जानिए आखिर क्यों देश का यह नामीगिरामी विश्वविद्यालय अपनी गरिमा खोता जा रहा
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जानिए आखिर क्यों देश का यह नामीगिरामी विश्वविद्यालय अपनी गरिमा खोता जा रहा

Muzaffarpur Now

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फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर आक्रामक हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन से देश के एक वर्ग ने बड़ी उम्मीदें पाल रखी हैं। लगातार दो आम चुनावों में जिन राजनीतिक धाराओं का जनाधार निरंतर कम हुआ है, उन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन से आस हो गई है। उन राजनीतिक धाराओं को लगता है कि इस आंदोलन की आग वर्ष 1974 के गुजरात छात्र आंदोलन या फिर 1980 के दशक के असम के छात्र आंदोलन की तरह देश भर में फैल जाएगी, जो भारतीय राजनीति के बदलाव का वाहक बनेगी।

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चाहे आंदोलन छोटा हो या बड़ा, लोकतांत्रिक समाज में उनसे परिवर्तन की लहर देखने की आदत विकसित हो गई है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सोमवार यानी 18 नवंबर को संसद सत्र की शुरुआत के दिन जिस तरह राजधानी दिल्ली छात्र आंदोलन की चपेट में रही, क्या वह आंदोलन भी देश में राजनीतिक बदलाव का वाहक बनेगा? सोशल मीडिया पर चल रही बहसों और सूचनाओं की जो आक्रामक बाढ़ है, वह भी कुछ ऐसा ही अहसास दे रही है।

आंदोलन की सफलता जनभरोसा पर टिकी होती है

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र आंदोलन से चाहे जितनी भी उम्मीदें पाली गई हों, उनमें से एकाध अपवादों को छोड़ दें तो यह आंदोलन परसेप्शन यानी दृष्टिबोध खो चुका है। इस आंदोलन को लेकर जनसहानुभूति नहीं है। इस आंदोलन को लेकर लोगों की सोच कुछ अलहदा ही है। इस आंदोलन को लेकर आम लोगों के बीच कोई स्पंदन नहीं है। लोकतांत्रिक समाज में किसी भी आंदोलन की सफलता उसके प्रति जनभरोसा पर टिकी होती है। लेकिन यह आंदोलन लोगों के बीच अपने प्रति कोई भरोसा हासिल ही नहीं कर पाया है। अगर इसे आंदोलन के नजरिये से देखें तो इस आंदोलन का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर क्या वजह रही कि कथित फीस बढ़ोतरी को वापस लेने की मांग के बावजूद यह आंदोलन लोगों की सहानुभूति हासिल नहीं कर पाया है? इस पर विचार करने से पहले अतीत के कुछ छात्र आंदोलनों की चर्चा की जानी चाहिए।

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व्यापक जनसरोकार की चिंताएं

जब भी दुनिया के किसी कोने में छात्र आंदोलन होता है, वर्ष 1789 के फ्रांस के छात्र आंदोलन की चर्चा जरूर होती है, जिसने फ्रांस में राजनीतिक बदलाव की भूमिका निभाई थी। मई 1968 का फ्रांस का छात्र आंदोलन भी कुछ ऐसा ही था, जब देश का मजदूर तबका और छात्र एक हो गए थे। दोनों ही आंदोलनों के मूल में फीस की बढ़ोतरी से ज्यादा व्यापक जनसरोकार की चिंताएं थीं। वर्ष 1968 के फ्रांस के आंदोलन के पीछे मजदूर तबके के बीच दुनिया की अर्थनीति में आ रहे बदलावों से खदबदा रही सोच थी। इसी बीच फ्रांस में पाठ्यक्रम में बदलाव लाने की कोशिश हुई। इसके विरोध में सबसे पहले छात्र सड़कों पर उतरे, उसके बाद मजदूरों ने उन्हें साथ दिया और देखते ही देखते दो लाख लोग पेरिस की सड़कों पर उतर आए थे।

इसी तरह से 1789 की छात्र क्रांति के पीछे तत्कालीन राजा की निरंकुश शासन व्यवस्था थी जिसके प्रतिकार के लिए पूरा फ्रांसीसी समाज छटपटा रहा था। इसे अभिव्यक्ति छात्रों के आंदोलन ने दी और देखते ही देखते व्यापक जनसरोकार से जुड़ा वह आंदोलन फ्रांस की क्रांति का प्रतीक बन गया। इसके बाद पूरी जनता छात्रों के समर्थन में सड़कों पर उतर आई। इसके बाद का इतिहास सर्वविदित है। फ्रांस में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था और संवैधानिक सुधारों की राह प्रशस्त हुई।

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बलिया से शुरू हुई बगावत

भारत में छात्र आंदोलन की बात करें तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में बलिया नाम का जिला है। इस जिले के नाम वर्ष 1942 में ही आजादी हासिल करने का तमगा हासिल है। करीब हफ्तेभर की उस आजादी की पटकथा छात्रों ने ही लिखी थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस आंदोलन को चरम पर पहुंचाने में छात्रों की पहल ने बड़ी भूमिका निभाई थी। मुंबई में गांधी के ‘करो या मरो’ का आह्वान और ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा देने के बाद बौखलाई अंग्रेज सरकार ने कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। इसकी खबर जब बलिया पहुंची तो उन दिनों छात्र नेता रहे तारकेश्वर पांडेय के नेतृत्व में 11 अगस्त को व्यापक हड़ताल बुलाई गई। छात्रों की इस हड़ताल को व्यापक समर्थन मिला था। इधर इस हड़ताल को खत्म कराने के लिए बलिया के तत्कालीन एसडीएम नेदरसोल ने लोगों पर जगह-जगह लाठीचार्ज किया था।

लेकिन आंदोलन आगे लगातार बढ़ता रहा। हालांकि तब तक जनता अत्याचार सहती रही। इसी दौरान 18 अगस्त को जिले के पूर्वी छोर पर स्थित बैरिया थाने पर तिरंगा फहराते वक्त कई नाबालिग छात्रों को पुलिस की गोलियों ने छलनी कर दिया, तो इस घटना के बाद बगावत हो गई। उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास की पुस्तकों में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो चुका है। छात्रों की शहादत को बलिया पचा नहीं पाया और उससे उठे शोलों ने अंग्रेजी शासन को ध्वस्त कर दिया। उस आंदोलन को लोगों का समर्थन इसलिए हासिल था, क्योंकि वे छात्र जनता से जुटे थे। उनका व्यापक जनसमुदाय से सीधा नाता था।

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आंदोलन को धार देने में बड़ी भूमिका

वर्ष 1974 के छात्र आंदोलन की जो आग फैली, उसकी आंच में 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार झुलस गई। आजाद भारत के इतिहास में कांग्रेस को सत्ता से हटाने के आंदोलन का आधार वह छात्र आंदोलन ही था। बेशक गुजरात में यह आंदोलन मेस में खाने की गड़बड़ी के विरोध में शुरू हुआ था। लेकिन बिहार आते-आते यह आंदोलन व्यापक जनभावनाओं का प्रतीक बन चुका था। इंदिरा सरकार की तानाशाही, बाढ़ और सुखाड़ से जूझते बिहार की बिलबिला रही जनता का दर्द भी इस आंदोलन का आधार बन गया। भ्रष्टाचार की कहानियों ने इस आंदोलन को धार देने में बड़ी भूमिका निभाई, क्योंकि तब के छात्र सिर्फ अपनी फीस बढ़ोतरी के विरोध में नहीं जुटे थे, बल्कि व्यापक जनसरोकारों से जुड़े हुए थे। 1980 के दशक में असम का छात्र आंदोलन तब तक कामयाब नहीं हो सकता था, जब तक उसे व्यापक जनसमर्थन नहीं मिल पाता। असम के लोगों का उस आंदोलन को समर्थन इसलिए मिला, क्योंकि वह आंदोलन भी जनता की नब्ज से जुड़ा था।

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सांस्कृतिक विरासत पर गर्व

अतीत के इन सारे आंदोलनों में शिरकत करने वाले छात्र अपने को अलहदा समाज का नहीं मानते थे। वे लोगों से सीधे जुड़े रहते थे, लोगों के दुख-सुख से उनका सीधा नाता था और सबसे बड़ी बात यह कि वे अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते थे। अतीत के इन सभी छात्र आंदोलनों में देखेंगे तो पता चलेगा कि उनका नेतृत्व जिनके हाथों में था, वे खुद को अपने समाज, संस्कृति और वैचारिकता से जुड़े मानते थे। यहीं पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का छात्र आंदोलन अलग नजर आने लगता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बगल में ही मुनिरका, बेरसराय, कटवरिया सराय, किशनगढ़ जैसी जगहें हैं, लेकिन यहां के छात्र इन इलाकों तक से खुद को जुड़ा नहीं महसूस करते।

मौजूदा छात्र आंदोलन को लेकर सोशल मीडिया पर जो भी अभियान चल रहा है, उसमें यह दिखाने की बार-बार कोशिश की जा रही है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र अपने आप में विशिष्ट हैं। ऐसा साबित करने की कोशिश की जा रही है कि वे विशेषाधिकार प्राप्त छात्र हैं। दरअसल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को एक खास विचारधारा के पोषक केंद्र के तौर पर शुरू से ही विशिष्टता बोध के साथ विकसित किया गया है। इसलिए यहां के छात्र अपने आसपास के समाज से जुड़ नहीं पाते। उल्टे सामाजिक परंपराओं, मान्यताओं को अपने कार्यों और वक्तव्यों से यहां के छात्र और प्राध्यापक खारिज करते रहे हैं।

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दाखिला पाने के बाद ज्यादातर छात्रों में बदलाव 

करीब चौथाई सदी पहले से ही इस विश्वविद्यालय को लेकर जैसी धारणा बनी हुई है कि कई परंपरावादी अभिभावक अपने बच्चों को यहां पढ़ाने से या तो हिचकते रहे हैं या फिर यहां दाखिला पाने के बाद अपने बच्चों को मर्यादा में रहने की सीख देते रहे हैं। यह बात और है कि यहां दाखिला पाने के बाद ज्यादातर छात्रों में बदलाव आ ही जाता है। यह बदलाव इतना क्रांतिकारी होता है कि वह सामाजिकता से तालमेल नहीं बैठा पाता। छात्रों द्वारा केंद्र सरकार का एकतरफा अंधविरोध नरेंद्र मोदी सरकार को लेकर जिस तरह इस विश्वविद्यालय के छात्र समाज ने वर्ष 2014 के बाद एकतरफा और अंधविरोध का तरीका अख्तियार किया है, उससे इस विश्वविद्यालय को लेकर आम मान्यता यह बन गई है कि यह दुनिया भर में कमजोर हो चुके वामपंथ का आखिरी गढ़ बन गया है।

आम भारतीय को कम से कम भारतीय राष्ट्रीयता बहुत लुभाती है। लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों का एक धड़ा भारतीय राष्ट्रवादी विचारधारा को ना सिर्फ खारिज करता है, बल्कि वह कश्मीर की आजादी की पैरोकारी भी करता है। उसे संसद पर हमले के आरोपी अफजल की फांसी की सजा गलत लगती है। वह ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा लगाने से भी नहीं हिचकता। उसे आजादी की मांग करने से कोई हिचक नहीं है। भारतीय सिपाहियों की शहादत पर उसे खुशी मनाने से हिचक नहीं होती।

पूजा-पाठ करना पोंगापंथ का उदाहरण

नक्सली आंदोलन में जब केंद्रीय पुलिस बलों के सिपाही शहीद होते हैं तो जेएनयू में माहौल गमगीन नहीं होता है। पूरा देश और पश्चिम बंगाल के वामपंथी भी दुर्गा पूजा करते हैं, लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इस पूजा को दकियानूसी ठहराते हुए महिषासुर की पूजा की जाती है। इस विश्वविद्यालय में पूजा-पाठ करना पोंगापंथ का उदाहरण माना जाता है, लेकिन नमाज पढ़ना और इफ्तार पार्टी आयोजित करना धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक है। धर्मांतरण को यहां इस तरह से मान्यता दी जाती है, मानो यह पवित्र कर्म हो। दिलचस्प यह है कि इन मान्यताओं की खबरें छन-छनकर इसके कैंपस से बाहर आती हैं।

‘भारत की बरबादी तक, जंग रहेगी जारी’

राष्ट्रवाद पर निरंतर प्रहार का प्रयास किसी भी देश में राष्ट्रवाद स्वयं में एक बड़ा मसला होता है। राष्ट्रवाद के नागरिक बोध के अभाव में किसी राष्ट्र का समग्र विकास नहीं हो सकता है। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ करीब एक सौ वर्षों के सघन आंदोलन में भारतीय समाज में जो राष्ट्रीयता विकसित हुई है, लोकवृत्त में जिस तरह के मूल्य स्वीकृत हुए हैं, उसमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से निकलने वाले अधिकांश विचार अतिवादी लगते हैं।

इसीलिए यहां के छात्रों के प्रति लोगों में कोई सहानुभूति नहीं है। फरवरी 2016 में जब कैंपस में ‘भारत की बरबादी तक, जंग रहेगी जारी’ और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’ जैसे उत्तेजक नारे लगे, तब इस विश्वविद्यालय के छात्रों ने आम लोगों के बीच की अपनी बची-खुची सहानुभूति खो दी। उन दिनों तो जेएनयू के आसपास के इलाकों में रहने वाले आम लोगों ने विश्वविद्यालय कैंपस के मुख्य द्वार पर छात्रों को घेरने और पीटने तक की योजना बनाई थी। इन लोगों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।

इससे साफ है कि यहां के छात्र अपने समाज से जुड़े नहीं हैं। यही वजह है कि उनका आंदोलन जनता का समर्थन नहीं हासिल कर पा रहा है। शायद यही वजह है कि अब यहां के छात्र यह भी कहने लगे हैं कि उनका आंदोलन आम लोगों के आगामी पीढ़ियों की निशुल्क शिक्षा को लेकर है। लेकिन उनका अतीत ऐसा रहा है कि आम लोग इस पर भी भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।

संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों ने फीस बढ़ोतरी के मुद्दे को लेकर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया। हालांकि जेएनयू के छात्रों का यह आंदोलन भले ही कुछ घंटों तक बेहद उग्र बना रहा, लेकिन आम आदमी या जनसामान्य की ओर से इसे किसी तरह का समर्थन मिलता हुआ नहीं प्रतीत हुआ। ऐसे में उन कारणों पर भी विचार करना होगा कि देश का यह नामीगिरामी विश्वविद्यालय आखिर क्यों अपनी गरिमा खोता जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार, जेएनयू छात्र आंदोलन

Courtesy : Dainik Jagran

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SBI का करोड़ों ग्राहकों को झटका! बैंक ने FD के बाद अब इस खाते पर घटाई ब्याज दरें, यहां चेक करें

Md Sameer Hussain

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 देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई (SBI-State Bank of India) ने एक हफ्ते में ही एफडी (Fixed Deposit) के बाद अब आरडी यानी रिकरिंग डिपॉजिट (Recurring Deposit) की ब्याज दरें घटाने का फैसला किया है. SBI आरडी खाताधारकों को अब 0.15 फीसदी कम ब्याज मिलेगा. बैंक ने नई दरें लागू कर दी है. 1 से 10 साल की अवधि वाले आरडी खाते पर ब्याज दरें 6.25 फीसदी से घटकर 6.10 फीसदी पर आ गई हैं. आपको बता दें कि इससे पहले 10 जनवरी को SBI ने 1 साल से लेकर 10 साल में मैच्योर होने वाले लॉन्ग टर्म डिपॉजिट्स पर FD की दरों में भी 0.15 की कटौती करने का ऐलान किया.

SBI के आरडी रिकरिंग डिपॉजिट (Recurring Deposit) की नई दरें

1 साल से 2 तक के लिए ब्याज दरें 6.10 फीसदी है.
2-3 साल के लिए ब्याज दरें 6.10 फीसदी है.


3-5 साल के लिए ब्याज दरें 6.10 फीसदी है.
5-10 साल के लिए ब्याज दरें 6.10 फीसदी है.

आपको बता दें कि SBI आरडी खाताधारकों को हर महीने कम से 100 रुपये जमा करना जरूरी होता है. हालांकि, बैंकों के तुलना में पोस्ट ऑफिस में RD पर अधिक ब्याज मिल रहा है. वर्तमान में, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) RD पर 6.10 फीसदी की दर से ब्याज दे रहा. वहीं, पोस्ट ऑफिस में ​RD पर 7.20 फीसदी की दर से ब्याज मिल रहा है.

एसबीआई कै कैसे खोलें आरडी खाता (How to open SBI RD-Recurring Deposit account)

(1) एसबीआई नेट-बैंकिंग में लॉग-इन करने के बाद फिक्स्ड डिपॉजिट के तहत ‘ई-आरडी (आरडी) / ई-एसबीआई फ्लेक्सी डिपॉजिट’ पर क्लिक करें.

(2) बैंक में अगर एक से ज्यादा खाते हैं तो सभी दिखेंगे. यानी सभी बचत और चालू खाते दिखेदा. उस खाते को चुनें जिससे आरडी अकाउंट को लिंक करना है. मासिक किस्त और अवधि चुनें. अवधि से ब्याज दर तय होगी.

(3) यह अक्सर फिक्स्ड डिपॉजिट दर जितनी होती है. वरिष्ठ नागरिकों को अतिरिक्त ब्याज मिल सकता है. यदि पात्र हैं तो सीनियर सिटीजन ऑप्शन पर क्लिक करें.

(4) मैच्योरिटी की रकम को सेविंग अकाउंट में पाने के लिए विकल्प को चुनें या मैच्योरिटी की रकम को फिक्स्ड डिपॉजिट में तब्दील करें. तमाम शर्तों को पढ़ने के बाद ‘टर्म्स एंड कंडीशंस’ सेक्शन पर क्लिक करें.

(5) अगले पेज पर नाम, होल्डिंग का तरीका और नॉमिनेशन के बारे में फील्ड दिखेंगी. कन्फर्म बटन पर क्लिक करने पर ई-आरडी बन जाएगा. रेफरेंस नंबर और आरडी खाता नंबर आपको मिलेंगे.

(6) आप चाहें तो ई-आरडी ब्योरे को देख, प्रिंट और डाउनलोड कर सकते हैं. इसके अलावा यदि आप कोई स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन (एसआर्इ) देना चाहते हैं तो इसे ऑनलाइन कर सकते हैं.

SBI RD के फायदें- 

>> जब किसी के पास छोटी अवधि के लक्ष्यों की खातिर बचत करने के लिए एकमुश्त रकम नहीं होती है, तो आरडी मददगार साबित होता है.

>> यह हर महीने कुछ राशि बचत करने में मदद करता है. सुनिश्चित रिटर्न की चाहत रखने वाले जो निवेशक बिल्कुल भी जोखिम नहीं ले सकते हैं, उनके लिए RD अच्छा विकल्प है.

>> इसमें एक साल के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए निवेश किया जा सकता है.अवधि खत्म होने पर मैच्योरिटी की रकम व्यक्ति को वापस दी जाती है.

>> इसमें निवेश की मूल रकम और उस पर कमाया गया ब्याज शामिल होता है. इस तरह के भी रेकरिंग डिपॉजिट हैं जिनमें अलग-अलग राशि जमा की जा सकती है. लेकिन, ज्यादातर मामलों में हर महीने एक निश्चित राशि जमा की जाती है.

Input : News18

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UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2020 के उम्मीदवारों के लिए बुरी खबर, वैकेंसी हो सकती है कम

Santosh Chaudhary

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यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के लिए बुरी खबर। इस बार यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा नोटिफिकेशन ( UPSC Civil Services Notification 2020 ) में वैकेंसी की संख्या कम हो सकती है। इस बात की काफी संभावना है कि करीब 100 वैकेंसी कम हो जाए। इसकी वजह यह है कि रेलवे ने यूपीएससी से अपने ग्रुप ए अफसरों की भर्ती का अनुरोध वापस ले लिया है। रेलवे भर्ती बोर्ड ( RRB ) ने संघ लोक सेवा आयोग ( यूपीएससी ) को विभिन्न कैडरों में ग्रुप ए अफसरों ( Group A officers ) की भर्ती का अनुरोध पत्र भेजा था। लेकिन अब अनुरोध पत्र रेलवे से वापस ले लिया है। अधिकारियों ने बुधवार को ये जानकारी दी।

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सिविल सेवा कैडर के अधिकारियों ने अपनी वरिष्ठता खोने और करियर की संभावनाओं के मद्देनजर चिंता जाहिर करते हुए विरोध जताया था।

9 जनवरी को लिखे पत्र में रेलवे बोर्ड ने कहा है कि कैबिनेट ने कैडर ( 9 सेवाओं – IRSE, IRSME, IRSEE, IRSS, IRTS, IRAS, IRPS RPF ) को मर्ज करने का फैसला लिया है। इस फैसले के बाद अब यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा और यूपीएससी इंजीनियरिंग सर्विसेज एग्जामिनेशन के जरिए रेलवे सेवाओं से जुड़ी ये रिक्तियां नहीं निकाली जाएंगी। इन्हें वापस ले लिया गया है।

कैबिनेट ने आठ सेवाओं का विलय कर उन्हें भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा (आईआरएमएस) बना दिया है। इसके बाद रेल मंत्रालय ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा और यूपीएससी इंजीनियरिंग सर्विसेज एग्जाम के जरिए इंडियन रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स सर्विसेज (आईआरपीएफएस, पहले आरपीएफ के तौर पर जाना जाता था) को छोड़कर अन्य सेवाओं के लिए रिक्तियों का अनुरोध वापस ले लिया है।

पत्र में UPSC और DoPT (कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग) से इस संबंध में आवश्यक कार्रवाई के लिए कहा गया है।

वर्तमान में मैकेनिकल, सिविल और अन्य इंजीनियरिंग सेवाओं के टेक्निकल कर्मियों की भर्ती इंजीनियरिंग सर्विसेज परीक्षा से होती है जबकि नॉन टेक्निकल पदों पर भर्तियां सिविल सेवा परीक्षा के जरिए होती है।

UPSC Civil Services Exam 2020

संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) सिविल सेवा परीक्षा का नोटिफिकेशन 12 फरवरी को जारी होगा। सिविल सेवा परीक्षा 2020 के लिए 3 मार्च तक आवेदन स्वीकार किए जाएंगे।  सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा 31 मई को होगी। मेंस का आयोजन 18 सितंबर से होगी।

हर वर्ष यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा तीन चरणों — प्रारंभिक, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार– में आयोजित की जाती है। इसके जरिए इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज (आईएएस), भारतीय पुलिस सर्विसेज (आईपीएस) और भारतीय फॉरेन सर्विसेज (आईएफएस), रेलवे ग्रुप ए (इंडियन रेलवे अकाउंट्स सर्विस), इंडियन पोस्टल सर्विसेज, भारतीय डाक सेवा, इंडियन ट्रेड सर्विसेज सहित अन्य सेवाओं के लिए चयन किया जाता है।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के जरिए भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) सहित अन्य सेवाओं के लिए चयन किया जाता है। इंडियन फॉरेस्ट सर्विसेज का सेलेक्शन भी सिविल सर्विस एग्जाम के साथ साथ होता है। आईएफएस मेन एग्जाम के लिए सेलेक्शन यूपीएससी सिविल सर्विस प्रीलिम्स ( UPSC Civil Services prelims ) के जरिए ही होता है।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के सभी आवेदकों को सबसे पहले प्रीलिम्स एग्जाम में बैठना होता है। इसमें पास होने वाले उम्मीदवारों को मेन्स एग्जाम में बैठने के लिए बुलाया जाता है। मेन्स में जो पास होता है वह इंटरव्यू (पर्सनैलिटी टेस्ट) तक पहुंचता है। फाइनल मेरिट लिस्ट इंटरव्यू और मेन्स एग्जाम में प्रदर्शन के आधार पर बनती है। मेन्स एग्जाम 1750 मार्क्स और इंटरव्यू 275 मार्क्स का होता है।

(इनपुट न्यूज एजेंसी PTI से)

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दीपिका पादुकोण की जेएनयू विजिट पर कंगना रनौत का जवाब, ‘मैं टुकड़े टुकड़े गैंग का सपोर्ट नहीं करती’

Santosh Chaudhary

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बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत को उनकी फिल्म और फैशन के साथ साथ अपनी बेबाक राय के लिए भी जाना जाता है। अक्सर कंगना रनौत बॉलीवुड से लेकर सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय रखती हैं। हाल ही में कंगना रनौत ने एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण की जेएनयू विजिट पर बात की, जो कुछ दिन पहले टीवी चैनलों पर चर्चा का विषय बन गया था।

स्पॉटब्वॉय को दिए एक इंटरव्यू में दीपिका पादुकोण को लेकर कंगना रनौत ने कहा कि दीपिका जानती हैं कि वो क्या कर रही हैं और वो किन लोगों के साथ खड़ी हैं। साथ ही उन्होंने कहा, ‘दीपिका अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर रही हैं और कंगना का ये अधिकार नहीं है कि वो दीपिका के इस कदम पर अपनी राय ना दे।’

हालांकि, कंगना ने कहा कि वो ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ के पीछे नहीं खड़ी हैं। साथ ही कंगना ने कहा, ‘मैं उस किसी भी गैंग का समर्थन नहीं करती, जो देश को टुकड़ों में बांटते हैं। मैं उन लोगों को शक्ति नहीं देती हूं, जो जवानों के शहीद होने पर जश्न मनाते हैं। मैं उन लोगों का साथ नहीं देना चाहती। इसलिए मैं वो कह सकती हूं, जो मैं चाहती हूं, लेकिन किसी और पर कमेंट नहीं करना चाहती।’

साथ ही कंगना ने दीपिका की फिल्म छपाक का सोशल मीडिया पर बहिष्कार करने को लेकर कहा कि इससे फिल्म पर असर नहीं पड़ता और फिल्म अच्छी होती है तो जरूर चलती है। बता दें कंगना रनौत इससे पहले भी जेएनयू को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी थी और जेएनयू के खिलाफ आवाज उठाई थी। याद दिला दें कि दीपिका पादुकोण जेएनयू में हुई हिंसा के बाद विरोध कर रहे छात्रों का समर्थन करने गई थीं।

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