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क्या नीतीश कुमार फिर छोड़ेंगे भाजपा का साथ? – लोकसभा चुनाव 2019

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मार्च 2014: “हमारा अभियान स्पष्ट है, बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए.”

अगस्त 2015: “बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं देना मोदी सरकार का धोखा.”

अगस्त 2016: “जब तक बिहार जैसे पिछड़े राज्य को विशेष दर्जा नहीं दिया जाएगा, राज्य का सही विकास संभव नहीं है.”

अगस्त 2017: “पीएम मोदी के मुकाबले कोई नहीं”, पार्टी ने इस दौरान विशेष दर्जा के मुद्दे पर अघोषित चुप्पी साधी!

मई 2019: “ओडिशा के साथ-साथ बिहार और आंध्र प्रदेश को भी मिले विशेष राज्य का दर्जा.”

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के मुद्दे पर नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का स्टैंड पिछले पांच सालों में कुछ इस तरह बदला है.

इस दौरान बिहार की सत्ता पर नीतीश कुमार ही काबिज़ रहे, हालांकि केंद्र में सरकारें बदलीं और राज्य में उनकी सरकार के सहयोगी भी.

संयोग यह रहा कि जब भी जदयू विशेष दर्जा के मुद्दे पर आक्रामक हुई, केंद्र और राज्य में अलग-अलग गठबंधन की सरकारें रहीं और जब दोनों जगहों पर एनडीए की समान सरकार बनी तो पार्टी ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली.

अब लोकसभा चुनाव के छह चरण बीत जाने के बाद पार्टी ने एक बार फिर से राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने का राग अलापा है.

जदयू के महासचिव और प्रवक्ता केसी त्यागी ने इस बार बिहार के साथ-साथ ओडिशा और आंध्र प्रदेश को भी विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की है.

उन्होंने सोमवार को एक बयान जारी कर कहा, “साल 2000 में बिहार के विभाजन के बाद राज्य से प्राकृतिक संसाधनों के भंडार और उद्योग छिन गए. राज्य का विकास जैसे होना चाहिए था, नहीं हुआ. अब समय आ गया है कि केंद्रीय वित्त आयोग इस मुद्दे पर फिर से विचार करे.”

फ़िलहाल केंद्र और राज्य में समान गठबंधन की सरकार है और लोकसभा चुनाव चल रहे हैं. ऐसे में जदयू के इस बयान से राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है. तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं.

19 मई को अंतिम चरण में बिहार की आठ सीटों पर मतदान होने हैं. और नीतीश कुमार के विरोधियों का कहना है कि वो एक बार फिर पलटी मारने की तैयारी कर रहे हैं.

वहीं जानकार इसे “सुविधा की राजनीति” के तौर पर देख रहे हैं. हालांकि जदयू इन सभी अशंका और आरोपों को खारिज कर रही है और भाजपा के साथ अपने रिश्ते को कायम रखने की प्रतिबद्धता जता रही है.

 

भाजपा का साथ छोड़ेगी जदयू?

केसी त्यागी ने बीबीसी से कहा कि वे ओडिशा के साथ-साथ आंध्र प्रदेश को भी विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के समर्थक हैं, जिसकी हालत बंटवारे के बाद बिगड़ गई और जगनमोहन रेड्डी के विशेष राज्य के दर्जे की मांग का भी समर्थन करते हैं.

हाल ही में फणी तूफ़ान ने ओडिशा को काफी नुकसान पहुंचाया, इसके बाद वहां के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने केंद्र से राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई.

वहीं, आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी तेलुगू देशम पार्टी और विपक्ष के नेता जगनमोहन रेड्डी भी राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग पहले से करते रहे हैं.

इसी मुद्दे पर पिछले साल मार्च के महीने में तेलगू देशम पार्टी केंद्र में एनडीए गठबंधन से अलग हो गई थी जो कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से ही एनडीए के साथ रही थी.

केसी त्यागी के इस बयान पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए एक बार फिर पलटी मारने की आशंका जताई है.

पार्टी प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने बीबीसी से कहा, “जनता के मन में जो संशय हैं, उसकी पृष्ठभूमि तैयार हो रही है. पलटी मारना नीतीश कुमार की फितरत है, उन्हें इसका अनुभव प्राप्त है. जदयू को लग रहा है कि देश में भाजपा की सरकार नहीं लौटने वाली है, इसलिए वो यह मुद्दा उठा रहे हैं.”

नवंबर 2015 में बिहार में जदयू ने राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर राज्य में तीसरी बार सरकार बनाई थी. जुलाई 2017 में जदयू ने आरजेडी का साथ छोड़ एनडीए में फिर से आने का फ़ैसला किया था तब से इस मांग को लेकर वो ख़ामोश थी.

चुनाव के आख़िरी चरण में जदयू की इस मांग को नीतीश कुमार की दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है.

जानकारों का मानना है कि विशेष राज्य के मुद्दे को फिर से उठना भाजपा को असहज स्थिति में डाल सकता है क्योंकि पार्टी के बड़े नेता और वित्तमंत्री अरूण जेटली पहले ही विशेष दर्जे की मांग को ख़ारिज करते हुए कह चुके हैं कि ऐसी मांगों का दौर समाप्त हो चुका है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राजद का आरोप सही साबित होगा और जदयू भी टीडीपी की राह चलेगी, इस सवाल पर केसी त्यागी कहते हैं, “हम भाजपा के साथ गठबंधन भी रखेंगे और अपनी मांग भी जारी रखेंगे. हमारी यह मांग बहुत पुरानी है. 2004 से यह मांग हम कर रहे हैं. नया प्रसंग नवीन पटनायक के बयान के बाद शुरू हुआ है, हमने अपनी मांग को सिर्फ़ दोहराया है.”

लेकिन भाजपा अब आपकी सहयोगी है, फिर क्यों नहीं मिला विशेष राज्य का दर्जा, इस सवाल का जवाब केसी त्यागी थोड़ी खीझ के साथ देते हैं, “अभी चुनाव चल रहा है, आप कैसी बात कर रहे हैं कि जैसे आज हमने मांग उठाई और कल को दर्जा मिल जाएगा. ज़रूरी नहीं है कि हर मांग मानी जाए, ज़रूरी नहीं है कि हम हर मांग को उठाना छोड़ दे.”

दोनों पार्टियों के बीच मतभेद?

ज़रूरी नहीं है कि हर मांग मानी जाए… केसी त्यागी के इस बयान को जदयू का भाजपा पर घटते विश्वास के रूप देखा जा सकता है.

प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता निखिल आनंद इस संदेह को खारिज करते हैं और दोनों पार्टियों के बीच के रिश्ते को मज़बूत बताते हैं.

निखिल आनंद ने बीबीसी से कहा, “बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिले, बिहार को विशेष तरजीह मिले और इसके विकास के लिए जिस तरह की भी सहायता मिलती है, हम उसका समर्थन करते हैं. इसको लेकर एनडीए में कोई कंफ्यूजन नहीं है.”

वो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं देने के केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के तर्क को दोहराते हुए कहते हैं नीति आयोग के पास सिर्फ बिहार का मामला नहीं है, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों से भी जुड़ा मामला है.

“कांग्रेस के कार्यकाल में भी तो विशेष दर्जा नहीं दिया गया था. हालांकि नरेंद्र मोदी की सरकार के दौरान बिहार में कई उद्योग-धंधों को उद्धार किया गया. राज्य को केंद्रीय योजनाओं का भी खूब लाभ मिला है.”

विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के तकनीकी पेंच

साल 2011 में सरकार ने संसद को बताया था कि देश के कुल 11 राज्यों को विशेष राज्य की श्रेणी में रखा गया है. उस वक़्त सरकार ने यह भी बताया था कि चार राज्यों ने विशेष राज्य का दर्जा देने का अनुरोध किया था, जिसमें बिहार, ओडिशा, राजस्थान और गोवा शामिल थे. इसके बाद आंध्र प्रदेश ने भी इसकी मांग की.

अरूणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, उत्तराखंड और मिजोरम को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है.

तत्कालीन योजना राज्य मंत्री अश्विनी कुमार ने बताया था कि विशेष श्रेणी का दर्जा राज्यों को राष्ट्रीय विकास परिषद देती है. इसके लिए कुछ मापदंड तय किए गए हैं ताकि उनके पिछड़ेपन का सटीक मूल्यांकन किया जा सके और इसके अनुरूप दर्जा प्रदान किया जा सके.

वो मापदंड, जिनके आधार पर राष्ट्रीय विकास परिषद राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा देती हैः

  1. संसाधनों की कमी
  2. प्रति व्यक्ति आय कम होना
  3. राज्य की आय कम होना
  4. जनजातीय आबादी का बड़ा हिस्सा हो
  5. पहाड़ी और दुर्गम इलाक़े में स्थित हो
  6. जनसंख्या धनत्व कम हो
  7. प्रतिकूल स्थान
  8. अंतरराष्ट्रीय सीमा से राज्य की सीमा लगती हो

 

बिहार के मामले में केंद्र की भाजपा सरकार इन्हीं तकनीकी वजहों को पहले गिना चुकी है. भाजपा प्रदेश इकाई भी इन्हीं वजहों को गिनाती हैं.

लेकिन आर्थिक रूप से दस फ़ीसदी आरक्षण दिया जाना भी तकनीकी रूप से मुमकिन नहीं था, उसके लिए केंद्र सरकार तीन दिनों के भीतर कानून में बदलाव कर देती है, तो क्या जदयू की 15 साल पुरानी मांग को पूरा नहीं किया जा सकता है?

इस सवाल के जवाब में प्रदेश भाजपा प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं, “देखिए ये मुद्दा पूरी तरह आर्थिक अध्ययन का मामला है, क्षेत्रीय असमानता का मामला है और आरक्षण का मामला सामाजिक उत्थान से जुड़ा मामला है. इन सभी को एक-दूसरे से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए.”

जदयू की मांग का राजनीतिक मतलब

छह चरण के मतदान बीत जाने के बाद भाजपा की राह आसान नहीं बताई जा रही है. ऐसे में जदयू की मांग का राजनीतिक मतलब क्या हैं?

इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “इतने समय तक जदयू की चुप्पी और इतने अंतराल के बाद विशेष राज्य के दर्जे का मुद्दा उठाया जा रहा है, तो जाहिर है कि लोग चौकेंगे कि ऐसा क्यों हो रहा है.”

“मुझे लग रहा है कि नीतीश कुमार को अपना या फिर अपनी पार्टी का राजनीतिक भविष्य ख़तरे में लग रहा है, उसके मद्देनज़र ये बयान दिए गए हैं. अगर जदयू कोई संकट में फंसता है और आगे की चाल क्या होगी, यह उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने की कोशिश लग रही है.”

राज्य में दोबारा भाजपा के साथ आने के बाद विशेष राज्य के सवाल पर जदयू के नेता कहते थे कि वो इस मांग को पूरी तरह छोड़े नहीं हैं. विशेष पैकेज जो केंद्र की तरफ से मिला है, उससे बहुत हद तक हमारी मांग पूरी हुई है. सिर्फ़ विशेष राज्य के दर्जे का नाम नहीं मिला है.

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से अपनी मांग उठाते हैं. “जब आप नरेंद्र मोदी के विरोध में थे, तब तो आपने ज़ोर डाला. और फिर जब साथ हो गए तो आपने इसे छोड़ दिया, इस पर चर्चा तक नहीं की. तो ज़ाहिर है कि सुविधा की राजनीति इसे ही कहते हैं.”

हालांकि अंत में मणिकांत ठाकुर जदयू के बयान का सकारात्मक पक्ष भी गिनाते हैं और कहते हैं कि “हो सकता है कि भाजपा इसके लिए तैयार हो और जदयू के साथ भाजपा का जो संबंध बना है या आगे बरकरार रहा तो दोनों दलों को इससे एतराज नहीं होगा और अगर मोदी सरकार दोबारा बनती है तो दोनों मिल कर विशेष राज्य का दर्जा देने का रास्ता निकालेंगे.”

Input : BBC Hindi

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स्वास्थ्य सचिव सेंथिल ने होमी भाभा कैंसर अस्पताल के दक्षिण गेट का किया उद्घाटन

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आज दिनांक 30 नवंबर 2022 को होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर के दक्षिणी गेट का उद्घाटन एवं पीडियाट्रिक ऑनकोलॉजी डिपार्टमेंट का शुभारंभ बिहार सरकार में स्वास्थ्य सचिव के सेंथिल के द्वारा किया गया।

इस मौके पर होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र मुजफ्फरपुर के प्रभारी डॉ रविकांत सिंह ने कहा कि हम स्वास्थ्य व्यवस्था में एक कदम और आगे बढ़े हैं। इतने कम समय में ही होमी भाभा कैंसर हॉस्पिटल और अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर ने बिहार में कैंसर के इलाज के साथ रोकथाम के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए है।

होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर में सर्जिकल ओंको, गायनिक ओंको, मेडिकल ओंको, ब्रेस्ट ओंको और हेड एन नेक ओंको की सुविधाएं थी अब यहां पीडियाट्रिक ऑनकोलॉजी की भी सुविधाएं मिलेगी।

डॉ रविकांत सिंह ने कहा कि अभी बिहार राज्य में पीडियाट्रिक ऑनकोलॉजिस्ट की बहुत कमी है जिसके कारण लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता था। पहले इस इलाज के लिए होमी भाभा कैंसर अस्पताल वाराणसी जाना होता था लेकिन अब इसके इलाज के लिए बिहार सरकार ने पीकू बिल्डिंग में 15 बेड सिर्फ पीडियाट्रिक कैंसर के इलाज के दिया है। पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट के चालू हो जाने से बच्चों में होने वाले कैंसर के इलाज और देखरेख में तेजी आएगी।

अभी तक इस संस्थान में 4881 से ज्यादा मरीज रजिस्टर्ड हुए है। 11700 से ज्यादा कीमोथेरेपी साइकल हो चुकी है। इस संस्थान में अभी तक मेजर सर्जरी 519 से ऊपर और माइनर सर्जरी 1480 से ऊपर हो चुकी है। जबकि 42644 से ऊपर मरीजों का इलाज यहां पर चला है।

डॉ रविकांत सिंह के अनुसार कि उत्तर बिहार के लोगों को कैंसर के इलाज के लिए पहले अन्यत्र जगहों पर पलायन करना पड़ता था और इसमें कई ऐसे लोग होते है जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते उनके लिए टाटा स्मारक केंद्र ने मुजफ्फरपुर में अपनी इकाई खोली है ताकि सब्सिडी रेट में उनका इलाज सम्भव हो सके। इसके लिए अस्पताल आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सरकारी योजना के लाभ भी प्रदान कराने में मदद करती है।

इस मौके पर बिहार सरकार में स्वास्थ्य सचिव माननीय श्री के. सेंथिल ने यहां काम कर रहे सारे कर्मचारियों को धन्यवाद दिया कि इतने कम संसाधन और समय के वाबजूद इतनी मरीजों को अपनी सेवाएं दी है। यहां का मेडिकल ऑनकोलॉजी विभाग पूरे बिहार और झारखंड से बेहतर है और प्रतिदिन खुद को बेहतर करते जा रही है।

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मधुर भंडारकर की फिल्म में नजर आएगी बिहार की बेटी आयशा

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1950 के दशक से देश की तमाम मिस इंडिया प्रतियोगिताओं में जीत का परचम लहराने वाली सुंदरियां बॉलीवुड में आती रही हैं. अभिनेत्री नूतन से लेकर जीनत अमान, मीनाक्षी शेषाद्री, जूही चावला, ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन, प्रियंका चोपड़ा, लारा दत्ता समेत नेहा धूपिया, सेलिना जेटली, दिया मिर्जा, गुल पनाग, तापसी पन्नू से होते हुए मानुषी छिल्लर जैसी अभिनेत्रियां भी सौंदर्य प्रतियोगिताओं के रास्ते फिल्मों में आई हैं. अब ऐसी प्रतियोगिताओं के रास्ते बॉलीवुड में आ रही सुंदरियों में एक नाम और जुड़ गया है और बड़ी बात ये है कि ये टेलेंट बिहार पटना की मूल निवासी है. आयशा एस. एमन, 26 वर्षीय पुर्व मिस इंडिया इन्टरनेशनल आयशा ने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है तथा वो पटना की रहने वाली हैं. 2015 में मिस इंडिया इंटरनेशनल रही थीं और उन्होंने टोक्यो में मिस इंटरनेशनल 2015 में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया था.

ख़िताब के साथ बनी पहचान

आयशा ने बताया कि 2015 में मिस इंडिया इंटरनेशनल का खिताब जीतने के बाद रास्ते अपने आप खुलते गए। फिल्म ‘इंडिया लाकडाउन’ के बारे आयशा बताती हैं कि जी फाइव की ओर से मूवी का ट्रेलर जारी किया गया है. मेरा किरदार मुंबई के कमाठीपुरा के वर्कर का है. आयशा आगे बताती हैं कि फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी की मंडी और चांदनी बार जैसी मूवी को देखने के बाद फिल्म में किरदार निभाने में काफी सहायात मिली. सच्ची घटना से प्रेरित, अमित जोशी और आराधना शाह द्वारा लिखित ‘इंडिया लाकडाउन’ फिल्म चार समानांतर कहानियों पर अधारित है. इस फिल्म में 4 मुख्य किरदारों की अलग-अलग कहानी है. जिसके जरिए भारत में कोरोना महामारी के दौरान लगे पहले लॉकडाउन की कहानी को बयां किया गया है. इसी में से एक ट्रैक में ऐक्ट्रेस आयशा एस एमन सेक्स वर्कर का रोल प्ले कर रही हैं। उनके जरिए महामारी के दौरान सेक्स वर्करों की दुर्दशा पर फोकस किया गया है.

आयशा बॉलीवुड में अपनी एंट्री को लेकर बहुत उत्साहित हैं. उन्होंने मधुर की फिल्म से करियर शुरू करने के बारे में कहा कि मैंने इस फिल्म में अपने किरदार की लंबाई नहीं देखी, बल्कि यह देखा कि इसका सब्जेक्ट क्या है. यह फिल्म कोविड 19 की कहानी बताती है कि कैसे हर व्यक्ति ने अपनी-अपनी तरह से इस महामारी के दौर का मुकाबला किया. वास्तव में कोविड ने लोगों को न केवल एक साथ इकट्ठा किया, बल्कि उन्हें मजबूत भी बनाया.

आयशा ने बताया कि फिल्म ‘इंडिया लाकडाउन’ कोविड -19 की पहली लहर के शुरुआती दिनों पर आधारित है. पूरे देश में 21 दिनों का लाकडाउन लगाने के बाद कई लोग बेरोजगार हो गए थे. प्रवासी श्रमिकों को अपने मूल स्थान पर वापस लौटना पड़ा है. आय के सारे स्त्रोत बंद हो गए थे। फिल्म में कई दर्दनाक अनुभवों को बयां किया गया है। फिल्म दर्शकों को पसंद आएगी.

पूर्व मिस इंडिया इंटरनेशनल का खिताब जीतने वाली अभिनेत्री आयशा एस ऐमन आगे भी कई फिल्म व वेब सीरीज में नजर आएंगी. आयशा ने बताया कि वह मधुर भंडारकर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘इंडिया लाकडाउन’ में दिखेंगी. ये फिल्म दो दिसंबर को रिलीज होगी. मधुर भंडारकर की यह फिल्म लंबे वक्त से सुर्खियों में बनी हैं और ये मेरे लिए किसी सपने के सच होने जैसा है.

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बिहार में बालू खनन होगा बंद, नीतीश सरकार ने विभागों को जारी किया नोटिस

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बिहार में दिसंबर माह के अंत से बालू का संकट गहरा सकता है। जानकारी के मुताबिक 25 दिसंबर के बाद बिहार में बालू खनन पर रोक लग जाएगी। अभी राज्य में बालू खनन का काम बिहार राज्य खनन निगम के पास है लेकिन 25 दिसंबर को बालू खनन की अनुमति खत्म हो जाएगी। जिसके बाद उन्हें इसकी अनुमति नहीं है। इससे बिहार में बालू का संकट उत्पन्न हो सकता है। इसको लेकर पथ निर्माण, ग्रामीण कार्य विभाग, जल संसाधन विभाग, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, शहरी विकास विभाग, भवन निर्माण विभाग, लाेक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग आदि को अलर्ट जारी कर दिया गया हैं।

खान एवं भूतत्व विभाग की अपर मुख्य सचिव हरजोत कौर ने निर्माण कार्य करने वाली सभी सरकारी विभागों को 25 दिसंबर तक बालू का पर्याप्त मात्रा में भंडारण करने का अनुरोध किया है। पत्र में कहा गया है कि हाईकाेर्ट में सिविल अपील की सुनवाई 26 सितंबर काे हुई थी। जिसमें पारित अंतरिम आदेश में निगम को 25 दिसंबर तक ही बालू का खनन की अनुमति दी गई थी। वहीं दूसरी तरफ इस पत्र से निर्माण कार्य से जुड़े विभागों व ठेकोदारों के बीच हड़कंप मच गया हैं।

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