केंद्र में एनडीए की दोबारा सत्ता में वापसी के कुछ ही महीनों बाद बिहार की सियासत में नई हलचल शुरू हो गई है। राज्य में लागू पूर्ण शराबबंदी कानून को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इस महत्वाकांक्षी नीति की समीक्षा की मांग उनके सहयोगी दलों की ओर से की जा रही है।

इस बहस को तेज करने वाले नेताओं में जीतन राम मांझी प्रमुख हैं। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के संस्थापक और केंद्रीय मंत्री मांझी ने शराबबंदी कानून के प्रभाव और उसके क्रियान्वयन पर पुनर्विचार की वकालत की है। उनका कहना है कि इस कानून के तहत अब तक आठ लाख से अधिक लोग मुकदमों में उलझ चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या वंचित तबकों की है। मांझी के मुताबिक राज्य को इससे भारी राजस्व नुकसान भी झेलना पड़ रहा है।

गया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मांझी ने कहा कि शराबबंदी का उद्देश्य भले सही हो, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पालन ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि “शराबबंदी के बावजूद अवैध रूप से शराब की आपूर्ति हो रही है, यहां तक कि घर-घर पहुंच रही है।” उनका यह भी दावा है कि अदालतों में लंबित मामलों में से करीब साढ़े तीन से चार लाख मामले कमजोर वर्गों से जुड़े लोगों के खिलाफ हैं।

मांझी ने यह भी चिंता जताई कि प्रतिबंध के कारण अवैध और जहरीली शराब का प्रचलन बढ़ा है, जिससे गरीब तबकों को जानलेवा नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि नीति का मकसद गलत नहीं है, लेकिन इसके अमल में गंभीर खामियां हैं। उनके अनुसार छोटे लोगों पर सख्ती की जा रही है, जबकि बड़े तस्करों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही।

इसी मुद्दे पर उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) ने भी सवाल उठाए हैं। पार्टी के एक विधायक ने सदन में शराबबंदी की विस्तृत समीक्षा की मांग की, हालांकि सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। विधायक ने कहा कि कानून लागू होने के बावजूद अवैध तरीके से शराब की उपलब्धता जारी है और इससे राज्य के राजस्व पर भी असर पड़ा है।

वहीं, जेडीयू ने सहयोगी दलों की इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। पार्टी के प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि शराबबंदी सर्वसम्मति से पारित की गई थी और अब इसकी समीक्षा की मांग करना तर्कसंगत नहीं है। उनका दावा है कि इस नीति से महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है और सामाजिक माहौल में सकारात्मक बदलाव आया है।

एनडीए के भीतर उठी इस बहस ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। अब सबकी नजरें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर टिकी हैं कि वह अपने सहयोगियों के दबाव के बीच इस कानून में किसी बदलाव या समीक्षा की दिशा में कदम उठाते हैं या अपनी पुरानी नीति पर कायम रहते हैं।

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