लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) ने जब से बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) से अलग होकर अपने दम पर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है, तब से सियासी कयासबाजी तेज हो गई है। राजनीति के जानकार इसे बीजेपी का प्लान बी बता रहे हैं। माना जा रहा है कि महाराष्ट्र में चुनाव बाद शिवसेना के रुख से सीख लेते हुए बीजेपी नीतीश कुमार के सामने उसे दोहराने का विकल्प नहीं छोड़ना चाहती है। इसलिए उसने लोजपा के कंधे पर बंदूक रखकर जेडीयू के खिलाफ मोर्चेबंदी कर दी है। लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान के अप्रत्याशित रुख को लकेर एक दूसरा आकलन यह वह पार्टी के सिकुड़ते वोट बैंक का विस्तार करना चाहते हैं, इसलिए ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़कर पार्टी के कैडर में नया जोश भरना चाहते हैं। सियासी फिजा में कई थ्योरी हैं, आइए जानते हैं इनके पीछे क्या तर्क हैं।

2015 का बदला लेना चाहती है बीजेपी?
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लोजपा का बिहार में यूं एनडीए से अलग चुनाव लड़ना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में पूरी आस्था दिखाना इस कयास को बल देता है कि बीजेपी बिहार की बिसात को पूरी तरह से नीतीश के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती है। कुछ राजनीतिक पंडितों का भी तर्क है कि बीजेपी ने नीतीश की नकेल कसने के लिए ही अपने तरकश से लोजपा का स्वतंत्र तौर पर चुनाव लड़ने का ब्रह्मास्त्र निकाला है। हालांकि जेडीयू वर्ष 2017 में फिर से बीजेपी के साथ आ गई थी, लेकिन माना जा रहा है कि 2015 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नरेंद्र मोदी के नाम पर एनडीए से नाता तोड़ने वाले नीतीश कुमार पर उसे पूरी तरह से भरोसा नहीं है।

एनडीए से राह अलग करने के बाद से चिराग पासवान लगातार जेडीयू पर तो हमलावर हैं, लेकिन बार-बार विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी और लोजपा की सरकार बनाने की बात कह रहे हैं। इस मामले पर बीजेपी की चुप्पी इस कयास को बल दे रही है कि पार्टी नीतीश कुमार से 2015 का बदला लेने की तैयारी में है। बिहार की राजनीति के जानकार शैवाल गुप्ता ने हमारे सहयोगी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स से बातचीत में कहा, ‘मेरे ख्याल से चिराग पासवान का तेवर  बागी अचानक नहीं हुआ है। कुछ हद तक यह बिहार में नीतीश कुमार को कमजोर करने की कोशिश है। मुझे लगता है कि यह एक गेम प्लान है, जो बिहार में जेडीयू के कमजोर करेगा और बीजेपी को पैठ बनाने में मदद।’

सिकुड़ते वोट बैंक को बढ़ाने की LJP की कोशिश?
फरवरी 2005 में हुई विधानसभा चुनाव में अपने दम पर लड़ने वाली लोजपा को 178 में से 29 सीटों पर जीत मिली थी। इस चुनाव में रामविलास पासवान की अपील का असर उनके समर्थकों के बीच सिर चढ़कर बोल रहा था। लोजपा को इस चुनाव में 12.63 प्रतिशत वोट मिले। इस चुनाव परिवारर के बाद सत्ता की चाभी पासवान के हाथ आई जरूर, लेकिन वह किसी ‘ताले’ के साथ फिट नहीं बैठ पाई। नतीजा, उसी साल अक्टूबर में फिर से चुनाव हुए। इस चुनाव में रामविलास पासवान ने 203 सीटों पर प्रत्याशी उतारे लेकिन महज 10 सीटों पर सफलता हाथ लगी और वोट शेयर (11.1%) में भी कमी दर्ज की गई। इस चुनाव में बीजेपी और जेडीयू गठबंधन में चुनाव लड़ रही थी और पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनी।

2010 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली लेजपा का वोट शेयर घटकर 6.75 प्रतिशत रह गया और सीटें महज 3 सीटें जीत पाई। चिराग पासवान के हालिया बयान से यह स्पष्ट दिख है कि जेडीयू की सीटों पर बीजेपी के समर्थकों की सहानुभूति वोट लेने की कोशिश में लोजपा है। अगर ऐसा करने में सफल होती है तो निश्चित तौर पर वोट प्रतिशत में इजाफा होगा। इस उसके कार्यकर्ताओं का भी उत्साहवर्धन होगा। एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व डायरेक्टरर डीएम दिवाकर ने हिन्दुस्तान टाइम्स से कहा, ‘जिन सीटों पर त्रिकोणीया मुकाबले की संभावना है, वहां अगर दलित वोटर लोजपा के साथ जाते हैं और बीजेपी के मतदाता भी लोजपा के पक्ष में मतदान कररते हैं, तो जेडीयू के लिए मुश्किल स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।’

महाराष्ट्र जैसी स्थिति नहीं चाहती बीजेपी
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के बाद बनी परिस्थिति से सबक लेते हुए बीजेपी बिहार में इसे दोहराने देना नहीं चाहती है। इस चुनाव में शिवसेना बीजेपी के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरी। गठबंधन को बहुमत भी मिला। लेकिन, सीएम पद को लेकर शिवसेना और बीजेपी में ठन गई। इसके बाद एनडीए से अलग राह अपनाते हुए उद्धव ठाकरे ने एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार बना ली। बीजेपी बिहार में नीतीश कुमार और जेडीयू को ऐसी स्थिति में नहीं आने देना चाहती है। माना जा रहा है कि बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि इस चुनाव में जेडीयू का कमोजर होना बीजेपी को अपने आगे के गेम प्लान के लिए मुफीद लग रहा है।

Input: Live Hindustan

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