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शक्ति साधना का सबसे बड़ा केंद्र है कामाख्या मंदिर

Santosh Chaudhary

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कामाख्या शक्तिपीठ गुवाहाटी (असम) के पश्चिम में 8 कि.मी. दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है. माता के सभी शक्तिपीठों में से कामाख्या शक्तिपीठ को सर्वोत्तम कहा जाता है. माता सती के प्रति भगवान शिव का मोह भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के 51 भाग किए थे.

जिस-जिस जगह पर माता सती के शरीर के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए. कहा जाता है कि यहां पर माता सती का गुह्वा मतलब योनि भाग गिरा था, उसी से कामाख्या महापीठ की उत्पत्ति हुई. कहा जाता है यहां देवी का योनि भाग होने की वजह से यहां माता रजस्वला होती हैं.

 

कामाख्या शक्तिपीठ चमत्कारों और रोचक तथ्यों से भरा हुआ है. यहां जानिए कामाख्या शक्तिपीठ से जुड़े ऐसे ही 6 रोचक तथ्य:

1. मंदिर में नहीं है देवी की मूर्ति: इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, यहां पर देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है. मंदिर में एक कुंड सा है, जो हमेशा फूलों से ढका रहता है. इस जगह के पास में ही एक मंदिर है जहां पर देवी की मूर्ति स्थापित है. यह पीठ माता के सभी पीठों में से महापीठ माना जाता है.

2. यहां माता हर साल होती हैं रजस्वला: इस पीठ के बारे में एक बहुत ही रोचक कथा प्रसिद्ध है. कहा जाता है कि इस जगह पर मां का योनि भाग गिरा था, जिस वजह से यहां पर माता हर साल तीन दिनों के लिए रजस्वला होती हैं. इस दौरान मंदिर को बंद कर दिया जाता है. तीन दिनों के बाद मंदिर को बहुत ही उत्साह के साथ खोला जाता है.

3. प्रसाद के रूप में मिलता है गीला वस्त्र: यहां पर भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गीला कपड़ा दिया जाता है, जिसे अम्बुवाची वस्त्र कहते हैं. कहा जाता है कि देवी के रजस्वला होने के दौरान प्रतिमा के आस-पास सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है. तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं, तब वह वस्त्र माता के रज से लाल रंग से भीगा होता है. बाद में इसी वस्त्र को भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है.

4. लुप्त हो चुका है मूल मंदिर: कथा के अनुसार, एक समय पर नरक नाम का एक असुर था. नरक ने कामाख्या देवी के सामने विवाह करने का प्रस्ताव रखा. देवी उससे विवाह नहीं करना चाहती थी, इसलिए उन्होंने नरक के सामने एक शर्त रखी. शर्त यह थी कि अगर नरक एक रात में ही इस जगह पर मार्ग, घाट, मंदिर आदि सब बनवा दे, तो देवी उससे विवाह कर लेंगी. नरक ने शर्त पूरी करने के लिए भगवान विश्वकर्मा को बुलाया और काम शुरू कर दिया.
काम पूरा होता देख देवी ने रात खत्म होने से पहले ही मुर्गे के द्वारा सुबह होने की सूचना दिलवा दी और विवाह नहीं हो पाया. आज भी पर्वत के नीचे से ऊपर जाने वाले मार्ग को नरकासुर मार्ग के नाम से जाना जाता है और जिस मंदिर में माता की मूर्ति स्थापित है, उसे कामादेव मंदिर कहा जाता है. मंदिर के संबंध में कहा जाता है कि नरकासुर के अत्याचारों से कामाख्या के दर्शन में कई परेशानियां उत्पन्न होने लगी थीं, जिस बात से क्रोधित होकर महर्षि वशिष्ट ने इस जगह को श्राप दे दिया. कहा जाता है कि श्राप के कारण समय के साथ कामाख्या पीठ लुप्त हो गया.

5. 16वीं शताब्दी से जुड़ा है मंदिर का इतिहास: मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में कामरूप प्रदेश के राज्यों में युद्ध होने लगे, जिसमें कूचविहार रियासत के राजा विश्वसिंह जीत गए. युद्ध में विश्व सिंह के भाई खो गए थे और अपने भाई को ढूंढने के लिए वे घूमत-घूमते नीलांचल पर्वत पर पहुंच गए.

वहां उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी. उस महिला ने राजा को इस जगह के महत्व और यहां कामाख्या पीठ होने के बारे में बताया. यह बात जानकर राजा ने इस जगह की खुदाई शुरु करवाई. खुदाई करने पर कामदेव का बनवाए हुए मूल मंदिर का निचला हिस्सा बाहर निकला. राजा ने उसी मंदिर के ऊपर नया मंदिर बनवाया. कहा जाता है कि 1564 में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर को तोड़ दिया था. जिसे अगले साल राजा विश्वसिंह के पुत्र नरनारायण ने फिर से बनवाया.

 

6. भैरव के दर्शन के बिना अधूरी है कामाख्या यात्रा: कामाख्या मंदिर से कुछ दूरी पर उमानंद भैरव का मंदिर है, उमानंद भैरव ही इस शक्तिपीठ के भैरव हैं. यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में है. कहा जाता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है. कामाख्या मंदिर की यात्रा को पूरा करने के लिए और अपनी सारी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए कामाख्या देवी के बाद उमानंद भैरव के दर्शन करना अनिर्वाय है.

7. तंत्र विद्या का सबसे बड़ा मंदिर: कामाख्‍या मंदिर तंत्र विद्या का सबसे बढ़ा केंद्र माना जाता है और हर साल जून महीने में यहां पर अंबुवासी मेला लगता है. देश के हर कोने से साधु-संत और तांत्रिक यहां पर इकट्ठे होते हैं और तंत्र साधना करते हैं. माना जाता है कि इस दौरान मां के रजस्‍वला होने का पर्व मनाया जाता है और इस समय ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिन के लिए लाल हो जाता है.

 

 

RELIGION

यहां सूखा पड़ने पर शिवलिंग पर दूध चढ़ाते हैं भक्त, इस मंदिर में मांगी हुई हर मुराद होती है पूरी

Muzaffarpur Now

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उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के महदेवा का प्राचीन शिव मंदिर वर्षो से भक्तों के आस्था का प्रतीक है। मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। सावन मास के साथ प्रत्येक सोमवार को भक्तों की भारी भीड़ होती है। स्थानीय लोग मंदिर को बउरहवा बाबा के नाम से पुकराते हैं।

प्राचीन शिव मंदिर।

किवंदती के अनुसार कई सौ वर्ष पहले एक चरवाहा गाय चराते हुए उंचे टीले पर पहुंच गया। वहां पर एक शिवलिंग पर उसकी नजर पड़ी। चरवाहे के कोई संतान नहीं थे, उसने शिवलिंग के पास जाकर संतान प्राप्ति का मन्नत मांगा। कुछ दिनों के बाद उसे संतान की प्राप्ति हो गई।

उसके बाद से शिवलिंग की साफ-सफाई निरंतर करने लगा। शिवलिंग का आकार भी धीरे-धीरे बढ़ता गया। आज वह शिवलिंग विशाल रूप धारण कर लिया है। मान्यता है कि क्षेत्र में कभी भी सूखा का प्रकोप होता है, तो बउरहवां बाबा मंदिर पर जलाभिषेक करके शिवलिंग को पूरा डूबा देते हैं। उस रात जरूर बारिश होती है।

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ग्राम प्रधान ने कराया जीर्णोद्धार

करीब 50 वर्ष पहले क्षेत्र में भयंकर सूखा पड़ा था। किसानों के फसल सूख कर नष्ट हो गए थे। लोग मंदिर में पहुंचे और दूध, जल चढ़ाया। सुबह से लेकर शाम तक शिवलिंग को दूध और जल से डूबा दिए। इस दौरान काला नाग निकला और उसी जल में तैरने लगा। शाम होते ही नाग विलुप्त हो गए। उसके बाद रात में खूब बारिश हुआ। तभी से जब भी क्षेत्र में सूखा पड़ता है तो लोग बउरहवा बाबा की शरण में जाते हैं।

मंदिर के पुजारी राम आसरे ने बताया कि मंदिर की अलग महत्व है, सच्चे मन से मांगी गई सभी मनौती पूर्ण होती है।

ग्राम प्रधान विनोद चौधरी ने जर्जर मंदिर को भव्य रूप देने के लिए मंदिर को करीब सात लाख की लागत से जीर्णोद्धार कराया। प्रधान ने कहा कि शिव में गहरी आस्था है। इस लिए मंदिर को भव्य रूप दिया। शिवरात्रि के दिन क्षेत्र के कई जिलों के लोग यहां जल चढ़ाने पहुंचते हैं।

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गुप्त नवरात्रि आज से, जानें कलश स्थापना का मुहूर्त, होती है इन देवियों की पूजा

Ravi Pratap

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सनातन धर्मावलंबी आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा यानी आज से ग्रीष्म आषाढ़ी नवरात्र पूजा करेंगे। अगले नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना में श्रद्धालु लीन रहेंगे। आषाढ़ी नवरात्रि में तंत्र साधना की प्रधानता के  कारण इसे गुप्त नवरात्रि भी कहा जाता है। इस दौरान साधक दस महाविद्याओं की साधना करेंगे।

Gupt Navratri 2020 : Ghatasthapana Subh Muhurat In Hindi - माघ ...

धन, संतान का सुख देता है यह नवरात्र 

ज्योतिषाचार्य प्रियेंदू प्रियदर्शी के मुताबिक गुप्त नवरात्रि के दौरान 26 जून को पंचमी पूजा के साथ बेल नोती होगी। श्रद्धालु 28 जून को महाष्टमी और 29 जून को महानवमी पूजा व हवन करेंगे। उनके अनुसार गुप्त नवरात्रि किसी खास मनोकामना की पूजा के लिए तंत्र साधना का मार्ग लेने का पर्व है। अन्य नवरात्रि की तरह ही इसमें भी व्रत-पूजा, पाठ, उपवास किया जाता है। इस दौरान साधक देवी दुर्गा को प्रसन्न करने के अनेक उपाय करते हैं। इसमें दुर्गा सप्तशती पाठ, दुर्गा चालीसा, दुर्गा सहस्त्रनाम का पाठ काफी लाभदायी यह माना गया है। यह नवरात्रि धन, संतान सुख के साथ-साथ शत्रु से मुक्ति दिलाने में भी कारगर है।

Dharm News In Hindi : Gupt Navratri will be worshiped from June 22 ...

कलश स्थापना का मुहूर्त:-

सुबह 9.30 बजे से सुबह 11 बजे तक गुप्त नवरात्र

26 जून – पंचमी-बेल नोती पूजा

28 जून- महाष्टमी, 29 जून-हवन व महानवमी

गुप्त नवरात्र में होती हैं इन देवियों की पूजा

मां काली, तारादेवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी माता, छिन्न माता, त्रिपुर भैरवी मां, धुमावती माता, बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी इन 10 देवियों का पूजन करते हैं।

Input : Live Hindustan

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RELIGION

सरकार का बड़ा फैसला, बैद्यनाथधाम-देवघर का श्रावणी मेला स्‍थगित

Ravi Pratap

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राज्य के देवघर व दुमका में लगनेवाला श्रावणी मेला इस बार आयोजित नहीं होगा। राज्य के विभिन्न हिस्सों में आयोजित होनेवाला रथ मेला भी इस बार आयोजित नहीं होगा। आपदा प्रबंधन सचिव अमिताभ कौशल ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने पहले ही धार्मिक सभा, समागम आदि पर रोक लगा रखी है। ऐसे में श्रावणी मेला व रथ मेला का आयोजन नहीं हो सकता। अमिताभ कौशल के अनुसार, केंद्र सरकार ने 30 मई को लॉक डाउन में रियायतों केा लेकर जो आदेश जारी किया है उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अभी भी किसी तरह की पब्लिक गैदरिंग नहीं हो सकती। धार्मिक सभा और समागम के आयोजन भी रोक बरकरार रखी गई है। उनके अनुसार, केंद्र का उक्त आदेश अभी भी लागू है।

इस वर्ष नहीं होगा देवघर श्रावणी मेला का आयोजन

कोरोना का प्रभाव विश्व प्रसिद्ध देवघर श्रावणी मेले पर भी पड़ा है। इस वर्ष श्रावणी मेले का आयोजन नहीं होगा। इसके अलावा राज्य के विभिन्न हिस्सों में आयोजित होनेवाला श्रीजगन्नाथ रथयात्रा मेला भी इस बार नहीं लगेगा। राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन सचिव अमिताभ कौशल ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने पहले ही धार्मिक सभा, समागम आदि पर रोक लगा रखी है। ऐसे में श्रावणी मेला व रथ मेला का आयोजन नहीं हो सकता।

आपदा प्रबंधन सचिव ने कहा, केंद्र ने पहले ही आयोजन पर लगा रखी है रोक

अमिताभ कौशल के अनुसार, केंद्र सरकार ने 30 मई को लॉक डाउन में रियायतों को लेकर जो आदेश जारी किया है उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अभी भी किसी तरह की पब्लिक गैदिङ्क्षरग नहीं हो सकती। धार्मिक सभा और समागम के आयोजन भी रोक बरकरार रखी गई है। केंद्र का उक्त आदेश अभी भी लागू है।

बता दें कि देवघर के श्रावणी मेले में देश-विदेश से लाखों लोग जुटते हैं। इससे लाखों लोगों को रोजगार भी मिलता है। मेले के आयोजन नहीं होने से उनके समक्ष रोजगार का संकट भी उत्पन्न हो जाएगा। भगवान जगन्नाथ के विभिन्न मंदिरों में भी बड़ा मेला लगता है, जो इस बार नहीं लग सकेगा।

झारखंड सरकार का बड़ा फैसला

  1. नहीं होगा श्रावणी व रथ यात्रा मेला का आयोजन
  2. आपदा प्रबंधन सचिव ने कहा, केंद्र ने पहले ही आयोजन पर लगा रखी है रोक

बाबा बैद्यनाथ मंदिर के चारों ओर लगी सख्त पहरेदारी

झारखंड सरकार के स्तर से इस वर्ष श्रावणी मेला का आयोजन नहीं करने के निर्णय के बाद जिला प्रशासन ने बैद्यनाथ मंदिर जाने के सभी रास्तों पर सुरक्षा व्यवस्था को बढ़ा दिया है। सोमवार की देर रात  देवघर की उपायुक्त  नैंसी सहाय के निर्देश पर कोविड-19 महामारी से बचाव एवं इसके संक्रमण को रोकने के उद्देश्य सभी धार्मिक प्रतिष्ठानों को हरहाल में बंद रखने कड़ा निर्देश दिया है।

मुख्य द्वार तक भी अब नहीं पहुंच सकेंगे श्रद्धालु

दरअसल अनलॉक-1 में मिली रियायत के बाद ऐसा देखा जा रहा था कि बाबा मंदिर के प्रवेश द्वार पर काफी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ जमा हो रही थी। जिला प्रशासन ने यहां जमा हो रहे भीड़ को गंभीरता से लेते हुए कई स्थानों पर ड्रॉप ग्रेट बैरियर लगाने के साथ  दंडाधिकारियों एवं पुलिस बलों की प्रतिनियुक्ति तीन पारियों में करने का निर्णय लिया है।

प्रथम पाली सुबह चार बजे से 9.30 बजे तक किया गया है। द्वितीय पाली 9.00 बजे से शाम तीन बजे तक किया गया है। तृतीय पाली दोपहर 2.30 बजे से रात्रि आठ बजे तक किया गया है। इसके अलावा सीता होटल, लक्ष्मी चौक, बीएन झा पथ, हिन्दी विद्यापीठ, जलसार मोड़ के समीप प्रथम, द्वितीय व तृतीय पाली में दंडाधिकारी व पुलिस पदाधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की गई है।

Input : Dainik Jagran

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