जला व्रत रखा जाता है।

छठ को पहले केवल बिहार, झारखंड और उत्तर भारत में ही मनाया जाता था, लेकिन अब धीरे-धीरे पूरे देश में इसके महत्व को स्वीकार कर लिया गया है। छठ पर्व षष्ठी का अपभ्रंश है। इस कारण इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया। छठ वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक माह में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है।

इस पूजा के लिए चार दिन महत्वपूर्ण हैं नहाय-खाय, खरना या लोहंडा, सांझा अर्घ्य और सूर्योदय अर्घ्य। छठ की पूजा में गन्ना, फल, डाला और सूप आदि का प्रयोग किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, छठी मइया को भगवान सूर्य की बहन बताया गया हैं। इस पर्व के दौरान छठी मइया के अलावा भगवान सूर्य की पूजा-आराधना होती है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इन दोनों की अर्चना करता है उनकी संतानों की छठी माता रक्षा करती हैं। कहते हैं कि भगवान की शक्ति से ही चार दिनों का यह कठिन व्रत संपन्न हो पाता है।

छठ वास्तव में सूर्योपासना का पर्व है। इसलिए इसे सूर्य षष्ठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सूर्य की उपासना उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की जाती है। ऐसा विश्वास है कि इस दिन सूर्यदेव की आराधना करने से व्रती को सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस पर्व के आयोजन का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी पाया जाता है। इस दिन पुण्यसलिला नदियों, तालाब या फिर किसी पोखर के किनारे पर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी के सूर्यास्त और सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था। प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी माता बालकों की रक्षा करने वाले विष्णु भगवान द्वारा रची माया हैं। बालक के जन्म के छठे दिन छठी मैया की पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे बच्चे के ग्रह-गोचर शांत हो जाएं और जिंदगी में किसी प्रकार का कष्ट नहीं आए। इस मान्यता के तहत ही इस तिथि को षष्ठी देवी का व्रत होने लगा।

छठ पूजा की धार्मिक मान्यताएं भी हैं और सामाजिक महत्व भी है। लेकिन इस पर्व की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें धार्मिक भेदभाव, ऊंच-नीच, जात-पात भूलकर सभी एक साथ इसे मनाते हैं। किसी भी लोक परंपरा में ऐसा नहीं है। सूर्य, जो रोशनी और जीवन के प्रमुख स्रोत हैं और ईश्वर के रूप में जो रोज सुबह दिखाई देते हैं उनकी उपासना की जाती है। इस महापर्व में शुद्धता और स्वच्छता का विशेष ख्याल रखा जाता है और कहते हैं कि इस पूजा में कोई गलती हो तो तुरंत क्षमा याचना करनी चाहिए वरना तुरंत सजा भी मिल जाती है।

 

सबसे बड़ी बात है कि यह पर्व सबको एक सूत्र में पिरोने का काम करता है। इस पर्व में अमीर-गरीब, बड़े-छोटे का भेद मिट जाता है। सब एक समान एक ही विधि से भगवान की पूजा करते हैं। अमीर हो वो भी मिट्टी के चूल्हे पर ही प्रसाद बनाता है और गरीब भी, सब एक साथ गंगा तट पर एक जैसे दिखते हैं। बांस के बने सूप में ही अर्घ्य दिया जाता है। प्रसाद भी एक जैसा ही और गंगा और भगवान भास्कर सबके लिए एक जैसे हैं। (वार्ता)

RELIGION

जन्माष्टमी आज और कल, बन रहा है विशेष संयोग, यह है पूजा का शुभ चौघड़िया मुहूर्त

Ravi Pratap

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श्री कृष्ण का जन्मोत्सव के लिए तैयारियां तेज हो गई हैं। हालांकि इस बार कोरोना वायरस महामारी के कारण मंदिरों में बड़े आयोजन नहीं होगे।11 अगस्त और 12 अगस्त दोनों दिन जन्माष्टमी मनाई जा रही है। हिंदू धर्म मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को ही श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। जन्माष्टमी के दिन लोग भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उपवास रखने के साथ ही भजन-कीर्तन और विधि-विधान से पूजा करते हैं।  ज्योतिषियों के भगवान श्री कृष्ण के जन्म के समय  रात 12 बजे अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र था।

इसलिए इसी नक्षत्र और तिथि में जन्माष्टमी मनाई जाती है। इस बार 11 अगस्त को जन्माष्टमी तिथि सुबह लग जाएगी, जो 12 अगस्त को सुबह 11 बजे रहेगी, वहीं रोहिणी नक्षत्र 13 अगस्त को लग रहा है। ऐसे में सभी कंफ्यूज हैं कि 11 को पूजा औऱ व्रत करें या फिर 12 को। कई ज्योतिषियों ने इसके लिए बताया कि जब उदया तिथि हो यानी जिस तिथि में सूर्योदय हो रहा हो, उस तिथि को ही जन्माष्टमी मनाई जाती है। इसलिए इस बार ज्योतिषियों के अनुसार जन्माष्टमी का दान 11 अगस्त को और 12 अगस्त को पूजा और व्रत रखा जा सकता है।

12 अगस्त को पूजा का शुभ समय रात 12 बजकर 5 मिनट से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक है। पूजा की अवधि 43 मिनट तक रहेगी। जन्माष्टमी पर इस बार वृद्धि संयोग बन रहा है, जो अति उत्तम हैं। भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के त्योहार के बाद भगवना का छठी पूजन कार्यक्रम भी धूमधाम से होता है। इस दिन कान्हा जी की छठी मनाई जाती हैऔर मंदिरों में प्रसाद वितरण किया जाता है।

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RELIGION

16 अगस्त से खुलेगा वैष्णो देवी मंदिर, जल्द जारी होगी गाइडलाइन; 19 मार्च से बंद है यात्रा

Ravi Pratap

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देश में कोरोना वायरस के कारण लगे पाबंदियों के लंबे समय बाद माता के भक्तों के लिए खुशखबरी आई है। अब भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन कर पाएंगे। पिछले 5 महीनों से बंद माता वैष्णो देवी की यात्रा अब शुरू होने जा रही है। 16 अगस्त को फिर से माता वैष्णो देवी की यात्रा खुल जाएगी। साथ ही प्रदेश के बाकी धार्मिक स्थलों को भी खोल दिया जाएगा, जिसमें बाबे मंदिर, रघुनाथ मंदिर, शिव खोड़ी  सहित बाकी देवी देवताओं के मंदिर भी खोलने की घोषणा कर दी गई है।

17 मार्च को करीब 14 हजार 816 भक्त गए थे भवन
धार्मिक स्थलों को फिर से खोलने की जानकारी सरकार के प्रवक्ता रोहित कंसल की ओर से दी गई है। रोहित कंसल ने कहा है कि सभी देवा स्थानों को 16 अगस्त से खोल दिया जाएगा। जिसमें सभी को एसओपी का पालन करना होगा।

बता दे कि अंभक्तों को अंतिम बार 17 मार्च को माता के भवन भेजा गया था, 17 मार्च को करीब 14 हजार 816 भक्तों को माता के भवन के लिए रवाना किया गया था जिसके बाद से ही लॉकडाउन के कारण यात्रा को बंद कर दिया गया था।

बाहरी यात्रियों के लिए कोरोना वायरस टेस्ट अनिवार्य होगा
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार फिलहाल यात्रा को प्रदेश के लोगों के लिए ही खोला गया है, क्योंकि अभी बाहर से यात्रियों को आने में खतरा है और बाहर से यात्रियों को आने नहीं दिया जा रहा है। वहीं बाहर से आने वाले यात्रियों के लिए कोरोना वायरस टेस्ट होना अनिवार्य है। जिसके लिए श्राइन बोर्ड की तरफ से पूरी तैयारी की जा रही है।

कितने भक्तों को यहां यात्रा के लिए अनुमति दी जाएगी इस पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही प्रतिदिन की भक्तों की गिनती पर भी फैसला किया जाएगा। जिसकी जानकारी बोर्ड दो-तीन दिन में देगी।

माता के भवन आने वाले भक्तों की घटी संख्या
दरअसल इस साल की शुरुआती 2 महीनों में भक्तों की गिनती को देखते हुए ऐसा अनुमान लगाया गया था कि इस साल यात्रा पिछले साल का रिकॉर्ड तोड़ देगी। लेकिन कोरोना महामारी के चलते लगे लॉकडाउन के कारण भक्तों की गिनती कई सालों से कम हो जाएगी। आंकड़ों के मुताबिक इस साल जनवरी में 5 लाख से ज्यादा  भक्त माता के दरबार में पहुंचे थे। वहीं फरवरी में तीन लाख 96 हजार भक्त माता के दरबार आए। वहीं 2019 की बात की जाए तो जनवरी में 5 लाख के करीब और फरवरी में 2 लाख से ज्यादा वक्त आए थे।

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INDIA

राममंदिर भूमिपूजन के लिए मां कामाख्या की पवित्र रज जाएगी अयोध्या

Muzaffarpur Now

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गुवाहाटी : श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। आगामी 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों मंदिर निर्माण के लिए विधिवत भूमि पूजन होना है। मंदिर की नींव में डालने के लिए देशभर की कई नदियों काजल और पवित्र स्थानों की मिट्टी को अयोध्या भेजने का क्रम भी जारी है।

इसी कड़ी में मंगलवार को मां कामाख्या मंदिर से रज कलश अयोध्या भेजा गया। कामाख्या मंदिर के प्रमुख तथा पुजारियों के मंत्रोच्चार तथा पूजा के साथ विश्व परिषद के नेताओं ने माता के मंदिर से रज कलश ग्रहण किया। इस मौके पर विश्व हिंदू परिषद पूर्वोत्तर, गुवाहाटी क्षेत्र संगठन मंत्री दिनेश तिवारी, विश्व हिंदू परिषद गोशक्षा के केंद्रीय मंत्री उमेश चंद्र पोरवाल, प्रांतीय मंत्री विश्व हिंदू परिषद पल्‍लव पाराशर, उमापति तथा महानगर मंत्री चंदन राभा उपस्थित थे।

Image may contain: one or more people and outdoor, text that says "KAMAKHYA TEMPLE"

आपको बता दें कि अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के भूमिपूजन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं।  पांच अगस्त को होने वाले भूमि पूजन कार्यक्रम की मेजबानी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करेंगे।  इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई हस्तियां मौजूद रहेंगी।  हालांकि, सीएम योगी को छोड़कर और किसी भी प्रदेश के मुख्यमंत्री को बुलाया नहीं गया है।

भूमिपूजन के दौरान 50-50 लोगों के अलग-अलग ब्लॉक में करीब 200 लोग मौजूद होंगे।  50 की संख्या में देश के बड़े साधु-संत मौजूद रहेंगे, 50 की संख्या में देश के बड़े नेता और आंदोलन से जुड़े लोग रहेंगे।  इनमें लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और कल्याण सिंह के साथ साध्वी ऋतंभरा और विनय कटियार भी कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे।

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