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Makar Sankranti कल, इस बार एक साथ बन रहे कई योग, इस विधि से पूजा करना विशेष फलदायक

Santosh Chaudhary

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इस बार मकर संक्रांति पर अमृत सिद्धि, सर्वार्थसिद्धि और रवि योग रहेगा। ये तीनों ही योग शुभ माने गए हैं। इस योगों में किया गया दान-पुण्य और अनुष्ठान अभीष्ट फल देने वाला होगा।

15 जनवरी को सुबह होगा महापुण्य काल

ज्योतिषविद् विमल कुमार लाभ बताते हैं कि 14 जनवरी की रात करीब आठ बजे सूर्य देव धनु से मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य का राशि परिवर्तन सूर्यास्त के बाद होगा, इसके कारण पुण्यकाल अगले दिन सुबह श्रेष्ठ रहेगा। शास्त्रों में बताया गया है कि जिस रात्रि में सूर्य, मकर राशि में प्रवेश करते हैं, उसके अगले दिन को पुण्यकाल माना जाता है। इसलिए 15 जनवरी की सुबह ही पवित्र जलाशयों में स्नान करने के बाद तिल-गुड़ का दान किया जाएगा।

सुख-समृद्धि का है दिन

रामदयालु स्थित मां मनोकामना देवी मंदिर के पुजारी पंडित रमेश मिश्र बताते हैं कि सनातन धर्म में मकर संक्रांति को मोक्ष की सीढ़ी बताया गया है। इस दिन सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण हो जाते हैं और खरमास खत्म हो जाता है। मांगलिक कार्य फिर शुरू हो जाएंगे। प्रयाग में कल्पवास भी मकर संक्रांति से शुरू होता है। हरिसभा चौक स्थित राधाकृष्ण मंदिर के पुजारी पंडित रवि झा बताते हैं कि सूर्य देव जब मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृष और मिथुन राशि में रहते हैं, तब उत्तरायण रहता है। जब सूर्य शेष राशियों कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक और धनु राशि में रहते हैं तो दक्षिणायण रहता है। यह सुख-समृद्धि का दिन माना जाता है। चूंकि गंगा-स्नान को मोक्ष का मार्ग माना जाता है। इसलिए लोग इस तिथि पर गंगा स्नान के बाद दानादि करते हैं।

ऐसे करें पूजा

– मकर संक्रांति के दिन सुबह जगने के बाद स्नानादि करें।

– यदि संभव हो तो पवित्र जलाशयों में स्नान करें। इसके बाद तांबे के लोटे में लाल फूल और अक्षत डालकर सूर्य देव को जल दें।

– तुलसी को जल चढ़ाएं और परिक्रमा करें।

– शिव मंदिर जाएं और शिवलिंग पर काला तिल व गुड़ चढ़ाकर जल अर्पित करें। गुड़ और काले तिल का दान भी करें।

– भगवान को गुड़-तिल के लड्डू का भोग लगाएं और प्रसाद बांटे।

इनपुट : दैनिक जागरण 

RELIGION

शिवालय : महाराष्ट्र के कोंकण में है ग्यारहवीं शताब्दी में बना अंबरनाथ शिव मंदिर

Muzaffarpur Now

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महाराष्ट्र का अंबरनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है इसे अंबरेश्वर नाम से भी जाना जाता है। यहां के निवासी इस मंदिर को पांडवकालीन मानते हैं। यह प्राचीन हिन्दू शिल्पकला की अद्भभुत मिसाल है। ग्यारहवीं शताब्दी में बने अंबरनाथ मंदिर को यूनेस्को ने सांस्कृतिक विरासत घोषित किया है। मंदिर में मिले एक शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण राजा मांबणि ने करवाया था। इस मंदिर के बाहर दो नंदी बने हैं। मंदिर की मुख्य मूर्ति त्रैमस्ति की है, इसके घुटने पर एक नारी है, जो शिव -पार्वती के स्वरूप को दर्शाती है। शीर्ष भाग पर शिव नृत्य मुद्रा में दिखते हैं। वलधान नदी के तट पर बना मंदिर इमली और आम के पेड़ों से घिरा हुआ है। मंदिर की वास्तुकला उच्चकोटि की है। यहां वर्ष 1060 ई. का एक प्राचीन शिलालेख भी पाया गया है।

Image of Ambernath Shiv Mandir / Shiva Temple Built In 1060 Ad ...

एक ही पत्थर से हुआ था निर्माण

इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया है, लेकिन पौराणिक कथा के अनुसार इसे पांडवों ने एकल पत्थर से बनाया था। पांडवों ने अपने अज्ञातवास के सबसे दूभर कुछ वर्ष अंबरनाथ में बिताए थे और यह पुरातन मंदिर उन्होंने एक ही रात में विशाल पत्थरों से बनवा डाला था। कौरवों द्वारा लगातार पीछा किए जाने के भय से यह स्थान छोड़कर उन्हें जाना पड़ा । मंदिर के आस-पास कई नैसर्गिक चमत्कार हैं। गर्भगृह के पास गर्म पानी का कुंड है। इसके साथ ही पास भूगर्गीय गुफा का मुहाना है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसका रास्ता पंचवटी तक जाता था।

Shiv Mandir, Ambarnath - Wikipedia

लुभाती है खूबसूरत नक्काशी

अंबेश्वर मंदिर का निर्माण हेमाडपंथी शैली जैसा प्रतीत होता है। ऐसी कला उस समय के दौरान बनाए गए कई प्राचीन मंदिरों में देखी जा सकती है। अंबेश्वर मंदिर में तीन पोर्च हैं, जो मुख्य द्वार से केंद्रीय हॉल तक पहुंचाते हैं। केंद्रीय हॉल के अंदर विभिन्न देवी-देवताओं की पत्थर से बनी नक्काशीदार मूर्तियां है। मंदिर की खास बात है कि, यहां शिवलिंग भूमिगत रखा गया है और वहां जाने के लिए एक संकीर्ण रास्ता है। इस मंदिर का आंतरिक संवेदक आकाश के लिए खुला है और शिवलिंग को बीच में रखा गया है।

Travelogue Unlimited: Ambarnath Temple : A Photo Feature

मंदिर के बाहरी हिस्से में मंदिर में मौजूद देवताओं की सुंदर मूर्तियां आने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है। शिव के जीवन से संबंधित नक्काशी भी यहां की गई हैं। इन मूर्तियों में विभिन्न पौराणिक कथाओं, शिव -पार्वती विवाह समारोह, नटराज, महाकाली, गणेश नृत्यमूर्ति , नरसिंह अवतार आदि का चित्रण किया है। माघ के महीने में शिव रात्रि के अवसर पर प्रतिवर्ष यहां विशाल मेले का आयोजन होता है।

Input : Dainik Bhaskar

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RELIGION

कांवड़िये हरिद्वार ही क्यों जाते हैं कांवड़ लेने? आखिर क्यों होती है कांवड़ यात्रा

Muzaffarpur Now

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देश में कांवड़ (kawad) यात्रा का खास महत्व है. हर साल लाखों श्रद्धालु पैदल हरिद्वार (Haridwar) से गंगाजल लेकर देश के कोन-कोने में पहुंचते हैं और शिवलिंग में गंगाजल चढ़ाते हैं. भक्त अपनी मनोकामना को पूरा करने के लिए ऐसा करते हैं. हर साल कांवड यात्रा सावन से शुरू होती थी , इस बार सावन माह 6 जुलाई से शुरू होगा लेकिन कोरोना महामारी (Corona epidemic) के कारण सरकार ने कांवड यात्रा को रद्द कर दिया है. इस यात्रा को लेकर आपके मन में कभी सवाल आया होगा कि आखिर कांवड यात्रा हर साल क्यों होती है और भक्त हरिद्वार ही गंगाजल लेने क्यों जाते है? ऐसे ही कई सारे सवालों के जवाब आज हम आपको इस आर्टिकल में देंगे…

कांवड़ यात्रा |Haridwar Kawad Yatra 2020 | Kanwar Mela ...

कांवड़िये गंगा जल लेने हरिद्वार क्यों जाते हैं?

कांवड़ यात्रा को लेकर मान्यता है कि पूरे श्रावण महीने में भगवान शिव अपनी ससुराल राजा दक्ष की नगरी कनखल, हरिद्वार में रहे हैं. इस समय भगवान विष्णु के शयन में जाने के कारण तीनों लोक की देखभाल भगवान शिव ही करते हैं. यही वजह है कि कांवड़िये श्रावण माह में गंगाजल लेने हरिद्वार आते हैं.

Sawan Shivratri Today: 131 Feet Tricolour Kanwar, Non-Veg Dhabas ...

क्यों होती है कांवड़ यात्रा

सावन में हर साल लाखों कांवड़िए हरिद्वार जाते हैं और कांवड़ में गंगाजल भरकर पैदल यात्रा शुरू करते हैं. कांवड़िये अपने कांवड़ में जो गंगाजल भरते हैं, उससे सावन की चतुर्दशी पर भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है. मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला था, जिसे जगत कल्याण के लिए भगवान शंकर ने पी लिया था, जिसके बाद भगवान शिव का गला नीला पड़ गया और तभी से भगवान शिव नीलकंठ कहलाने लगे. भगवान शिव के विष का सेवन करने से दुनिया तो बच गई, लेकिन भगवान शिव का शरीर जलने लगा. ऐसे में देवताओं ने उन पर जल अर्पित करना शुरू कर दिया. इसी मान्यता के तहत कांवड़ यात्रा शुरू हुई.

कांवड़ यात्रा – Kanwar Yatra) begins – People travel ...

कांवड़ यात्रा को श्रीराम ने शुरू किया था

ऐसी मान्यता है कि भगवान राम पहले कांवड़िया थे. कहते हैं श्रीराम ने झारखंड के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल लाकर बाबाधाम के शिवलिंग का जलाभिषेक किया था.

रावण था पहला कांवड़िया

पुराणों के अनुसार इस यात्रा शुरुआत समुद्र मंथन के समय हुई थी. मंथन से निकले विष को पीने की वजह से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया था और तब से वह नीलकंठ कहलाए. इसी के साथ विष का बुरा असर भी शिव पर पड़ा. विष के प्रभाव को दूर करने के लिए शिवभक्त रावण ने तप किया. इसके बाद दशानन कांवड़ में जल भरकर लाया और शिवजी का जलाभिषेक किया. इसके बाद शिव जी विष के प्रभाव से मुक्त हुए. कहते हैं तभी से कांवड़ यात्रा शुरू हुई है.

Kanwar Yatra 2020 Cancelled in The Wake of COVID-19 Pandemic

इस साल नहीं होगी कांवड यात्रा

कोरोना वायरस महामारी के कारण साल 2020 में कांवड यात्रा नहीं होगी. उत्तराखंड सरकार ने पड़ोसी राज्यों को गंगाजल उपलब्ध कराने के लिए कहा है. पीतल के बड़े कलशों में हर की पैड़ी से गंगाजल भरकर पड़ोसी राज्यों को दिया जाएगा. इससे शिव भक्तों को उनके घर के पास ही गंगा जल उपलब्ध हो सकेगा. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और हिमाचल के मुख्यमंत्रियों से इस बारे में बात की है. बता दें कि इस साल 6 जुलाई से कांवड़ यात्रा होनी थी, जिसको कोरोना वायरस के कारण रद्द कर दिया गया है.

Kanwar Yatra, 2020 Sawan Shivaratri (सावन शिवरात्रि ...

Input : News18

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Muzaffarpur Now इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें).

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RELIGION

क्यों महादेव का नाम पड़ा नीलकंठ? जानें श्रावण मास की कैसे हुई शुरुआत

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भगवान शिव का प्रिय सावन का महीना यानी श्रावण मास शुरू हो चुका है. इस महीने महादेव की अराधना करने का बड़ा महत्व होता है. सावन में भक्त अपनी मनोकामनाओं के लिए महादेव की उपासना करते हैं, क्योंकि सावन में भगवान शिव की कृपा जल्दी प्राप्त हो जाती है. इस बार श्रावण मास 6 जुलाई से 3 अगस्त तक रहने वाला है. श्रावण मास शुरू होने के पीछे एक पौराणिक कथा भी है.

हर हर महादेव' का क्या मतलब है? (What Does ...

कैसे शुरू हुआ श्रावण मास?

पौराणिक कथा के अनुसार जब देवता और दानवों ने मिलकर समुंद्र मंथन किया तो हलाहल विष निकला. विष के प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि में हलचल मच गई. ऐसे में सृष्टि की रक्षा के लिए महादेव ने विष का पान कर लिया. शिव जी ने विष को अपने कंठ के नीचे धारण कर लिया था. यानी विष को गले से नीचे जाने ही नहीं दिया. विष के प्रभाव से भगवान भोले का कंठ नीला पड़ गया और उनका एक नाम नीलकंठ भी पड़ा.

Har Har Mahadev Half Sleeve Black T Shirt | KapdeLelo.in

विष का ताप शिव जी के ऊपर बढ़ने लगा. तब विष का प्रभाव कम करने के लिए पूरे महीने घनघोर वर्षा हुई और विष का प्रभाव कुछ कम हुआ. लेकिन अत्यधिक वर्षा से सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने अपने मस्तक पर चन्द्र धारण किया. चन्द्रमा शीतलता का प्रतीक है और भगवान शिव को इससे शीतलता मिली.

Mahadev Mela | District Chhindwara, Government of Madhya Pradesh ...

ये घटना सावन मास में घटी थी, इसीलिए इस महीने का इतना महत्व है और इसीलिए तब से हर वर्ष सावन में भगवान शिव को जल चढ़ाने की परम्परा की शुरुआत हुई. तो सावन में आप भी शिव का अभिषेक कीजिए. वो आपकी हर परेशानी दूर कर देंगे.

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