डांडिया और गरबा की धूम के बीच कहीं खो गई है बिहार की ‘झिझिया’

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जहां एक ओर आजकल नवरात्रि में गरबा और डांडिया की धूम मची रहती है वहीं बिहार की नृ्त्य शैली झिझिया आज किसी कोने में दम तोड़ती नजर आती है। इसकी वजह है कि आज डांडिया और गरबे को बड़े-बड़े क्लबों में खासी जगह मिल चुकी है, लेकिन झिझिया नृत्य को लेकर लोगों में झिझक है।

वर्तमान समय में कुछ ही बुजुर्ग होंगे जिनकी स्मृति पटल पर शायद झिझिया अंकित हो लेकिन आज की युवा पीढ़ी तो शायद नाम ही कभी ना सुनी हो। झिझिया की जगह हम सभी के आंगन में गरबा-डांडिया ने घर बना लिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि गुजरात और महाराष्ट्र में जिस तरह गरबा-डांडिया लोकप्रिय है, क्या हम बिहार में झिझिया लोक नृत्य को उसी प्रकार लोकप्रिय नहीं बना सकते ।

 

 

बिहार की यह नृत्य शैली अपनी पहचान खो चुकी है कम ही लोग जानते हैं कि डांडिया और गरबे की तरह ही इस नृत्य शैली का आयोजन भी शारदीय नवरात्र में ही किया जाता है। इस नृत्य शैली का पौराणिक महत्व है।

मिथिलांचल का प्रमुख नृत्य है झिझिया

झिझिया मिथिलांचल का एक प्रमुख लोक नृत्य है। दुर्गा पूजा के मौके पर इस नृत्य में लड़कियां बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती है। इस नृत्य में कुवारीं लड़कियां अपने सिर पर जलते दिए एवं छिद्र वाली घड़ा को लेकर नाचती हैं। मिथिला में पौराणिक काल से तंत्र-मंत्र का स्थान रहा है। इसी में एक झिझिया नृत्य है।

कठिन है झिझिया नृत्य विधा

इस नृत्य का आयोजन शारदीय नवरात्र में किया जाता है। इस लोकनृत्य में महिलाएं अपनी सहेलियों के साथ गोलाकार घेरा बनाकर नृत्य करती हैं। घेरे के बीच एक मुख्य नर्तकी रहती हैं। मुख्य नर्तकी सहित सभी नृत्य करने वाली महिलाओं के सिर पर सैकड़ों छिद्रवाले घड़े होते हैंं,  जिनके भीतर दीप जलता रहता है।

घड़े के ऊपर ढक्कन पर एक भी एक दीप जलता रहता है। इस नृत्य में सभी लड़कियां एक साथ ताली वादन तथा पग-चालन व थिरकने से जो समा बंधता है, वह अत्यंत ही आकर्षक होता है। सिर पर रखे दीपयुक्त घड़े का बिना हाथ का सहारा लिए महिलाएं एक-दूसरे से सामंजस्य स्थापित कर नृत्य का प्रदर्शन करती हैं।

नृत्य में ब्रह्म बाबा का आशीर्वाद लेने की बात कही जाती है

इस नृत्य का तंत्र-मंत्र से गहरा जुड़ाव है। ऐसी मान्यता है कि समाज में कुछ बुरी शक्तियां भी होती हैं जिनसे बचने के लिए ब्रह्म बाबा का आशीर्वाद जरूरी होता है। झिझिया नृत्य में इन बुरी शक्तियो की खूब बुराई होती हौ तो वहीं ब्रह्म बाबा से आशीर्वाद भी लेते हैं, ताकि परिवार में समाज में शांति और सद्भाव बना रहे और बुरी शक्तियों का नाश हो।

कहा जाता है कि शारदीय नवरात्र में कथित ऐसी शक्तियां होती हैं जो मंत्र का सिद्ध करने का प्रयास करती हैं। जिसे इस नृत्य द्वारा बचाव किया जा सकता है। वैसे तो यह शारदीय नवरात्र के प्रारंभ से ही किया जाता है, लेकिन महाष्टमी के दिन गांव की महिलाएं इस नृत्य को करती हैं ताकि बुरी शक्तियों का प्रभाव किसी पर ना हो।

वहीं, ऐसी मान्यता है कि जो कोई नर्तकी के सिर पर रखे घड़ेछिद्र को गिन लेगा उस नर्तकी की तत्काल मृत्यु हो जाएगी। इसलिए नर्तकी इसको लगातार घुमाती रहती हैं।

मुगल सम्राट औरंगजेब के काल से जुड़ी है लोककथा

झिझिया का संबंध मुगल सम्राट औरंगजेब के काल से जुड़ा है। रूपनगर के राजा चित्रसेन की बहन चित्रावली का विवाह नेपाल के राजा धरनीधर के पुत्र सुजान से हुआ था। चित्रावली ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया। माता-पिता ने उसका नाम बालरूप रखा। बालक देखने में जितना सुंदर था, उतना ही सुशील। 6 साल की उम्र में उसके माता-पिता का निधन हो गया। अनाथ बालक दर-दर की ठोकरें खाने लगा। मामा चित्रसेन को जब घटना के बारे में पता चला तो वह उसे अपने घर ले आए। बालरूप जब किशोरावस्था में पहुंचा तो उसकी सुंदरता पहले से भी आकर्षक हो गई। जिस पर रानी भी मोहित हो गई। उसने बालरूप को अपने वश में करने की कोशिश की, लेकिन जब नाकाम रही तो उसे मारने के आदेश दिए। लेकिन, जल्लाद ने उसकी सुंदरता को देख कर उसे नहीं मारा और जंगल से सियार का कलेजा लाकर रानी को दिखा दिया। औरंगजेब की सेना इसी जंगल के रास्ते कहीं आक्रमण करने जा रही थी। उसकी नजर एक बुढ़िया पर पड़ी। सेना ने बुढ़िया को सनातनी संप्रदाय का समझ कर उसकी हत्या कर दी। उसी क्रम में बालरूप भी मारा गया। इसी लोककथा के आधार पर बच्चों को भूत-प्रेत व अन्य के साए से बचाने के लिए बज्जिकांचल, मिथिलांचल व तिरहुत के गांवों में झिझिया के लोकनृत्य परंपरा थी।

विलुप्त हो रहे इस नृत्य विधा को जीवित करने की है जरूरत

पौराणिक काल से शारदीय नवरात्र में किया जाने वाला यह नृत्य अब बिल्कुल विलुप्त होने की कगार पर है। मिथिला के इस नृत्य को बचाने और  गरबा व डांडिया नृत्य की तरह लोकप्रिय बनाने के लिए मधुबनी के एक डांस स्कूल के निदेशक विक्रांत द्वारा  शारदीय नवरात्र में बच्चियों को झिझिया सिखाने की इस बार पहल की गई है।

 

वहीं, मिथिला संस्कृति के जानकार रुद्रकांत पाठक का कहना है कि मिथिला की इस नृत्य विधा का पहले काफी महत्व था लेकिन अब तो कोई जानता भी नहीं। हम अपनी संस्कृति सभ्यता से दूर हो चुके हैं। हम अपनी लोक कलाओं की उपेक्षा कर रहे हैं जो कतई सही नहीं है।

पं. महीकांत पाठक और सुमित्रा देवी ने कहा कि यह मिथिला में तंत्र मंत्र पर आधारित नृत्य है। जिसका जुड़ाव मां दुर्गा की आराधना से भी है, अब तो लोग डांडिया और गरबा को जानते हैं, पहचानते हैं लेकिन अपनी माटी अपनी लोककला झिझिया को नहीं जानते। यह दुखद है।

 

अगर हमें अपनी संस्कृति और लोक परंपराओं को जीवित रखना है तो उसे सिर्फ दिल में सहेजने से ही काम नहीं चलेगा। उसे जुबां पर लाने की जरूरत है। हम कहीं भी रहें हमें अपनी संस्कृति अपनी लोककला को पहचानना-जानना जरूरी है। अभी दशहरा चल रहा है, लेकिन दशहरा पर होने वाले बिहार के पारंपरिक लोक-नृत्य ‘झिझिया’ शब्द से शायद ही कोई परिचित हो?

जिस तरह सरकारें गरबा-डांडिया को संरक्षण प्रदान रही हैं, क्या बिहार की सरकार झिझिया लोक नृत्य को संरक्षण नहीं दे सकती है? बिहार की इस नृत्य विधा को अब लोगों के बीच पहचान दिलाने की जरूरत है ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी संस्कृति को जान सके।

भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति हावी हो गई है। इससे लोक परंपराएं विलुप्त हो रही हैं। सरकार को लोक संस्कृति पर आधारित झिझिया, समा-चकवा समेत अन्य परंपराओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए आयोग गठित करना चाहिए। वहीं, इससे जुड़े कलाकारों की आर्थिक मदद के लिए नीति बनानी चाहिए। -नंदलाल मिश्रा, प्राचार्य, वासुदेव संगीत कॉलेज, रामबाग


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